हृषिकेश मुखर्जी की सिनेमाई

Posted by Syedstauheed
November 10, 2017

Self-Published

मध्यवर्गीय मनोदशाओं के संवेदनशील  व अग्रणी प्रवक्ता हृषिकेश मुखर्जी हिंदी सिनेमा में विशेष महत्व रखते हैं । सामान्य मुख्यधारा से एक स्तर ऊंचा मुकाम रखती हैं हृषिदा की फ़िल्में। उनका सिनेमा एक रचनात्मक संवाद का दस्तावेज सा मालूम होता है, जिसमें मानवीय आचरण व व्यवहार की अनदेखी मीमांसा व्यक्त हुई है। उनके पात्र व कहानियां जीवन की एक विवेचना होकर भी उससे काफी निकट हैं। बनावटी प्रसंगों एवम तत्वों से प्रेरित कथानक यहां दिखाई नहीं देते।
उनकी सफलता जीवन के सहज- सरल स्वरूप में बसती है। हृषिदा का सिनेमा मानसिक बिम्बों को अलग- अलग नजरिए से व्यक्त करता है । हरेक पहल सबसे पहले घटनाओं को सरल तरीके से रखना चाहती है। उनकी फ़िल्में आंखों में खुशी और गम के आंसू सींच सकती है । आज के हिंसक-बर्बर एवम दिशाहीन समुदाय ने शायद ऐसी फ़िल्में कभी नहीं देखी हैं । मनोभावों की सतरंगी दुनिया से रू-ब-रू होना है तो हृषिकेश मुखर्जी की ओर लौटें । यदि किसी के भीतर का इंसान अब भी नहीं मरा तो ‘सुधार’ का एक मार्ग इधर से होकर भी है।

वहां आपको वो सबकुछ मिलेगा ,जो आज बडी मुश्किल से पर्दे पर नजर भी आता है। ना जाने क्यूं माध्यम का हरेअक फ्रेम बनावट के आगोश में चला जा रहा । दरअसल उस दौर की वापसी अब कठिन है। सकारात्मक विषयों की ओर लौटना स्वागत योग्य हो सकता है, ऐसा विचार निर्माताओं में है लेकिन अनुकूलन का स्तर बहुत निराश करता है । हृषिदा की दुनिया दरअसल उस स्वर्णिम दौर का जहान रहीं जब मुख्यधारा का स्वरूप बाज़ार द्वारा उतना अधिक तय नहीं हो रहा था । उनके सिनेमा में ‘मनोरंजक’ प्रस्तुति एक स्तर के अनुशासन के अधिन थी। उन्होंने बताया कि फ़ीचर फ़िल्मों में ‘मनोरंजन’ से आशय से क्या होना चाहिए। आज इस शब्द के भीतर से अपने-अपने ‘मुराद’ निकाले जा रहे हैं ।

 

उनकी फ़िल्मों से एक सकारात्मक उम्मीद सी है कि फ़िल्मकार दर्शकों का बेहतर मनोरंजन करता है । इनसे गुजरते हुए विचार बलवती होता है कि सामाजिक सेवा-भाव से प्ररित सिनेमा अनेक लोगों का कल्याण कर सकता है। हृषिकेश मुखर्जी के सिनेमा में सेवा-भाव की संवेदना दिखाई देती है । उनमें एक संवेदनशील हृदय का निवास था, जो फ़िल्मों को अर्थपूर्ण सम्प्रेषण का प्रारूप मानता था। उनकी फ़िल्मों में लोक-समाज को कुछ देने की कुव्वत थी। दर्शकों ने इन प्रस्तुतियों को तहेदिल से कुबूल किया । जोकि इस बात की मुक्कमल वजाहत है कि हृषिदा में सेवा भाव था। उनकी कहानियों में लोग अपनी जिंदगियों का अक्स देख सके थे। आनंद सहगल (आनंद) का ही उदाहरण लें जिसकी जीवनी से ना जाने लोगों को सार्थक जिंदगी की प्रेरणा मिली। न केवल आनंद बल्कि अनाडी से अनुपमा और अनुराधा से लेकर सत्यकाम फ़िर आशीर्वाद तथा मिली-गुड्डी-खूबसूरत भी जीवन के निकट थी ।

हृषिदा की कहानियां किसी अनजान देश की नहीं, इसलिए आम दर्शक इससे एक रिश्ता बना लेता है। सिनेमा को संवाद का एक- तरफा प्रारूप कहा जाता है, लेकिन फिर भी दर्शकों की आशाओं से परे नहीं। हृषिकेश मुखर्जी जैसे संकल्पवान फिल्मकार इसी सकरात्मक राह पर चलें । उन्होंने सिनेमा को लोक-सेवा के शस्त्र के तौर पर देखा था। वो नजरिया सिनेमा को रचनात्मक आडम्बरों की परिणति नहीं मानता था । अनावश्यक हस्तक्षेप से वस्तुओं का आनंदमय रूप कृत्रिम प्रारूप में परिवर्तित हो जाता है। अतिवादी नज़रिए को सीमा में रखकर निर्माण का वास्तविक आनंद उठाया जा सकता है । हृषिदा ने बताया कि भव्य लोकेशन व सेट्स फीचर- फ़िल्म को प्रभावी नहीं बनाते । फ़िल्मों की विवेचना ‘उपयोगी संवाद’ नज़रिए से करने पर हमें यह मर्म समझ में आता है। जीवन की विभिन्न परतों के संयमपूर्ण व उत्तम निरीक्षण से दिल को छु जाने वाली फ़िल्में बनाई जा सकती हैं । उनके सिनेमा में दिल को जीत लेने की कुव्वत थी (आज के परिप्रेक्ष्य में ‘दिल जीत लेना’ की मुराद सुविधा के हिसाब से है) इन फ़िल्मों को जब देखेंगे इश्क हो जाएगा,क्योंकि ‘मीर’ का अंदाजे बयान ही कुछ ऐसा था। कुछ यश चोपडा साहेब को हिंदी सिनेमा का ‘मीर’ कहते हैं। मेरे नजरिए से हृषिकेश मुखर्जी भी मीर हैं। उसकी ओर लौटना एक जोश-ए-जुनून को पाना है। क्योंकि उसमें किसी के मन में इंसानियत के लिए मुहब्बत जगाने की बात थी।

सितारों की पोपुलर छवियों को चुनौती देकर हृषिदा ने अच्छा काम किया। इस पहल से स्टार का दर्जा रखने वाले कलाकारों को शिल्प का रूतबा समझ आया। लाईमलाइट की दुनिया में अमरता का मार्ग अर्थपूर्ण प्रस्तुतियों से मिलता है। साठ और सत्तर दशक में बेशुमार फ़िल्में बनी। यह सिलसिला आज भी रफ्तार से जारी है । कलाकारों की एक लंबी फेहरिस्त है। स्टार भी इसमें आते हैं। समझदार सितारे भव्य से अधिक ‘महत्त्वपूर्ण’ फिल्मों पर जोर देते रहे हैं। इस स्तर की प्रस्तुतियों में निभाया गया किरदार स्मृतियों में काफी समय तक रहता है। कभी-कभी दर्शक इसे आजीवन भूला नहीं पाता। हृषिदा ने चोटी के कलाकारों को लीक से हटकर किरदार दिए। जो आगे चलकर उनके लिए काफी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं साबित हुईं । इस तरह उन्हें सितारों की छवि से हटाकर किरदार का महत्त्व बताया। इस खासियत की वजह से हृषिदा को काफी सम्मान मिला। राजेश खन्ना, अमिताभ, धर्मेन्द्र,शर्मिला टेगोर और रेखा के समूचे कैरियर में इन हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मों का बडा महत्त्व है। इन फ़िल्मों ने इन्हें सामान्य से कुछ हटकर चुनौती दी। परिवर्तन के नजरिए से एक आशावान पहल।

विज्ञान के छात्र होने के नाते उन्होंने स्वयं को भावी विज्ञान शिक्षक रूप में देखा होगा, किंतु कौन जानता था कि एक अलाहयदा मंजिल उनका इंतज़ार कर रही है। रसायन में स्नातक हृषीकेश ने कुछ समय के लिए गणित और विज्ञान पढाया भी,पर जाना कहीं और था। फोटोग्राफी में रूचि ने ‘न्यू थियेटर्स’ कोलकाता साथ काम करने का एक छोटा अवसर दिया, लैब सहायक का काम मिला। काम करते हुए फ़िल्म उद्योग के बारे में बहुत कुछ सीख लिया। एक करीबी मित्र इसी कंपनी में ‘संपादक’ का काम भी देख रहा था, खाली समय मित्र के पास बैठकर ज्ञान में इजाफा करने का शौक हुआ। संगत में संपादन प्रक्रिया के बारे में समझ हुई । शीघ्र ही वह विषय पर उपयोगी मशविरा देने की सीढी तक पहुंचे। इस तरह संपादक मित्र को अक्सर काम में सहयोग करते। संयोग से हृषीदा की काबलियत ने बिमल राय का ध्यान खींचा, जल्द ही ‘तपीश’ के लिए साईन कर लिया गया। अपनी क्षमता को लेकर हृषीदा में हांलाकि आत्मविश्वास की थोडी कमी थी, फिर भी अवसर की चुनौती को स्वीकार किया। इस क्षेत्र में सफल होने बाद, वह एक बार फिर शिक्षा की ओर आकर्षित हुए, उच्चशिक्षा के लिए स्टुडियो छोडने का अप्रत्याशित निर्णय लिया। लेकिन बिमलदा ने उन्हें रोका ।

बिमल राय उन दिनों कलकत्ता से बंबई जाने की योजना बना रहे थे। बाम्बे टाकीज से उन्हें बुलावा भी था। उन्होंने हृषीकेश को भी चलने कहा जिस पर हृषीदा बंबई(मुंबई) आ गये । यहां आने बाद फिर मुडकर नहीं देखा। बिमल राय ने अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘बिमल राय प्रोडक्शन’ को कायम कर उसके बैनर तले ‘दो बीघा जमीन’ का निर्माण किया। फ़िल्म को देश-विदेश में जबरदस्त सराहना मिली। कम ही लोग जानते हैं कि ‘दो बीघा जमीन’ सलील चौधरी की एक रचना पर आधारित है। हृषीकेश मुखर्जी फ़िल्म के मुख्य सहायक निर्देशक व संपादक हैं। बिमल राय के सान्निध्य में रहते हुए फ़िल्म बनाने का ख्वाब दिल में पल रहा था। हृषीदा एक आत्मनिर्भर निर्देशक की पहचान बनाने अग्रसर हुए। बिमल राय की ‘दो बीघा जमीन’ के निर्माण दरम्यान उनका ध्यान पास के एक मकान ओर आकर्षित हुआ। इससे उनकी कल्पना आंदोलित हुई, दिन गुजरने साथ उस दुनिया के जादू में खुद को गिरफ्त पाया। यह सिलसिला ‘मधुमती’ तक जारी रहा। फ़िल्म ‘मुसाफिर’ इसी संक्रमण की एक अभिव्यक्ति तौर पर देखी जा सकती है ।

हृषीकेश मुखर्जी जो ‘मधुमती’ का संपादन दायित्व निभा रहे थे, अक्सर उस मकान को जिज्ञासा से निहारा करते। उन्हें उन लोगों का ख्याल कौंध जाता, जो कभी वहां आबाद थे । उस मकान से दिलीप कुमार एवं हृषीदा को फ़िल्म का आइडिया मिला। इससे प्रेरित ‘मुसाफिर’ तीन परिवारों की दास्तान को बयान करती है। यह परिवार उस चाहरदीवारी में एक के बाद आकर रहे। पूरी कहानी को कथा को तीन हिस्सों में प्रस्तुत करती है ।इनमें केवल ‘मकान’ की समानता है। फ़िल्म बनाने के यह एक अच्छी थीम बनी, हिंदी सिनेमा में इस मिजाज की कहानी को अब तक नहीं आजमाया गया था। हृषीदा को विश्वास था कि यह प्रोजक्ट बाक्स-आफिस पर नहीं कारगर होगा, लेकिन दिलीप कुमार आश्वस्त रहे कि यह एक सफल उपक्रम है। नतीजतन दिलीप साहेब ने हृषीदा को इसके लिए हिम्मत व प्रोत्साहन दिया।

सुचित्रा सेन एवं शेखर इस ‘त्रयी’ का पहला, किशोर कुमार- निरूपा राय दूसरा जबकि दिलीप कुमार-उषा किरण-डेजी इरानी का हिस्सा एक वैचारिक समापन को दिशा देता है। जैसा कि हृषीदा का पूर्वानुमान था ‘मुसाफिर’ बाक्स-आफिस पर नहीं चल सकी,लेकिन फिर भी गुणवत्ता के स्तर पर फ़िल्म अपने समय से काफी आगे थी। निश्चित ही यदि ‘मुसाफिर’ पर पुनर्विचार किया जाए तो यह एक क्लासिक साबित होगी। इसकी गैर-पारंपरिक थीम हर समय में प्रशंसा बटोरेगी। फ़िल्म ने हृषीकेश मुखर्जी को राष्ट्र्पति का पदक दिया, राष्ट्रीय पुरस्कार निर्णायक मंडली का विशिष्ट प्रशस्ति पत्र भी मिला। यदि आज हम अतीत की ओर मुडकर देखें, विशेषकर टाईकास्ट हिंदी सिनेमा का जायजा लें तो ‘मुसाफिर’ को अपनी थीम कारण अलग से पहचाना जा सकता है ।

हृषीदा को पहली बडी सफलता राजकपूर-नूतन अभिनीत ‘अनाडी’ से मिली। बाक्स-आफिस पर जबरदस्त कामयाब हुई इस फिल्म का निर्माण एल बी लक्षमण ने किया था। उस वर्ष आयोजित पुरस्कार समारोहों में अधिकतर अवार्डस ‘अनाडी’ की झोली में आएं। शंकर-जयकिशन के सुरीले संगीत से सजी ‘अनाडी’एक आदर्शवादी युवा (राजकपूर) की कहानी है । अभिनेता को धनवान लोगों से मोहभंग है। हृषीकेश मुखर्जी का सिनेमा एक निश्चित संवेदनशीलता एवं करूणामय वातावरण का वाहक रहा है। इस संदर्भ में ललिता पवार की भूमिका का उल्लेख किया जा सकता है। वह जबान से कर्कश लेकिन रहमदिल स्त्री हैं ।

हृषीदा-लक्ष्मण की दोस्ती ‘अनुराधा’ की कामयाबी के साथ ऊंचाई पर पहुंची। इसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। सचिन भौमिक की एक लघु कहानी पर आधारित फ़िल्म में लीला नायडू-बलराज साहनी की मुख्य भूमिका थी। पंडित रविशंकर के संगीत से सजी ‘अनुराधा’ के गीत शैलेन्द्र ने लिखें। संगीत के नजरिए से रविशंकर जी की कुछेक दुर्लभ हिंदी फ़िल्मों से एक है । फ़िल्म एक आदर्शवादी चिकित्सक एवं कलाप्रेमी धर्मपत्नी की मर्मस्पर्शी कथा को बयान करती है । चिकित्सक ग्रामीण लोगों के स्वास्थ्य प्रति बहुत संवेदनशील है, वह अपनी सेवाएं वहां दे रहा है । कलाप्रेमी पत्नी एक सामान्य घरेलू जीवन से फ़िल्हाल संतुष्ट है, सारा समय गृहस्थी संवारने में बीता रही है। किंतु उसके मन में कलात्मक क्षमता को दिशा देने की कसक भी पल रही । इस इच्छा के परिणामसवरूप परिवार (बिटिया व पति) को त्याग कर अपने अमीर पिता के पास लौट आई। वह कलाक्षेत्र में कैरियर बनाने यहां चली आई है। अनुराधा (लीला नायडू) का यह अप्रत्याशित निर्णय भावात्मक ऊंचाई से हमें भाव-विभोर कर देता है। निश्चित ही ‘अनुराधा’ हिंदी सिनेमा की एक यादगार फ़िल्म है ।

अनुराधा बाद हृषीदा ने छाया, मेम दीदी, असली नकली, सांझ और सवेरा, दो दिल, अनुपमा, गबन, आशीर्वाद, सत्यकाम जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया। असली नकली पुर्वगामी अनुराधा से अलग तरह की फ़िल्म थी। हृषीदा-लक्ष्मण ने सफलता के लिए सबसे पुराने व अचूक फार्मूले का चयन किया। इसका निर्माण का कारण हांलाकि रहस्य सा प्रतीत होता है, लेकिन यह निश्चित रूप से बलराज साहनी-लीला नायडू अभिनीत कथा की बाक्स-आफिस प्रदर्शन से प्रेरित था। विविधता के लिहाज से सत्तर के दशक ने हृषीकेश मुखर्जी को ऊंचा मुकाम दिया। हृषीदा की सबसे बेहतरीन फ़िल्में इसी दरम्यान रिलीज हुईं थी। कहा जा सकता है कि वह एक बेहतरीन दौर –जिसमें आनंद, बुढ्ढा मिल गया ,गुड्डी , बावर्ची , अभिमान, नमक हराम,मिली, चुपके-चुपके, अर्जुन पंडित एवं गोलमाल जैसी फ़िल्में निकलकर आईं ।

एक दिलचस्प तथ्य ‘आनंद’ एवं राजकपूर से जुडा है । जब ‘आनंद’ रिलीज हुई, बहुत से लोग समझ नहीं सकें कि फ़िल्म ‘राजकपूर’ को क्यों समर्पित की गई है। दरअसल इसके गर्भ में एक मौलिक आधार राज- हृषीदा दोस्ती से जुडा है । एक समय में ‘आनंद’ की शीर्षक भूमिका के लिए हृषीदा ने राजकपूर का नाम सोंच रखा था। परदे पर कैंसर से जिंदादिली साथ संघर्ष करने वाले ‘आनंद सहगल’ का पात्र जीवंत करने के लिए राजसाहेब एक आदर्श अभिनेता थे। लेकिन साथ ही वे हृषीदा के बहुत प्रिय थे। राजकपूर को अपनी दूसरी ही फ़िल्म ‘अनाडी’ में लेने बाद हृषीदा के मन में उनके लिए खास जगह बन चुकी थी । आनंद की शीर्षक भूमिका के लिए राजकपूर को लिया जाना था। लेकिन बात न बन सकी, क्योंकि हृषीदा अपने प्रिय मित्र को फ़िल्म में भी मरता हुआ नहीं देखना चाहते थे। अंत में कैंसर रोगी का शीर्षक रोल उभरते हुए शीर्ष अभिनेता ‘राजेश खन्ना’ की तक़दीर बनी । हृषीदा बनावटी अभिनय के कभी पक्षधर नहीं रहे, उन्हें सात्विक भावनाओं से लगाव था । एक बेहतरीन शाट देकर अमिताभ ने बता दिया कि वह किरदार में हर तरह से फिट हैं । एक अंतर्गामी चिकित्सक की भूमिका में अमिताभ ने उम्दा प्रदर्शन किया। कैंसर पीडित ‘आनंद’ का इलाज करते हुए वह चिकित्सक मरीज का एक फिक्रमंद दोस्त हो जाता है । बहिर्गामी ‘आनंद’ से उसकी मित्रता असामान्य सी बात मालूम होती है , ना जाने क्यूं फिर भी विषय की जरूरत सी है । इन दोनों की दोस्ती में राजकपूर- हृषीकेश मुखर्जी के संबंधों का अक्स नजर आता है। कम ही लोग जानते हैं कि राजकपूर हृषीदा को ‘बाबूमुशाय’ ही संबोधित करते थे।

फ़िल्म के रिलीज होने पर राजेश खन्ना ने अपनी मां को इसे देखने से रोक दिया। दरअसल ‘सफर’ (राजेश खन्ना की एक और फ़िल्म जिसमें हीरो मर जाता है) के एक शो बाद उनकी मां सख्त बीमार पड गई। फ़िल्म में राजेश को मरता हुआ देखना मां को बहुत नाग़वार गुजरा। परदे की कहानी को असलियत जाना और गंभीर रूप से अस्वस्थ हुईं । हृषीदा की ‘आनंद’ राजेश खन्ना की सर्वाकालिक स्मरणीय भूमिकाओं में से एक है। संघर्षरत अमिताभ बच्चन के लिए भी यह एक निर्णायक मोड रही । कहा जाता है कि ‘बाबूमुशाय’ की भूमिका हांलाकि अमिताभ को मिली पर हृषीदा ने इसके लिए कभी महमूद साहब का नाम सोंच रखा था। महमूद ने तब के रूम पार्टनर अमिताभ को पात्र की बारिकियों ऊपर उपयोगी मशविरा दिया था । महमूद साहेब ने उन्हें मौत की प्रतिकिया को समझाया। हृषीदा ने ‘नमक हराम’ में राजेश खन्ना- अमिताभ को एक बार फिर आमने-सामने रखा। अभिनेता रजा मुराद को पहला ब्रेक इसी फ़िल्म से मिला । आनंद की कहानी को स्त्री पात्र के साथ ‘मिली’, बडे सितारों से सजी हास्य-प्रधान ‘चुपके-चुपके’ फिर उत्पल दत्त, आमोल पालेकर, बिंदिया गोस्वामी की ‘गोलमाल’ और रेखा अभिनीत ‘खूबसूरत’ उनकी कुछ और उल्लेखनीय फ़िल्में हैं । लेकिन आलाप, नरम-गरम, नामुम्किन, जुर्माना, बेमिसाल, रंग-बिरंगी, किसी से न कहना, झूठ बोले कौवा काटे जैसी फ़िल्में कुछ खास नहीं रही। यह फ़िल्में हृषीदा द्वारा स्वयं के लिए स्थापित मापदंडो पर खरी नहीं उतरती हैं। उल्लेखनीय है कि ‘झूठ बोले कौवा काटे’ के ऊपर हृषीकेश मुखर्जी ने काफी पहले सोंच रखा था। वह इसे गोलमाल, नरम-गरम जैसी कामेडी फ़िल्मों की अंतिम कडी अर्थात ‘त्रयी’ रूप में प्रस्तुत करने के इच्छुक थे । आमोल पालेकर व उत्पल दत्त को फिर से लेने की योजना थी, लेकिन फ़िल्म शुरू होने तक उत्पल दा नहीं थे, जबकि आमोल पालेकर युवा पात्र के दायरे में फिट बाक़ी नहीं रहे। ये पात्र अमरीश पुरी-अनिल कपूर ने निभाए।

हृषीकेश मुखर्जी ने बहुत से नए चेहरों को ‘सितारों’ के मुकाम तक पहुंचाया । इस संदर्भ में जया भादुडी का नाम उल्लेखनीय है । निश्चित ही ‘गुड्डी’ ने उन्हें एक स्वर्णिम शुरूआत दी ,जिसके बाद पीछे मुडकर नहीं देखा। गायिका ‘वाणी जयराम’ जया जैसी भाग्यशाली नहीं रहीं । गीत ‘बोले रे पपीहरा’ बाद वह लाइमलाईट से गायब सी हो गईं । हृषीदा ने ‘गुड्डी’ के लिए अमिताभ को भी साईन किया था। उन्हें अभिनेत्री के मूक प्रशंसक का रोल दिया जाना था । लेकिन इसी बीच अमिताभ ने ‘प्यार की कहानी’ साईन कर ली। इस नए प्रोजक्ट के बारे में सुनकार हृषीदा ने उन्हें ‘गुड्डी’ से हटा दिया। यह किरदार बांग्ला अभिनेता ‘समीत भंजो’ की झोली में गया । इस फ़िल्म के समय अमिताभ व जया दोनों नए चेहरे थे। धर्मेन्द्र व उत्पल दत्त ‘गुड्डी’ के एकमात्र सितारे हैं । अशोक कुमार को गायन को ओर आकृष्ट करने का श्रेय हृषीदा को ही दिया जाना चाहिए । उन्होंने दादामुनी को ‘आशीर्वाद’ में यह मौका दिया। अशोक कुमार ने गीत ‘रेलगाडी’ व ‘नांव चली’ को बहुत जिंदादिली से गाया। उन्होंने गायकी के इस दुर्लभ अनुभव का जमकर लुत्फ उठाया। इसकी खनक राष्ट्रीय पुरस्कारों में भी सुनाई दी। फ़िल्म की सफलता से निर्माता राज सिप्पी के साथ एक भव्य पारी का आगाज हुआ। हृषीदा के सेट्स पर ऊंच-नीच का कोई भेद-भाव नहीं रहा, सभी को एक नजरों से देखा जाता था। फ़िल्मी दुनिया व सितारों से जुडे अनेक मिथकों को तोड कर ‘गुड्डी’ ने एक विशेष पहचान बनाई । जया भादुडी (गुड्डी) रातों-रात सितारा बन चुकी थी । कुछ लोग अब भी उन्हें गुड्डी संबोधित करते हैं ।

हृषीकेश मुखर्जी की अच्छी फ़िल्मों में ‘बावर्ची’ भी उल्लेखनीय है । यह कहानी एक बंगाली फ़िल्म की रीमेक थी । मूल संस्करण में शीर्षक भूमिका रवि घोष ने जीवंत की। कहानी एक रसोईए के सदगुणों को प्रस्तुत करती है । वह परिवार में सदभाव व सामंजस्य भाव की महत्त्वपूर्ण कडी है । मूल विचार फ़िल्मकारों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत रहेगा। कहा जाता है कि ‘बावर्ची’ के मुख्य पात्र में हृषीदा ने अपने पिता का अक्स देखा था। कहा जा सकता है कि फ़िल्म उनके दिल के करीब थी । अभिनेत्री बिंदू को एक नयी छवि देने का श्रेय हृषीकेश मुखर्जी को जाता है । फ़िल्म ‘अभिमान’ में उन्हें एक नया जीवनदान मिला। अभी तक वह केवल ‘वैंप’ तक सीमित थीं । कटी पतंग, जंजीर और इम्तिहान के साथ स्वयं को स्थापित करने बाद बिंदू परिवर्तन के लिए बेचैन थीं। सौभाग्य से उन्हें यह ब्रेक ‘अभिमान’ में मिला। हृषीदा ने उन्हें एक कोमल दिल छवि का किरदार दिया। इसके बाद फ़िल्मकारों ने बिंदू में एक अलग छवि को पाया। वह फ़िल्मकार की ‘चैताली’ एवं ‘अर्जुन पंडित’ में भी इसी सकारात्मक छवि में नजर आती हैं ।

निर्देशक बनने से पहले हृषीदा ने संपादन व पटकथा लेखक का काम किया। बिमल राय की मां, दो बीघा जमीन, बिराज बहू, देवदास, मधुमती जैसी यादगार फ़िल्मों का पटकथा लेखन व सहायक निर्देशन किया । हृषीदा के संदर्भ में एक दिलचस्प पहलू उनकी टीम भावना से जुडा है। इस मामले में वह बेहद संवेदनशील रहे । यूनिट सदस्यों की निरंतरता को दूर सफर तक कायम रखा। यह परिवार एक संयुक्त परिवार सा मालूम होता था । अंत समय तक यूनिट में ‘परिवार भाव’ जीवित रखने के लिए प्रयासरत रहे । यूनिट में राजेंद्र सिंह बेदी (लेखक), जयवंत पठारे (कैमरामैन), द्वारिका नाथ मुखर्जी (सलाहकार) जैसे लोग लंबे समय तक रहे । फिर गुलजार, राही मासूम रज़ा, सचिन भौमिक, बिमल दत्त, अशोक रावत भी इस परिवार में थे । हृषीदा भारतीय सिनेमा के सबसे प्रिय फ़िल्मकारों में एक हैं । उनकी जादूगरी सिनेमा की भव्यता या गलेमर में नहीं। । उनकी फ़िल्में मध्यमवर्ग़ मनोवृत्तियों की संवेदनशील मीमांसा हैं । हृषीकेश मुखर्जी का सिनेमा आपके आंखों में आंसू ला सकता है, अनुराधा और सत्यकाम जैसी फ़िल्में बार-बार याद आती हैं । चुपके-चुपके’ और ‘गोलमाल’ को देखकर हंसी-ठहाका रोक पाना बेहद मुश्किल होगा । वहीं ‘आनंद’ के उमंग व उत्साह गूंज बीच दर्शक थोडी देर के लिए भूल जाता है कि दरअसल यह करूणामय दास्तान है ।

आज हृषीदा का महत्त्व पहले से कहीं ज्यादा है। उनकी फ़िल्में व किरदार एक कोमल स्पर्श हैं। कडवे अनुभवों की दुखद व त्रासद दुनिया में इस तरह के सकारात्मक प्रयासों की बडी जरूरत है। सिनेमा के माध्यम से समाज को विमर्श की ओर आकर्षित किया जा सकता है। सामाजिक मूल्यों के विघटन की रफ्तार पर मंथन आवश्यक है। इस संदर्भ में हृषीकेश मुखर्जी की फ़िल्में उपयोगी हो सकती हैं ।

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