साहित्य सिनेमा का धूप छांव वाला रिश्ता

Posted by Syedstauheed
November 9, 2017

Self-Published

एक मर्तबा एक युवा लेखक निर्देशक मनीष झा के जरिए  ‘अनवर’ के निर्माता राजेश सिंह से मिलने आए तो बहुत नेगेटिव वेलकम हुआ एवं कहा गया कि ‘मनीष झा का नाम भी लिया तो आफिस में घुुसने नहीं दिया जाएगा..उसे समझ नहीं आया कि आखिर इस आदमी को हुआ क्या ? राजेश सिंह ख्वाबों के नगर मुम्बई में बहुत से उम्मीदों के साथ आए थे..लेकिन उन्हें सक्षम निर्देशकों ने भी निराश किया, राजेश सिंह का ख़राब व्यवहार उसी अनुभव से बना था..वो  युवा लेखक नहीं समझ पा रहा था कि आखिर मनीष झा ने ‘ अनवर’ की  पटकथा सुनाने के लिए राजेश को किस तरह मनाया  होगा ! संज्ञान रहे कि  मनीष झा की ‘अनवर’  प्रियमवद की कहानी ‘फागुन की आत्मकथा’ से प्रेरित थी.  सुपरिचित फिल्मकार सागर सरहदी ने कभी ‘चौसर’ का निर्माण किया था. लेकिन यह दिन का उजाला नहीं देख सकी.आपकी यह फिल्म राम जनम पाठक की कहानी ‘बंदूक’ पर आधारित थी. कथा सेक्यूरिटी गार्ड की नौकरी तलाश कर रहे व्यक्ति के संघर्ष से जुड़ी थी.लेकिन सरहदी साहेब  कथा का फिल्म में ठीक से रूपांतरण नही कर सके. आपके प्रयास नाकाफी मालूम पड़े.जिस किसी ने फिल्म की पहली झलक देखी,वो थोड़ा उदास हुआ..क्योंकि सरहदी साहेब का नाम सिलसिला,कभी-कभी एवं बाज़ार समान फिल्मों के साथ जुड़ा था. साहित्य का फिल्म में रूपांतरण में प्रकाश झा की ‘दामुल’ याद आती है.दामुल कथाकार शैवाल की कहानी से प्रेरित थी.प्रकाश झा की ही एक अन्य फिल्म ‘परिणति’ भी बीज्जी (विजयदान देथा ) की एक कहानी का सिनेमाई रूपांतरण थी .परिणति की नियति इस कदर मार्मिक चित्र रही कि आप कथा में आगे फ़िर कोई संघर्ष नहीं चाहते.

..साहित्य से रूपांतरित हुई फिल्में बाक्स-आफिस से नाता कायम नहीं कर सकीं.साह्त्यि से उस कदर इंसाफ नहीं कर सकीं.समझ में नहीं आता कि हम साहित्य को सिनेमा में रूचिकर क्यों नहीं ढाल पाते ? साहित्य एवं सिनेमा माध्यमों की जरूरतों को समझना होगा…हमारे समक्ष बहुत से सुंदर उदाहरणों की भी कमी नहीं. मिस्टर एवं मिसेज अय्यर जिन्होंने भी देखी उसे पसंद किया. अब उस ‘गुस्ताखी अंखियों ‘वाला गाना ही देखें.गाना ठीक उस वक्त शुरु हुआ जब एक बुजुर्ग पति -पत्नी (भीष्म साहनी -सुरेखा सिकरी ) उठकर कर जाने लगे.फ़िर वो कमाल के शॉट्स…समुद्र तट पे खाली पड़ी बियर की बोतलें..ड्राइवर का ब्रश करता शॉट, फ़िर वाहनों की लम्बी कतार का दृश्य भी देखें.हां वो एक शॉट जिसमें ट्रक ड्राइवर  की पत्नी उसे चाय लाकर देती है..प्रेम का एक बिम्ब बनके उभरा था..पार्श्व मे उस समय चले सम्वाद ..’किस सूरत णु मैं चा खावा (इस लम्हे के वक्त भला मैं चाय कैसे पी सकता हूं !) गाने को उस्ताद सुल्तान खान ने आवाज़ दी थी. इस मुस्लिम बुजुर्ग के किरदार में भीष्म साहनी को देखा जा सकता है. साहनी ने ‘मोहन जोशी हाज़िर हों’ में भी रोल अदा किया था. अस्सी के दशक में गोविंद निहलानी ने आपकी रचना ‘तमस’ पर धारावाहिक का निर्माण किया था. टेलीविजन की बात करें तो साहित्य का सिनेमा से बेहतर रूपांतरण.जिसमे वर्त्तमान समय तक निरंतरता कायम है. समानांतर सिनेमा ने साहित्य के रूपांतरण की अच्छी परम्परा कायम की थी.एक मायने में टेलीविजन पर साहित्य की उडाने इसी से प्रेरित रहीं.गुलज़ार ने मध्य धारा में रहकर भी आंधी एवं मौसम समान फिल्में बनाई.यह दोनों फिल्में कमलेश्वर की रचनाओं पर आधारित थी.गुलज़ार ने आगे जाकर टीवी पर भी साहित्य आधारित सफल सिरीज़ का निर्माण /निर्देशन किया.

शैलेन्द्र की ‘तीसरी कसम’ मेनस्ट्रीम हिन्दी सिनेमा में साहित्य का बेहतरीन रूपांतरण थी.तीसरी कसम की बात चल रही तो हमें प्रेमचंद की भी बात करनी होगी.आपकी कथा मज़दूर पर मिल मज़दूर बनी.फ़िर गोदान एवम दो बैलों की कथा पर भी बेहतरीन फिल्मों का निर्माण हुआ.कृशन चोपड़ा ने ‘दो बैलों की कथा’ पर हीरा -मोती बनाई.बलराज साहनी ने फिल्म में मुख्य किरदार निभाया.गुलेरी जी की कृति ‘उसने कहा था ‘ का सफल फिल्मांतरण भी सराहनीय -सफल प्रयासों में शामिल किया जाएगा.नब्बे के दशक में आई सुभाष अग्रवाल की ‘रूई का बोझ ‘ ने सिनेमा में साह्त्यि के सिल्वर लाईन को कायम रखा.पंकज कपूर फिल्म की जान थे.सुभाष जी की फिल्म चंद्र किशोर जायसवाल की रचना पर आधारित थी.विशाल भारद्वाज ने अंग्रेजी साह्त्यि को हिन्दी सिनेमा में लाकर एक नयी उम्मीद बनाई .आपने विशेषकर शेक्सपियर की कृतियों को अपनाया. तीसरी कसम फणीश्वरनाथ रेणु की रचना का सिनेमाई प्रतिबिम्ब बनके उभरी.महान कथाकार रेणु ने अनेक स्मरणीय कहानियां व उपन्यास लिखे.रेणु जी ने स्वयं को लेखक परिधि से आगे सामाजिक एक्टिविस्ट भी समझा.आपकी ‘ मैला आंचल ‘ व ‘परती परिकथा’ इसका जीवंत उदाहरण कही जानी चाहिए. टेलीविजन पर ‘मैला आंचल ‘ पर इसी नाम से धारावाहिक का निर्माण हुआ. वो टीवी के गोल्डन एज के दिन थे. आंखो के लिए विजुअल अनुभव बनाने में रेणु बेजोड़ थे.आपकी रचनाओं से गुजरते हुए किसी फिल्म को देखने का अनुभव होता है..आम आदमी के सम्वाद..जिस किस्म के ‘तीसरी कसम ‘ में आए …’ जाने क्या है इस महुआ घटवारिन की कथा में कि दोनों बैल कान लगाकर सुनने लगते हैं ‘ ! महुआ की कथा हीरामन-हीराबाई के दरम्यान  प्रेम का कारण बनते हुए उस कदर नहीं दिखाई गई.लेखक ‘महुआ घटवारिन’ स्थान की व्याख्या तरफ़ अधिक झुके नज़र आए…रेणु ने कथा को आमजन के लिए आम जन द्वारा बनाकर पेश किया.आप में कथा को डेमोक्रेटिक टच देने का कमाल था..हीरामन भोला ज़रूर था लेकिन वो बेवकूफ नही था…जब एक राहगीर गाड़ीवान ने उससे पूछा..कहां जा रहे हो? हीरामन का जवाब देखें ‘ छतरपुर पछीरा ‘ ! आगे वो हीराबाई से कहता है..यह लोग हैं न हमेशा टोक देते हैं,इनको कोई दूसरा काम ही नहीं…अरे हमको कहीं भी जाना है.. तुमको जहां जाना है जाओ ! रेणु जी की बात चल रही तो हमें उनकी कथा ‘ठेस’ को नहीं भूलना चाहिए..क्या कमाल की कहानी थी वो, सर्वश्रेष्ठ..मुख्य पात्र सिरचन का परिचय ही देखिए..सिरचन मुंहजोर है कामचोर नहीं.

आज़ादी के बाद बदलते भारतीय परिवेश को दिखाने में गोदान,राग दरबारी एवं मैला आंचल की विशेष योगदान रहा.राग दरबारी का टीवी में रूपांतरण भी हुआ,इसे एफटीआईआई के कृष्ण राघव लेकर आए थे. इस संदर्भ में मनोहर श्याम जोशी भी याद आते हैं.आपने कमाल हसन की फिल्मों के सम्वाद लिखने के साथ -साथ हमलोग,बुनियाद एवम काकाजी कहीन समान मिल के पत्थर धारावाहिको को लिखा.आपकी पुस्तक ‘कुरु कुरु स्वाहा ‘ हिन्दी साहित्य में विशेष स्थान रखती है.आज के महत्वपूर्ण लेखक उदय प्रकाश की रचना ‘मोहनदास’ पर मजहर कामरान ने जबरदस्त फिल्म का निर्माण किया. मजहर कामरान को हम सत्या,कौन,मस्ती,झंकार बिट्स एवं तरकीब के लिए जानते हैं. मोहनदास का प्रभाव हमें लम्बे समय तक उद्वेलित करता है.व्यवस्था पर विचार एवं उस पर सवाल खड़े करने की शक्ति देता है….फिर भी सोचता हूं कि साहित्य से सिनेमा में आए बड़े बड़े लेखक आखिर लम्बी पारी क्यों नहीं खेल सके,क्यों नहीं सफल पटकथा -लेखक बन सके ? साहित्य से सिनेमा में आए बहुत से नामों को इतिहास ने आखिर क्यों नहीं याद रखा ? जबकि हिन्दी सिनेमा का इतिहास गवाह रहेगा कि महान फ़िल्मकारों ने हमेशा साहित्य परम्परा वाले लेखकों से सेवाएं ली..फिर भी सिनेमा साहित्यकारों को रास नहीं आया.

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.