समाज को तोड़ने के लिए आरक्षण का नाम ही काफी है।

Posted by Abhimanyu Kumar
November 7, 2017

आरक्षण वो कड़ी है जो समाज को जोड़ने का काम कम और तोड़ने का ज्यादा करता है। अगर समाज रूपी मकान की कल्पना की जाए तो आरक्षण ऐसा डाइनामाइट है जिसे मकान(समाज)को गिराने के लिए जरूरत पड़ने ही नही देती इसका नाम मात्र ही डाइनामाइट का परिचायक है। जैसे पुराण में वर्णित कथनानुसार कलयुग में भगवान का नाम संकीर्तन ही मनुष्य के मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। ठीक उसी प्रकार आज के इस दौर में सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए आरक्षण का नाम ही काफी है। अगर सही मायने में आरक्षण के साथ छेड़छाड़ हुआ तो महाभारत की रुपरेखा तैयार हो सकती है। अगर हम आरक्षण की तुलना प्राकृतिक व्यवस्था से करे तो क्रमशः ओजोन परत को क्लोरो फ्लोरो कार्बन और वायुमण्डल में वायु प्रदूषण को कार्बन मोनोऑक्साइड एवं नाइट्रोजन जिस तरह से वातवरण को क्रमशः क्षरण को बढ़ा रहे है और वायुमंडल को चिमनी भट्टा बना देता है। ठीक इसी प्रकार सरकार क्रमशः आरक्षण का नाम लेकर और बढ़ावा देकर सामाजिक वातावरण को दूषित और सामाजिक समरसता को क्षय करता है। एक समाज दूसरे समाज का दुश्मन बन जाता है जो सामाजिक समरसता और एकात्म मानववाद का गला घोंट देता है। आरक्षण था आरक्षण है आरक्षण रहना भी चाहिए लेकिन उसका राजनीतिकरण न हो उसे उसके सही हकदार तक पहुँचना चाहिए।

अब विषय पे आते है जिस तरह से पिछले दिनों बिहार सरकार द्वारा आउटसोर्सिंग से होने वाले भर्ती में रोस्टर सिस्टम हो फॉलो करने का दिशा-निर्देश अपने मंत्रिमंडल के बैठक में दी है। ओ प्रतिभा का गला घोंटकर मारने से कम नही है। ठीक है कि सरकार अपनी सफाई देती है कि हम सिर्फ उसी आउटसोर्सिंग नौकरी में रोस्टर सिस्टम को फॉलो करेंगे जिससे में सरकार पैसा वहन करती है। लेकिन ये भी तो विचारणीय है कि आखिर क्या कारण है जो आजादी के इतने वर्षों के बाद भी आरक्षण की ही जरूरत है ठीक है की जमींदारों ने शोषितो का शोषण किया लेकिन अब जमींदारी हटे हुए भी तो दशको गुजर गए। अब नव नव जमींदार यानी पिछले ढाई दशको से तो आप हो फिर भी क्यो बढ़ाने की जरूरत आन पड़ी हम यह भी मानते है कि जमींदार कोई तीन-चार जाति विशेष के होते थे वो अब भी सामंती है इसका मतलब वो सामंती जातियों को आप आरक्षण नही देना चाहते मंजूर है मत दो लेकिन शोषित जातियों में से वैसे लोगो को भी तो बाहर निकालो जो एक बार आरक्षण का लाभ ले चुके है और अपने ही स्वजतियो भाइयो का हकमारी कर रहे है अगर सरकार इस पे भी अपना ध्यान आकर्षित करे तो हमे पूर्ण आशा है कि किसी भी सेक्टर में आरक्षण पुनः बढ़ाने की जरूरत नही पड़ेगी लेकिन सरकार तो सरकार ठहरी अगर आप कुत्ते के पूछ को कितना भी सीधा करोगे ओ पुनः अपने स्वस्थान को ही आ जायेगा।

अंत मे मैं कहना चाहूंगा कि महँगाई, बेरोज़गारी, आम मेहनतकश परिवारों के बेटो बेटियां के लगातार छिनते अधिकारों, धनी-ग़रीब के बीच की लगातार बढ़ती खाई, लगातार बढ़ती देशी-विदेशी पूँजीवादी लूट-खसोट जैसे तमाम मसले, भ्रस्टाचार, शिक्षा का चौपाटीकरण जो ज्यादा तेजी से ज्वलन्त होते जा रहे थे, एक बार फिर पीछे धकेल दिये गये हैं। आम जनता और विशेषकर उसके वे नौजवान बेटे-बेटियाँ ही जातिगत लाइन पर आपस में बँट गये हैं, जिनके कन्धों पर तानाशाही, नौकरशाही और भ्रस्टाचारो के विरुद्ध संघर्ष छेड़कर जनमुक्ति की नयी परियोजना को अमली जामा पहनाने  की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी थी ।

 

 

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