हमारी ZNMD!

Posted by Kritesh Patel
November 19, 2017

Self-Published

निकले तो थे हम ‘ज़िन्दगी ना मिलेगी दुबारा’ देख के। मन मे भी बस वही था। सब अपने-अपने जगहों से इस मंज़िल के लिए आये थे। 4 साल बीत गए थे उन नादानियों और बेवकूफियों को, सब कँही न कँही ज़िन्दगी को जोड़ रहे थे आसमां में तैरने के लिए। कोई कँही, कोई कँही, पर हाँ हम सब जुड़े थे उन धागों से जो आज से 10 साल पहले गाँठ बने थे।
स्टेशन पर जब एक दूसरे को देखा तो ऐसा लगा मानो अब भी हम वही हैं जो कभी साईकल तो कभी ऑटो से घूमा करते थे एक दूसरे के घर, पर इस बार ना किसी का घर था ना ही किसी का अड्डा, था तो बस एक ही जगह सिक्किम। जो कभी यूँ ही हम में से किसी पागल के दिमाग को बहुत पहले से खुजलाये पड़ा था। और उस खुजली की दवा हम पाँच मिल के ढूँढने निकले थे। हिमालय की घाटियों में, उसके कलकल बहते पानी मे, उन हरी-भरी बूटियों में।
हम सब ही शाँत थे और शायद तन्हा भी। जब गदराए पहाड़ों और सफेद फेन से बेहते झरनों को देखा तो ऐसा लगा मानो
बस निकाल फेकना चाहते थे हम उन राखों को जो ना जाने कब से अंदर ही अंदर पड़ा हमें सुलगा रहा था।
हम बस थे वँहा, जँहा सब ही बेचैन हो पहुँचते हैं।
हम भी बेचैन थे। कुछ खुद से तो कुछ उस से।
हम फिर जगे थे वँहा। इस बार आंख नही मला था हमने, इससे बार ठंडे तीस्ता के असंख्य बाँहों का टेक लिया था। इस बार वँहा सोने की तैयारी थी। इस बार उसे जीने की तैयारी थी।

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