हवा हूँ हवा मैं विषैली हवा हू

Posted by राजीव रंजन
November 14, 2017

Self-Published

हिन्दी के एक मशहूर कवि केदारनाथ अग्रवाल ने एक कविता लिखी है जिसका शीर्षक है ‘बसंती हवा’। उस कविता में हवा कहती है हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ । भारत में बसंत ऋतु की हवा को सबसे अच्छी, मादक और मस्त हवा माना जाता है । बसंत का दूसरा नाम ऋतुराज है । पर, एक दूसरी ऋतु भी है शरद । यह बसंत से कम महत्त्व की नहीं है । अपने पुराने ऋषि-मुनि कहा करते थे कि कर्म कराते हुए सौ शारदों तक जीने की इच्छा रखनी चाहिए । यानी, शरद उनके लिए बसंत से भी अच्छा था। उस जमाने में शरद का मान  बसंत से कहीं अधिक रहा होगा । या कम से कम ऋषि-मुनि जैसे सादगी से जीने वाले लोगों के लिए यह ऋतु अधिक सुखकर होगी । कहाँ बसंत की रंगीनी, मस्ती और मादकता और कहाँ तपस्या से शुभ्र निरभ्र दीपित व्यक्तित्व । कहाँ मेल है भला ? सो, उन्होने बसंत की जगह शरद को चुना । शरद का बी मिजाज तो उन्हीं की तरह शांत सौम्य लेकिन दीप्त है । खुला आसमान, खिली धूप सुबह और शाम की हवा में हलकी ख़ुनकी । शरीरो को निरोग, स्वस्थ बनाने वाली और मन को निष्पाप सुंदरता से भर देने वाली तपस्वी की तरह ही खुली, सुंदर, सुरुचि सम्पन्न किन्तु बिना लाग-लपेट, तड़क-भड़क के भी मन मोह लेने वाली ऋतु।

      शरद की रातें भी स्वच्छ और सुंदर होते हैं । तारों से भारी-पूरी जगमग चाँदनी रात। इतनी स्वच्छ और सफ़ेद कि तुलना में कोई भी सफ़ेद चीज फीकी लगे।  तभी तो भारतीय लोकमान ने इन रातों में अमृत वर्षा की कल्पना कर ली । दशरा, दीवाली ही नहीं, शरद पूर्णिमा का भी अपना महत्त्व है। शरदपूर्णिमा यानी अमृत की रात । लोग मानते हैं कि आज की रात चंद्रमा की रोशनी में अमृत की बूंदे बरसाती हैं । इसलिए एक पात्र में खुले आसमान के नीचे खीर रखने का चलन है, हमारे देश में । ऐसा मानते हाँ कि इसे खाकर हमारा तन मन निरुज हो जाएगा। यही नहीं यह देवताओं की दीवाली का दिन भी है । महादेवनागरी काशी में गंगा घाट पर जगमागाते दिए आसमान के तारों को चुनौती देते हैं। उनकी रोशनी में डूबी ही गंगा की घातें सचमुच स्वर्गीय आभा देती हैं। इनही कारणों से शरद का हमारे देश में खास महत्त्व रहा है ।

      लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से दिल्ली में रहते हुए मैंने यह महसूस किया कि यहाँ शरद का सौंदर्य दुर्लभ है। शहर की चकाचौंध की भीड़ में गुम आकाशीय तारे और प्रकाश के वृत्त की परिधि को तोड़ने में अक्षम रहने वाले चाँद के कारण नाही, बल्कि ढूंढ की एक गहरी मोती परत के कारण, जिसे भेदना उनके लिए काफी मुश्किल है । दिल्ली अमृतसर हाइवे के पास बसा एक मुहल्ला गांधी विहार, जहां पिचाले दस सालों से रहना हुआ । दूसरी कालोनियों की तुलना में अधिक खुला था। उसके पीछे धीरपुर प्रोजेक्ट की खुली जमीन थी । कालोनी के बाहरी छोर पर एक महान की बरसाती अपनी रिहाइश थी, जहां खादें होकर अक्सर हम सामने की सड़क की ओर देखते और पाते कि रात नहीं, बल्कि दिन ही में यह सदका घने दुन्ध से घिरी दिखती। शहर के दूसरे हिस्सों में बिलड़ीगेन और भीड़भाड़ के बीच इस धुंध का असर थोड़ा कम पड़ता हो, लेकिन यहाँ हवा की सतह पर बैठी दुन्ध परत-दर-परत हमारी आँखों के छेंके रहती । आजकल जबकि मीडिया ने इस धुंध को नोटिश किया । पूरे दिल्ली में इसे पर्यावरणीय आपात की तरह महसूस किया गया और इसकी पद छाप पूरे उत्तर भारत में महसूस की गई तब मुझे अपने मित्र का एक कथन बार-बार याद आरहा है, “भाई यह शहर एक दिन धुंध में खो जाएगा।” और मेरा मन आगे जोड़ देता “और फिर भारतीय इतिहास का एक नया मोहन जुदाडों होगा यह । मोहन जादाडों, यानी मृतकों का टीला । पुराने से ज्यादा भयावह, ज्यादा खतरनाक और ज्यादा समृद्ध ऐतिहासिक कबाडों वाला। शायद ! हम इसके साक्षी होंगे या शायद ! भोक्ता । फिर मन सिहर जाता आगे सोचने की हिम्मत ही न होती।

      जी हाँ, वह ठीक वही मौसम है, जिसकी चाँदनी, जिसका आकाश और जिसकी स्वच्छ हमारे पूर्वजों को इतना प्रिय थी। जिसमें टप-टप छूती हुई अमृत बूंदें इतनी प्रिय थीं कि मध्यएशिया या शायद उससे भी पश्चिम से उठे हुए उनके कदम इसके लोभ में सदियों से यहीं टीके रह गाए। पर, आज हमारे कदम उखाड़ जाना चाहते हैं। हमारे प्राण, हमारी साँसे हमारा जीवन सब उखड़कर मिट जाने को बाध्य हैं, हमने इस धुंध के आगे अपने घुटने टेक दिए हैं और हम इस जहरीली हवा को अपने फेफ़ेड़े में उतारने के लिए विवश हैं।

      इधर मीडिया ने कारनों के अंबार लगा दिए। किसी ने पटाखों की बात की तो किसी ने पुआल की और किसी ने भलस्वा के कचरों में आग की । पर ये सब तात्कालिक कारण हैं । वास्तविक नहीं । सच तो तह है कि हमारी हवा जहरीली गैसों से सेचुरेटेड हो गई है और अधिक जहर वहन नहीं कर सकती । अपने में घुला-मिला लेने की उसकी क्षमता जवाब दे गई है । वह हमारी करतूतों के कालेपन को अब अधिक नहीं निभा सकती इसलिए उसे हमारे सामने उसकी कालिमा का पर्दा डालकर हमें आगाह कर रही है। यह धुआं न पुआल का धुआँ है और न पटाखों का यह उन गाड़ियों से निकाला है जिसपर छड़कर इठलाते हुए हम खुद को दुनिया का शहंशाह समझते हैं । दूरभाग्य वश दिल्ली में इन शहंशाहों की संख्या चरवृद्धि व्याज की दर से बढ़ रही है । यह हवाई कचरा हमारी औद्योगिक इकायों द्वारा हवा में छोड़ा गया अपशिष्ट है, जो दिल्ली के बाहरी इलाकों और एन सी आर की फाइटरियों से निकलकर हवा की डाक से दिल्ली आता है । पर, हम इन पर सवाल नहीं उठा सकते । शहंशाहों पर भला कोई सवाल उठा सका है अब तक ? फिर, उन गाड़ियों और फैक्ट्रियों वाले शाहंशाहों की बात ही क्यों की जाय ? क्यों न उन किसानों की बात की जाय जो अपने खेतों में पुआल जला रहे हैं । वे किसान जिनकी लागत उनकी उत्पादन कीमत के आसपास है । अपने खेतों को मशीनों से कटवानी जिनकी विवशता है क्योंकि महागाई और मानरेगा के इस दौर में मानवीय श्रम का खर्च वे नहीं उठा सकते । एक बार खेत कटवा लेने के बाद पुआल और दन्तक को फिर कटवाँ उनके लिए अलाभकर और खर्चीला काम ओटा है । इसलिए उसे जलाना आसान है। निस्संदेह किसानों को इससे बचाने की कोशिश करनी चाहिए । लेकिन, जो स्मप्पन हैं, जिनकी फैक्ट्रियाँ अहीन , वे इस शोधपर खर्च क्यों नहीं केरते कि पर्यावरण कि क्षति को कैसे न्यूनतम किया जाय और औदोगिक अपशिष्ट को किस तरह कम किया जाय । क्या उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, केवल किसान की भूमिका को ही प्रसनांकित किया जा सकता है ? क्या लोगों को गाड़ियों की संख्या बढ़ाने से हतोत्साहित नहीं किया जा सकता ? और, क्या सरकार और पूँजीपतियों की सम्मिलित भूमिका और जिम्मेदारे की बात नहीं की जा सकती । यदि नहीं, तो जाहीर है , बसनाती हवा की तरह ही शारदीया हवा भी कहने लेगे। हवा हूँ हवा जहरीली हवा हूँ ।

 

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