सजा देने का काम मीडिया का तो कतई नहीं

Posted by Maneesh Tiwari
November 16, 2017

Self-Published

गुलाब कोठारी को खुला खत

आदरणीय गुलाब कोठारी जी
सादर नमस्कार
कोठारी जी आपकी लेखनी का प्रशसंक रहा हूं लेकिन इस पत्र को लिखने का मकसद आपकी लेखनी की तारीफ करना नहीं है। दरअसल पिछले कुछ दिनों से आपके अखबार में एक ताला लगा देख रहा हूं। पहले तो सोचा कि जिस तरह से आपके दूसरे अभियान जैसे हमराह, तालाब सफाई और दूसरे कार्यक्रमों का हश्र होता रहा है आपकी टीम एक दो दिन काम कर तस्वीरें अपने एडीशन में छापकर कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है सोचा था इसका भी वही अंजाम होगा लेकिन यह अभी भी जारी है।
कोठारी जी न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि आप राजस्थान सरकार के प्रति पूर्वाग्रह से होकर काम करते रहे हैं। चाहे वह अखबार को विज्ञापन न दिए जाने का मामला हो या फिर शहरों के मास्टर प्लान या कुछ और .. आपकी लेखनी में राजस्थान सरकार के खिलाफ कटुता दिखाई देती रही है। वैसे भी सरकारों और प्रेस के बीच मनमुटाव होना स्वाभाविक है। मतभेद हो सकते हैं लेकिन इस सरकार के लिए मतभेद अब मनभेद की स्थिति में आते नजर आ रहे हैं।
सागर विश्वविद्यालय और माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में हमें पहले ही लैक्चर में सिखाया गया था कि मीडिया का अर्थ माध्यम होता है। माध्यम जनता और पाठक की आवाज को उचित माध्यम तक पहुंचाना चाहे वह मंच फिर सरकारे हों या अधिकारी … यह काम राजस्थान पत्रिका हो या फिर हमारी गली से निकलने वाले एक अदना सा दैनिक बदस्तूर करता रहा है।
अब सवाल यह है कि अगर राजस्थान सरकार ने तानाशाही तरीके से एक गलत कानून लेकर आई है तो उसके विरोध का यह कौन सा तरीका है। कि आप उनकी खबरे प्रकाशित नहीं करेंगे। क्या यह भी एक तरह की तानाशाही नहीं है। माध्यम कैसे एक तरफा हो सकता है। सरकारों को आप कैसे बैन कर सकते हैं। करोड़ों लोगों ने इस सरकार को चुना है। लोगों के फायदे और नुकसान के लिए सरकार जो फैसला लेती है उसकी जानकारी को आप कैसे बैन कर सकते हैं। माखनलाल में हमारे एक प्रोफेसर देवव्रत सिंह ने एक बार कहा था कि आप मुख्यमंत्री से सवाल कर सकते हो लेकिन आप उसे प्रभावित कराकर अपना काम कराने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि मुख्यमंत्री से आपकी नजदीकी आपकी डयूटी है नाकि आपका अधिकार..होने को तो ड्राइवर भी मुख्यमंत्री के बगल में और बराबरी में बैठता है लेकिन वह ड्राइवर ही रहता है। इसी तरह से मीडिया महज एक माध्यम ही है। माध्यम को नीति नियंता बनने की भूल नहीं करनी चाहिए..
कोठारी जी , मैं आप जैसा विद्वान नहीं हूं ना ही मुझे इसका भरम है.. लेकिन मै यह मानता हूं कि पहली बात तो करोड़ों लोगों के द्वारा चुने गए नेता को बैन करने का अधिकार किसी को नहीं है ना तो अखबार को न किसी दूसरे को.. अगर जनता के हित के खिलाफ सरकारें फैसले ले रहीं है तो आप अपने अखबार को काला कर सकते हैं। पहला पेज काला कर सकते हैं पूरे अखबार को काला कर सकते हैं. विरोध का कोई और दूसरा तरीका अपना सकते हैं। अदालतें इस पर फैसले दे सकती हैं। अदालत जाया जा सकता है। अखबार से लेकर सोशल मीडिया तक इस पर जनमत संग्रह किया जा सकता है। विद्वजनों और लोगों की राय प्रकाशित की जा सकती है लेकिन ताला लगाना एक गलत परंपरा है। कौन सी सरकार अपने लोगों के लिए काम नहीं करती.. कौन सी सरकार गलत फैसला नहीं करती लेकिन उसे सजा देने का काम मीडिया का तो कतई नहीं हैं ना..
अदालतें और चुनाव इसका फैसला करें तो सही हैं। यदि मीडिया की बात करें तो मीडिया कौन सी दूध की धुली है। कितने मीडिया घरानों ने पत्रकारों को मजीठिया जैसे हक दिए हैं। अखबार के साथ लाटरी सिस्टम से ईनाम देकर प्रलोभन देना, ये कौन सी पत्रकारिता है। विभिन्न आफर के नाम पर तेल साबुन, मसाले आदि बांटकर पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करना तो पत्रकारिता नहीं है ना ही कोई मिशन है। आपके पास अखबार में दर्जनों पन्ने हैं उसमें अग्रलेख लिखिए, लोगों की प्रतिक्रियाएं लीजिए..जनता को सोचने दीजिए.. पाठकों को उनके हक से वंचित न करें.. यह गलत परंपरा है.. यदि यह जारी रही तो इसके गंभीर परिणाम होंगे…
यदि कुछ गलत लिखा हो तो क्षमा करें..
आपका शुभेच्छु
मनीष तिवारी

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