शायद मेरे पिताजी ने फांसी लगा ली

Posted by Bagish Mishra
November 27, 2017

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सुबह की आंख खुली तो बाबू जी ने हाथ में कुल्हाड़ी पकड़ा दिया,मैं हाफ पैंट पहने हुए एक कमीज के साथ खेत चला गया । जिस वक्त मेरे हाथ में कलम होनी चाहिए थी उस वक्त कुदाल थी।

सुबह पानी के साथ भात (चावल) और नुन (नमक) इसी पर हमारा गुजारा हो जाता था । रात में एक पूरी रोटी भी मिल जाए तो हमारे लिए दिवाली हो जाती थी ।

मां को पिताजी से बात करते हुए सुना था शायद पिताजी ने किसी से कुछ पैसे उधार लिए थे जिनके बदले वह हमारी जमीन मांग रहा था। एक धोती और लाल रंग की गमछी मैंने पिता जी को हमेशा इसी लिवास में देखा शायद हमारे परिवार के लिए समय ठहर सा गया था । जमीन के कागजात लेकर पिताजी को मैंने कई बार मैनेजर साहब के यहां जाते देखा और उधर से नजर झुका कर वापस आते देखा।

वह अक्सर कहा करते थे कि सरकार गरीबी को नहीं गरीबों को मार रही है यह बात उस समय हमारे समझ में नहीं आती थी । एक दिन सूरज डूबते डूबते मेरे घर का चिराग भी ले गया सभी लोग कह रहे थे मेरे पिता जी ने फांसी लगा ली है उस दिन मुझे पिताजी की कही हुई बात समझ में आ गई सरकार गरीबी को नहीं गरीबों को मार रही है।

जनवरी 2017 केवल महाराष्ट्र में 390 किसानों ने आत्महत्या कि (first point.com)

51 किसान करनाटक सें( the hindu)

2013-11772,

2014-12360,

2015-12602

2016-6667+200 केवल पांच राज्यों से मध्य प्रदेश महाराष्ट्र कर्नाटक तेलंगाना और तमिलनाडु में किसानों ने आत्महत्या की 2016 में 1983 किसानों ने केवल मध्यप्रदेश में आत्महत्या की। सभी आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो गृह मंत्रालय द्वारा जारी की गई है। सभी किसानों के मृत्यु एक आंकड़े बनकर कागजात पर ही रह गए हैं और शायद हमारी सरकार ने इसके लिए कोई ठोस कदम उठाया है हमारे देश के गणमान्य व्यापारी इस देश से हजारों करोड़ रुपए लूट कर विदेश में जाकर मस्ती कर रहे हैं और हमारे देश को चलाने वाले हमारे देश की रीड की हड्डी यहां के किसान अपनी जान से हाथ धो रहे हैं। अगर यह सिलसिला अभी नहीं रुका तो हमारे पास आंकड़े के सिवा कुछ नहीं रह जाएंगे।

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