हिन्दी सिनेमा में जीवन का प्रतिबिंब

Posted by Syedstauheed
November 25, 2017

Self-Published

क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों कोई तमाम विपत्तियो के बावजूद विजय को प्राप्त करता है, तो कोई परिश्रम करके भी पराजित रहता है ? सीधे तौर पर देखें तो विषय शक्तिवान और दुर्बल के फ़र्क़ का मालूम होता है । अनेक लोग इसे किस्मत का खेल मानते है, इनका मानना है कि दुर्बल और भीरू व्यक्ति भी ‘जीवन’ मे सफ़ल हुए हैं। कुछेक मामलों मे ‘समर्थवान’ व्यक्ति असफ़ल रहे। इस तरह एक मान्यता के अनुरूप यह जरूरी नही कि हमे सबकुछ ‘क्षमताओं’ के हिसाब से प्राप्त हो, हाँ किस्मत का लिखा जरूर मिलता है । नियति या भाग्य की मान्यता को माना जाए तो कहा जा सकता है कि जीवन में ‘ समय से पहले और किस्मत से अधिक किसी को नही मिलता’ |

भाग्यवाद की मान्यता को महाभारत की घटना से भी शक्ति मिली, किस्सा कौरव-पांडव शत्रुता का है । पांडवों से अपनी दुश्मनी निकालने के लिए कौरवों ने उन्हे धोखे से विपत्ति युक्त ‘खांडवप्रस्थ’ भेज दिया, पर नियति ने खांडवप्रस्थ को रमणीय ‘इंद्रप्रस्थ’ मे परिवर्तित कर दिया । सेल्युलाइड पर आमिर खान की ‘गजनी’ मे भी ‘नियति’ के खेल को देखा जा सकता है, आमिर ने यहां एक धनी किन्तु क्रूर नियति की मार झेल रहे व्यक्ति की भूमिका निभाई है ।संजय सिघानिया की सुंदर दुनिया को गजनी धर्मात्मा की क्रूरता का सामना हुआ, फ़िर उसकी ज़िन्दगी तबाह हो गई ।
सिनेमा मे ‘भाग्य की अवधारणा’ कहानी, पात्र, हालात एवं गीतो के माध्यम से प्रस्तुत हुई ।सत्तर के दशक मे बडे बजट की फ़िल्मो के सामानांतर कम लागत वाली फ़िल्मों का चलन बढा ,बासु चटर्जी की ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी सी बात’ ऐसी ही फ़िल्में थी।अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा, सलिल चौधरी,योगेश की समानताओं और अन्य एकरुपता के साथ दोनो फ़िल्मे एक दूसरे की ‘विस्तार’ सी हैं । बासु चटर्जी की ‘छोटी सी बात’ मे नायिका का प्यार शर्मिले ‘नायक’ के लिए है, उसका भाग्य इस दृष्टि से ठीक नही कहा जा सकता कि ‘इज़हार’ करने मे नायक का ‘चरित्र’ ही बडी बाधा है । योगेश ने न जाने क्यूं होता है यह ज़िंदगी के साथ अभिनेत्री विद्या सिन्हा के उलझन भरे किरदार के लिखा।महानगर में काम करने वाली महिला की उलझन को इसमे देखा जा सकता है ।विद्या उलझन में हैं कि ‘प्यार’ के रुप मे वह बदलाव का स्वागत किस तरह करे, प्यार को लेकर उसे जल्द ही कोई फ़ैसला लेना होगा अन्यथा यह ‘बहार’ गुम हो जाएगी।वह अनचाही ‘नियति’ की परीक्षा मे घेर ली जाएगी । अभिनेता अमोल पालेकर का अंदाज़-ए-किरदार दीपा(विद्या सिन्हा) के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है, अब दीपा किस तरह अपनी चाहत को अभिव्यक्त करे? जवाब योगेश के शब्दों के माध्यम से मिल जाता है।इस तरह एक गीत के माध्यम से किरदार की किस्मत को पूरे प्रकाश मे रख दिया जाता है । अमोल पालेकर जैसे किरदार को ‘प्यार’ व्यक्त करने मे उलझन रही, ऐसे हालात से निपटने के लिए ‘ड्रीम सीक्वेन्स’ का प्रयोग हुआ।गीत ‘जानेमन जानेमन’ मे ‘स्वप्न’ को माध्यम बनाकर विद्या सिन्हा और अमोल पालेकर का ‘रोमांस’ रचा गया।

राजेश खन्ना अभिनीत ‘सफ़र’ में भी जिन्दगी के दोहरे और उलझ भरे पक्ष को बताने का प्रयास किया गया, फ़िल्म मे जीवन पर प्रकाश डालने वाले कुछेक सुंदर गीत दर्ज़ है । गीतकार इंदीवर के गीत : ‘नदिया चले रे धारा’ एवं साहिर के ‘ज़िंदगी का सफ़र है यह कैसा सफ़र’ जैसे गीत उम्दा यादगार गीतों मे शुमार हैं । गीतकार मे ‘नदिया’ मे जहां एक ओर जीवन को प्रवाहमय बताया है , वहीं ‘ज़िंदगी’ मे जीवन के उलझन भरे पक्ष का अन्वेषण किया है । इस तरह एक गीत में जहां कर्म को ‘सर्वोपरि’ , तो दूसरे गीत मे ‘नियति’ को बलवान कहा गया है । दोनो गीत अपने –अपने स्थान पर जीवन के दो पहलुओं को समझने में सार्थक और उपयोगी कहे जा सकते हैं ।हिन्दी सिनेमा में 70 के उत्तरार्ध तथा 80 के आरंभिक समय को अभिनेत्री रीना राय के उदयीमान कैरियर ‘समयकाल’ के रूप मे देखा जाता है ।इस समयकाल में रीना राय ने अपनापन, धनवान, अर्पण जैसी उल्लेखनीय फ़िल्मे की, रीना राय पर फ़िल्माए कुछेक स्मरणीय गीत उस वक्त के हस्ताक्षर के रूप मे उपस्थित हैं । जीवन और नियति को समझने मे यह गीत उपयोगी हो सकते हैं — आनंद बक्षी का ‘फ़िल्ममेयर’ से सम्मानित गीत ‘आदमी मुसाफ़िर है’ (अपनापन) जीवन का एक मार्मिक पक्ष बताता है । सफ़र कभी जीवन की एक सहज प्रक्रिया है ,तो कभी यह हमारी नियति का ही प्रतिरूप है । ‘आदमी मुसाफ़िर’ मे सफ़र को एक ओर सहज गतिविधि की नज़र से रखा गया, तो दूसरी तरफ़ इस सामान्य से प्रतीत होने वाली ‘दिनचर्या’ का मार्मिक पक्ष भी समझ मे आता है । बस पर यात्रा कर रहे अभिनेता सुधीर दल्वी और निवेदिता श्राफ़ पर विशेष तौर पर फ़िल्माए इस गीत में जितेन्द्र ,सुलक्षणा पंडित को भी दिखाया गया है । गीत को फ़िल्म में ‘थीम’ की तरह प्रयोग मे लाने का सफ़ल प्रयास हुआ, इसे कहानी के बीच-बीच में पार्श्व गान स्वरूप सुना जा सकता है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आनंद बक्षी, मो रफ़ी और लता मंगेशकर ने ‘आदमी मुसाफ़िर’ को स्मरणीय कर दिया।
फ़िल्मकार ह्रषिकेश मुखर्जी के निर्देशन मे बनी ‘आनंद’ (1971) के बाद योगेश को सिने जगत में उचित सम्मान मिला, फ़िल्म के कभी ना भुलाए जा सकने वाले गीत आज भी लोकप्रिय बने हुए हैं । कहा जाता है कि ह्रषिकेश जी को ‘आनंद’ बनाने की प्रेरणा मूलत: एक जापानी फ़िल्म मिली, आनंद मौत से जूझते पुरूष पात्र की कहानी है। ह्रषिकेश दा कर्म व भाग्य के परस्पर विरोधी स्वर से इस क़दर प्रोत्साहित हुए कि कहानी के केन्द्र में ‘महिला’ को रखकर ‘मिली’ भी बनाई । आनंद मौत से जूझते पुरूष पात्र की कहानी है। जिंदगी के महत्त्वपूर्ण पहलुओ को बताने वाले कुछ बेहतरीन गीत ह्रषिकेश मुखर्जी –राजेश खन्ना की ‘आनंद’ में दर्ज हैं :- ‘ज़िंदगी कैसी यह पहेली’, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ को सुनकर कर्म और नियति के ‘संघर्ष’ संवेदना को सहज ही ‘स्पर्श’ किया जा सकता है । गीतों मे ‘कहीं दूर जब दिन’ ज़िंदादिल ‘आनंद’ की ज़िंदगी के दर्दनाक पहलू को बता कर दर्शकों को सीधे उसकी मौत की याद दिलाता है । जबकि ‘पहेली’ मे जीवन को एक उलझन के रुप मे प्रस्तुत किया गया ,आनंद ज़िन्दगी की ‘असमानता’ को देखकर पीडित है। योगेश के गीत के माध्यम से आनंद जीवन की असमानता को व्यक्त करता है । जब आनंद का दुख शब्दों में बयान हुआ तो जीवन की एक नवीन अवधारणा सामने आई । जीवन में ‘कर्म उत्साह’ एवं ‘भाग्य पीडा’ के दो पाटो को इस गीत से समझा जा सकता है। ‘पहेली’ को मन्ना डे और ‘कहीं जब दिन’ को मुकेश ने अपने स्वरों से सजाया ।
ह्रषिकेश मुखर्जी की प्रस्तुति ‘गोलमाल’ में जिन्दगी को एक अलग अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया, फ़िल्म के गीत ‘आनेवाला पल जाने वाला’ में राहुल देव बर्मन, गुलज़ार व किशोर कुमार की टीम ने एक सहज प्रस्तुति दी । सरल तौर पर देखें तो यह एक ‘हल्का-फ़ुल्का’ गीत प्रतीत होता है । थोडा गौर करें तो ’आनेवाला पल’ की सहजता मे भी कर्म और नियति के संघर्ष को अनुभव किया जा सकता है । गुलज़ार ने एक ओर जिन्दगी को उत्साह के साथ भरपूर जीने का नुस्खा दिया, तो वही दूसरी तरफ़ जीवन-मृत्यु के पाटों का उल्लेख करने से भी नही चूके ।दरअसल गीत की संवेदना जीवन की नश्वर नियति से प्रेरित है , किसी एक पल में ‘हो सके तो ज़िन्दगी गुज़ार देने’की चाहत इश्वर की ओर से मिले नश्वर ‘जीवन’ से मिली है । मृत्यु की नियति अटल सत्य अवश्य है, परन्तु मौत के डर से जीना छोड देना कर्मवीर मनुष्य की पहचान नही है । कर्मवीर जिन्दगी के हरेक पल को ‘वरदान’ मानकर उत्साह व आनंद से जीने का संदेश लेकर चलता है ।

‘यह जीवन है (पिया का घर) गीतकार आनंद बक्षी की एक सरल व उत्तम रचना है, गीत में ज़िंदगी के स्वरूप को बता कर इसे सहजता से स्वीकार करने को कहा गया है । हज़ारो लोग बेहतर भविष्य की खोज में मायानगरी मुंबई का रुख करते हैं,पर क्या हर कोई इस प्रक्रिया मे सफ़ल भी होता है ? मुंबई ही क्या बल्कि किसी भी महानगर में संघर्ष एक कडवा सच है । दरअसल ‘किस्मत’ का फ़ार्मूला महानगरीय जीवन की उपज है ।कठिन संघर्ष मे ‘तकदीर’ की खोज स्वाभाविक अभिलाषा का प्रतिरूप कहा जा सकता है, सीमित अवसर भाग्यवादी मान्यता को मजबूत करते हैं । पिया का घर के ‘यह जीवन’ गीत में भीड और जगह की कमी को बताते हुए इसे मिले रूप में ‘स्वीकार’ करने को कहा गया । महानगर के आस-पास आबाद स्लम बस्तियां अमीर-गरीब खाई का प्रतिबिम्ब हैं । स्लम बस्तियों के बसने में ‘किस्मत का फ़ार्मूला’ काम करता है, छोटे नगरो से महानगर पहुंची आबादी का एक बडा हिस्सा दरअसल अपने को ‘भाग्य’ को आजमाने पहुंचता है ।

इसी तरह ‘ मै पल दो पल का शायर हूं (साहिर), संसार की हरेक शए का बस इतना फ़साना (साहिर), कोई लाख करे चतुराई, करम के लिखे मिटे न भाई (कवि प्रदीप), समझौता गमों से कर लो (इंदीवर),सजन रे झूठ मत बोलो (शैलेन्द्र), किसकी किस्मत में क्या लिखा कोई न जान पाए (कवि प्रदीप), हर कोई चाहता है एक मुटठी भर आसमान (इंदीवर), जीवन के सफ़र में राही मिलते हैं बिछड जाने को (साहिर), मत भूल मुसाफ़िर तुझे जाना पडेगा (केदार शर्मा), दो रंग दुनिया के (आनंद बक्षी), राही मनवा दुख की चिंता (मजरूह), एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल (मजरूह) और ऐसे बहुत से गीत जीवन को समझने मे कारगर हो सकते हैं ।

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