सम-विषम से आगे की सोचो

Posted by Kumar Deepak
November 11, 2017

Self-Published

 

वायु प्रदुषण की समस्या का कोई एक कारण हो ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा भी नहीं की बड़े शहरों की आबो हवा में ही स्वछन्द तैरते खतरनाक रसायनिक और विषैले धूल-कण उपस्थित हैं अपितू ये समस्या हमारे देश के मंझोले और छोटे शहरों में भी एक भयावह स्तर तक पहुँच चुकी है।लेकिन चर्चा के केंद्र में देश की राजधानी हैं और क्यों ना हो जब दिल्ली की हवा में ये स्वछन्द तैरते हुए कण (सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर्स/SPM) की मात्रा विश्व के अन्य शहरों की अपेक्षा सबसे खतरनाक स्तर पे हों।जी हाँ हमारे देश की राजधानी की वायु विश्व के अन्य शहरों के मुकाबले सबसे जहरीली और प्रदूषित हैं।पिछले साल विश्व स्वास्थ संगठन की एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि दुनिया के 20 सबसे जादा वायु प्रदूषित शहरों में अकेले भारत के 13 शहरों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।स्थितियां शर्मनाक हैं और शर्मसार भी करती हैं तब जबकि भारत दुनिया में जलवायु परिवर्तन और इससे होने वाले पारितान्त्रिक विघटन को कम करने हेतु अपनी एक वैश्विक नेतृत्व क्षमता का परिचय विगत 4 दशकों से बहुत प्रमाणिकता के साथ निरंतर देता आ रहा है।

तो चर्चा कि जड़ में दिल्ली और प्रदेश कि सरकार है।दिल्ली क़ी आम आदमी दल क़ी सरकार ने वायु में भयावह स्तर पे पहुँच चुके स्वछन्द तैरते हुए कण, SPM क़ी अतयधिक् मात्रा को देखते हुए एक नीतिगत ‘सम-विषम’ प्रारूप को लागु करने का निर्णय लिया।इसके तहत शहर के अंदर सम और विषम संख्या वाली चार पहिया वाहन, सम और विषम संख्या क़ी तारीखों के क्रमश चलेंगी।भारी उपापोह क़ी स्थिति के बाद प्रदेश क़ी केजरीवाल सरकार ने इसे 15 दिनों के प्रयोग के तौर पे लागु किया।मैं सरकार के उंन किसी भी प्रयाशों का स्वागत करूँगा जो वर्त्तमान में वायु प्रदुषण को कम करने हेतु लिए जाएंगे।और अगर प्रदेश क़ी सरकार इस तरह के किसी भी मॉडल को लागु करती हैं तो मेरा मानना है क़ी जनहित में दलगत भावनाओं से ऊपर होकर सरकार के इस कदम का व्यापक समर्थन करें।मैं अपने आलेख में कोई राजनितिक चर्चा नहीं करना चाहता।हाँ इस बात के ऊपर भी बल देना होगा क़ी क्या वायु प्रदुषण के इस गंभीर संकट से लड़ने के लिए शहर क़ी जनता और प्रदेश क़ी सरकार उतनी ही चिंतित है।संभव है कि सरकार को भी कठोर निर्णय लेना पड़े और जनता को भी इस विषम परिस्थिति से लड़ने के लिए तत्पर और तैयार रहना होगा।

विश्व स्वास्थ संगठन कि रिपोर्ट में हवा में उपस्थित SPM के वैसे कण जिनका व्यास 2.5 mm से कम हो वैसे PM(2.5) कणो कि मात्रा सामान्य से 15 गुना जादा पायी गयी जो 153 mg/m3 थी।WHO के अनुसार PM (2.5) कणो कि मात्रा समान्य में 10 mg /m3 से जादा नहीं होनी चाहिए।WHO कि रिपोर्ट में SPM के वैसे कणो कि मात्रा जिनका आकर 2.5 mm से 10 mm के बीच कि होती हैं PM (10) कि मात्रा भी समान्य से बहुत जादा पायी गयी।लेकिन PM (2.5) कि मात्रा का बढ़ना दिल्लीवालों के लिए जादा चिंता का विषय है…PM (2.5) कि मात्रा समान्य से 15 गुनी जादा हो तो कैंसर और स्वास्थ जनित गंभीर बिमारियों के होने की सम्भावना बढ़ जाती हैं।

 

हलाकि WHO की ये रिपोर्ट आये भी साल भर के ऊपर हो गए।ऐसा भी नहीं की दिल्ली की वायु में PM (2.5) और PM (10) की मात्रा को ले कर दिल्ली प्रदेश के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट बहुत अच्छी हो।विगत में दिल्ली के वायु प्रदुषण के ऊपर जितने भी रिपोर्ट प्रकाशित हुए हैं उनमे SPM की मात्रा समान्य से खतरनाक स्तर पे बताई गयी हैं।वर्तमान में वायु में PM (2.5) की मात्रा कई जगहों पर 243mg /m3 से 286 mg /m3 के खतरनाक स्तर पे है। तू तू मैं मैं से स्थितियां और ख़राब होती चली जाएंगी क्यूंकि दिल्ली के वायु प्रदुषण के लिए वाह कारक भी जिम्मेदार हैं जिनमे पावर प्लांट से उत्सर्जित गैस और पडोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा के खेतों में फसलों के अवशेषों के जलाने से उत्त्पन उत्सर्जन।तो क्या दिल्ली के ऊपर विषैले स्वछन्द तैरते हुए कणो को कम करने के सरकारी प्रयाश महज दिखावा मात्र हैं या सरकारी तंत्र को दिल्ली के गैस गुब्बारे में तब्दील हो जाना एक समान्य बात लग रही है। चलिए सरकार ने एक प्रारूप का परिक्षण नव वर्ष के आगमन से ही किया।सरकार के इस प्रयोग को सफलता या असफलता की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। अगर सरकार को अपेक्षित सफलता भी मिलती है तो भी ‘सम-विषम’ प्रारूप के साथ साथ एक व्यापक दीर्घकालिक नीति बनानी पड़ेंगी।हाँ सरकार की जिम्मेदारी जादा होगी।सरकार को दिल्ली जैसे संघीय राज्य में केंद्र सरकार के साथ परस्पर सहयोग और सामंजस्य बनाकर चलना होगा। प्रदेश की जनता के वयापक हित का ख्याल रखने के साथ ये भी तैय करना होगा की दिल्ली एक शहर ही नहीं अपितू देश की राजधानी है और दिल्ली की जहरीली वायु से दुनिया को क्या सन्देश जा रही होंगी इसका अंदाजा देश और प्रदेश की सरकारों को हो जाना चाहिए।

सरकारों को अपना नीतिगत प्रारूप जनता के व्यापक हित में तैयार करनी होगी।इसके लिए सरकार को सड़क,संचार और संसाधन पर दीर्घकालिक और अल्पकालिक नीति निर्धारण करनी होंगी। हलाकि दिल्ली ने पिछले एक दशकों में सडकों का जाल बिछाया है और दिल्ली की मेट्रो रेल सेवा दुनिया के उन्नत यातायात के साधनो में से एक हैं। बढ़ती जनसँख्या और रोजगार हेतु दूसरे राज्यों से पलायन कर आने वाले लोगों की एक बड़ी संख्या भी प्रदेश के सरकार के लिए चिंता का विषय है जो सरकार की नीतियों को बहुत हद तक प्रभावित करती हैं।भारत के दूसरे राज्यों की आर्थिक विपन्नता भी दिल्ली की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं।लेकिन प्रदेश की पिछली सरकारें भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल और अप्रभावी रही हैं।

 

प्रदेश की सरकार को एक सुदृढ़ आसान और समतुल्य जन यातायात प्रारूप को विकसित करना होगा।पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को जनता के लिए प्रभावी बनाना होगा।एक जन-वातावरण बनानी होगी जहाँ लोगों को अपनी निजी वाहनो का उपयोग कम से कमतर करने हेतु सामानांतर एक सुदृढ़ इंटीग्रेटेड पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क सिस्टम विकसित करने के दीर्घकालिक नीति पे काम करना होगा।सरकार अल्पकालिक नीति के तहत अपने सरकारी कार्यालयों और शिक्षा के संस्थानों के अंदर कमसे कम इतनी व्यवस्था तो कर ही सकती हैं की अपने सरकारी अधिकारीयों, कर्मचारियों,शिक्षकों और छात्रों को अपने स्तर पे बस सेवा मुहैया कराये और अनिवार्य करे की बस सेवा छोड़कर वो लोग अपने निजी वाहनो से ना आयें। सरकारी संस्थानों के ५०० मीटर के सीमा के अंदर किसी भी निजी वाहनो के घुसने से प्रतिवन्धित किया जाए और इसका उल्लंघन करनेवालों के ऊपर सख्त से सख्त आर्थिक दंड निर्धारित किये जाएँ।सरकार को पर्यावरण संरक्षण कानूनो और वायु प्रदुषण नियंत्रण कानून को प्रभावी तरीके से लागु कराना होगा। विगत में सरकार ने कुकुरमुत्ते की तरह उगते दिल्ली के कल-कारखानो के ऊपर पर्यावरण सम्बंधित कानून का उलंघन करने पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया। सरकार ने कभी भी कारखानो के पुराने और विमार तकनीकों को चरणबद्ध समय के अंदर परिवर्तित कराने और वैसे सयन्त्रों को उपलब्ध कराने में मदद नहीं की जिनसे नियंत्रित मात्रा में कार्बन और प्रदूषक गैस का उत्सर्जन होता हो। सरकार को तकनिकी यंत्रों को उपलब्ध कराने की दिशा में सार्थक नीति और वित्तीय वयवस्था तैयार करनी होगी। असफल पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क ने निजी वाहनो के क्रय की ओर अग्रसारित किया और आज दिल्ली में डीज़ल और पेट्रोल जनित गाडिओं की भरमार है। हद इतनी हो गयी की सरकार राष्ट्रीय हरित ट्रिब्यूनल के फैसले को भी लागु नहीं करा पायी जिनमे 10 और 15 साल की क्रमशः डीज़ल और पेट्रोल की गाडिओं के ऊपर तात्कालिक रोक लगाने का निर्देश जारी किया गया था। दिल्ली में साइकिल के लिए अतिरिक्त लेन बनाने होंगे ताकि लोग साइकिल से आसानी से जा सकें। लोगों को साइकिल चलाने के लिए प्रेरित करना होगा। 

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दिल्ली के वायु प्रदुषण को ले कर वर्तमान में दिल्ली एनसीआर के आस-पास चल रहे रियल एस्टेट के निर्माण का भी बड़ा योगदान है। मैं भ्रस्टाचार शब्द का प्रयोग नहीं करूँगा लेकिन सरकारी तंत्र भ्रस्टाचार और काला-बाजारी पे नियंत्रण करे तो अँधा-धुंध हो रही गाड़ियों की खरीद विक्री में कमी आएगी क्यूंकि लोग गलत तरीके से अर्जित आय से गाड़ियों का उपयोग कर रहे हैं। दिल्ली को एक कारगर कचरा प्रबंधन तकनीक विकसित करनी ही पड़ेगी जहाँ कचरों का इन्सिनेरशन को पूरी तरह से बंद किया जाये। सरकार की ‘सम-विषम’ प्रारूप को अपेक्षित सफलता ना भी मिले फिर भी सरकार की कोशिश की स्वागत होनी चाहिए। देश और प्रदेश की सरकारों को कारगर और सरल कदम उठाने की जरुरत है जिसके अंदर सरकार को बेवजह के आतंरिक खर्चों में कटौती करनी पड़ेंगी।अगर सरकारी कार्यालयों को केन्द्रीयकृत इंटरनेट और आईटी टूल्स से जोड़ दिया जाए तो कर्मचारियों और अधिकारीयों के बीच एक समन्वय बना रहेगा।घर बैठ कर बहुत सारे कार्यों का निष्पादन बहुत ही अच्छे तरीके से किया जा सकता है।इससे कार्यकुशलता के साथ कार्यों के निष्पादन की गति को तीव्र किया जा सकता है और कार्यों में पारदर्शिता भी लाई जा सकती है। दिल्ली के लोगों को सरल और सादा जीवन पद्धति अपनानी होगी और जीवन के उच्तर मापदंड तैय करने होंगे की उनके जीवन में शुद्ध वायु,जल और मिटटी की भूमिका अहम है।एक स्वस्थ मानवीय पारितंत्र ही स्वस्थ शहर का निर्माण करती है।आएं सरकार और हम मिलकर दिल्ली के पारितंत्र को स्वस्थ बनायें।

 

 

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