वैशाली की नगरवधू और आज का फैम्निज्म

Posted by Sharda Dahiya
November 6, 2017

Self-Published

मैं अक्सर बैठकर सोचती हूँ की कैसी दुनिया है ये ? कभी कभी तो इमोशन का भण्डार उमड़ पड़ता है इसमें और कभी कभी हम इस कद्र निर्लज्जता की खाई लाँघ आते है की हमें भान ही नहीं होता की हमने किया क्या है ? कभी एक वक्त था जब पूरा भारत उमड़ पड़ा था किसी की तकलीफ़ के लिए याद होगा आपको भी जब हम और आप बैठे थे इंडिया गेट पर किसी दामिनी के लिए | वो इमोशन वो तकलीफ़ जो उस वक्त हम लोगों ने महसूस की थी क्यों वो इमोशन चिर स्थाई नहीं हो सकते ? अभी दो चार महीने पहले मेरे अपने शहर में एक लडकी को मार कर उसको इस शहर से ले जाकर दुसरे शहर में किसी प्लाट में अर्धनग्न अवस्था में छोड़ दिया गया था | कहा थे वो इमोशन ? रियान इंटरनेशनल स्कूल के केस पर फिर से इमोशन लोगों की आँखों में आये मगर उसके बाद कितने ही पर्दुमन भेंट चढ़े फिर से इमोशन नदारद थे | मैं ये नहीं कह रही की हमें हमेशा इमोशन को साथ रखना चाइये या बिना इमोशन के जीना चाइये | मैं कहना बस इतना है की ये इमोशन  सिर्फ पब्लिसिटी का इन्तजार करके क्यों उभरते है और जहाँ पब्लिसिटी की उम्मीद नहीं लगती वहाँ बहते ही नहीं है |हमारे इन इमोशन के दुराग्रह ने ही तो वैश्या जैसे शब्द को जगह दी | क्यों किलोपैत्रा को किलोपेत्रा होना पड़ा ? क्यों आम्रपाली को नगरवधू बना दिया गया | नगरवधू समझते है आप “वैश्या” आम्रपाली भी हंसी खुशी के साथ दामिनी के जैसे ही जीने के सपने देखती थी उसका सुंदर होना उसके लिए अभिशाप बना | उसने अपने प्रेम की खातिर किसी की बीवी होना स्वीकार नहीं किया | उसके प्रेमी को मरवा दिया गया और उसके दावेदार बढ़ गये कहते हैं ना की वैश्या के “तलबगार बहुत होते हैं मगर तरफदार कोई नहीं होता ” ऐसा ही हुआ तलबगारों ने अपनी ही मर्जी से तय कर दिया की आम्रपाली किसी एक की बीवी नहीं पुरे वैशाली की बीवी बनकर रहेगी और बना दिया उसको वैश्या और तलबगार जहाँ अपनी आयाशियों की निशानी छोड़ते फिर उसकी ही  सारे बाजार में इज्जत उड़ाते हैं | क्यों तब आम्रपाली के लिए दामिनी के जैसे आंसू नहीं जागे किसी के | नहीं तो शायद कहानी ही कुछ और होती आज की | और आज कितने ही लोग घूम रहे हैं आम्रपाली की तलाश में की कोई तो मिले जो उनके लिए आम्रपाली बने | ये असर है हमारे इमोशन और स्टैंड ना लेने का | कभी सरकार ने हमारे इमोशन की कद्र करके निर्भया फण्ड बनाया था उसके बाद आप लोगों की आवाज दब गई तो फण्ड भी दब गया | 

डियर भारतवासियों ,प्लीज हर किसी की चीख को सुनना सीख लीजिये आपकी अटेंशन शायद किसी की नगरवधू और दामिनी बनने से बचा ले | अपने इमोशन को भी इतनी तकलीफ़ दीजिये की वो किसी की तकलीफ़ का आभास करना सीख जाए|

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