2002 दंगे से ज्यादा बहुत कुछ था (आखरी)

Self-Published

दंगे, सिर्फ कुछ समय के लिये ही अपना असर समाज पर नही छोड़ते बल्कि पड़ियो तक इनकी दहसत रहती है, 1984 के समय सिख नरसंहार दिल्ली, कानपुर, ओर उत्तर प्रदेश या बिहार के कई क्षेत्रों तक ही सीमित था लेकिन इसका प्रभाव भारत के पूरे सिख समुदाय पर था, खासकर वह तबक्का जो पंजाब से बाहर रहता था, डर और भय के कारण हजारो की तादाद में सिख समुदाय ने अपना व्यपार यँहा तक कि सरकारी नोकरी तक छोड़ कर, एक महफूज जगह पंजाब की ओर रुख किया था, जँहा अमूमन एक सिख खुद को सुरक्षित समझता है, सुरक्षा का यही मापदंड, 2002 के दंगों में भी देखने को मिला.

यही पलायन 2002 में भी देखने को मिला था, साल 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वस्त होने से शहर में दंगे  तो जरूर हुये थे लेकिन बाबरी मस्जिद पर हो रही सियासत पर हमेशा के लिये पूर्ण विराम लग गया था, 92 से लेकर 2002 तक, अमूमन शहर शांत रहा था यही वजह थी की अब हिंदु मुस्लिम समाज में नफरत कम हो रही थी और कुछ मुस्लिम परिवार, पुराने शहर से बाहर आकर नये शहर में रहने लगे थे, बचचे भी नये ओर अच्छा स्कूल में जा रहे थे, मसलन मुस्लिम समाज में भी शिक्षा का स्तर ऊपर उठ रहा था वही पूरे समाज में जँहा भय का माहौल खत्म हो गया था वही व्यपारिक दृष्टि से ये समय व्यपार के लिये बहुत अनुकूल था, लेकिन 2002 के भयावह दंगो ने, समाज को एक नई दिशा दे दी.

हमारे घर, साल 2002 से पहले अक्सर सलीम सब्जी बेचने आता था, मूलतः ये गुजरात से बाहर के थे लेकिन यही हिंदू बस्ती में घर लेकर, अपने जीजा जी के साथ मिलकर सब्जी का व्यपार शुरू कर दिया था, जुबान में मिठास ओर अदब के कारण, पूरा परिवार इज्जत की जिंदगी बसर कर रहा था लेकिन 2002 की आग ने, सब कुछ तहस नहस कर दिया जँहा घर को आग लगा दी गयी, वही 27 फरवरी की रात को ही ये परिवार अहमदाबाद छोड़ कर किसी सुरक्षित जगह पर चला गया था, वापस आने में कई महीने मसलन साल से ऊपर हो गया था जँहा सिर्फ मर्द ही वापस आये थे लेकिन रोज का दिहाड़ी मजदूर किस तरह इतने लंबे समय तक, बिना काम के रोजी बसर कर सकता है, हालात क्या होंगे इसका अंदाजा लगया जा सकता है.

वही दूसरी तरफ, एक रईस इंसान घर से थोड़ी दूरी पर रहता था, घर तक ही सीमित रहने वाला ये इंसान का में नाम तक नही जानता, इस से इस इंसान का अदब हम समझ सकते है, लेकिन जँहा 2002 में घर को आग लगा दी गयी, वही ये परिवार दूसरी बार यँहा आने की हिम्मत नही जुटा पाया, इसी तरह पिछली कंपनी में एक सहकर्मी ने अपनी आप बीती सुनाई, मूलतः गुजराती मुसलमान, ये परिवार भी हिंदू बहु बस्ती में रहता था, दंगो के समय इनके हिंदू पड़ोसी ने महीनों तक इन्है अपने घर शरण दी, बल्कि हिफाजत भी की, वही इन्होंने आगे भी बताया की दंगो के समय इनके ही सहपाठियों ने इन्हें हिंदु बताकर दंगाइयों से बचाया था, बस समय के संभलते ही ये, अपना वह मकान बेच कर, मुस्लिम बहु इलाके में आ गये. लेकिन बहुत से ऐसे लोग थे जिन्होंने हालात से समझौता करके अपनी बहू मूल्य जायदाद कोड़ियों के दाम बेच कर, किराये के मकान में रहने के लिये मजबूर हो गये, कुछ मालिक थे अब दुसरो के यँहा नोकरी करने के लिये विवश थे, एक दिन में ही हालात कैसे बदल सकते है इसका जिंदा जागता सबूत 2002 के दंगे ही है.

ये 2002 के भयावह दंगो का ही असर था जँहा महिलाओ को खास निशाना बनाया जा रहा था, मुस्लिम समाज, अपने बहु इलाके में रहने के साथ खुद को यँहा ज्यादा महफूज कर रहा था वही हिंदू समाज और मुस्लिम समाज में अब दूरिया ओर बढ़ गयी थी, रिश्ते सिर्फ व्यवसाय तक ही सीमित रह गये थे, इसके आगे, दोनों सुमदायो में ना दिखने वाली जज्बाती लकीर फर्क कर रही थी. जँहा दिलो में फर्क आ गया था, जँहा मुस्लिम बढ़ती आबादी के तहत घुटता जा रहा था वंही नया अहमदाबाद, विकास की नई भूमिका प्रदान कर रहा था जँहा शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर एक सुखद जिंदगी के लिये हर सुविधा मौजूद थी.

मुस्लिम समाज, ज्यादतर व्यवसायी समाज है होटल, कारखाने इत्यादि में इनकी अहम भूमिका है, लेकिन ज्यादातर मुस्लिम समाज गरीब और ज्यादा शिक्षित नही है इसी के कारण मुख्यतः ऑटो गैरेज, इलेक्ट्रीशियन, ड्राइवर इत्यादि जगहों पर मुस्लिम कार्यकर ज्यादा पाये जाते है. लेकिन व्यवसाय के लिये तो मुस्लिम युवक को हिंदू समाज की ओर रुख करना पड़ता है जँहा अगर थोड़ा सा ध्यान दिया जाये तो, इन जगहों के नाम इस तरह रखे जाते है जिस से शुरुआत में ग्राहक को ये ना पता चले कि इसका मालिक एक मुसलमान है अन्यथा हो सकता है की हिंदू ग्राहक इस ओर रुख ना करे, नाम इस तरह के होंगे न्यू इंडिया, न्यू अहमदाबाद, परफैक्ट सर्विस इत्यादि, मेरा भी एक ऐसा अनुभव हुआ की मैं खुद भोचका रहा गया, सरदार रिंग रोड पर बरोडा एक्सप्रेस वे से आते समय सड़क की दूसरी तरफ दर्शन नाम का रेस्टोरेन्ट है, जब खाना खाने के बाद, युही सिक्योरिटी गार्ड से पता किया कि ये होटल किसका है तो उन्होंने अपने मुस्लिम मालिक का नाम दिया, मेरे लिये ये अचंभित ही था की एक मुस्लिम मालिक के होटल का नाम दर्शन कैसे हो सकता है ? सवाल भी खुद से था तो जवाब भी खुद से मिला कि अगर इस होटल का नाम अकबर, फ़ैज़, सरफराज होता तो क्या लोग यँहा खाना खाने आते ? हां मटन ओर चिकन की दुकान का नाम करण करने की चिंता नही होती, यँहा बहुताय समुदाय का नागरिक बेझिझक मांसाहार पर्दाथ खरीदने में कोई हिच किचाट नही करता.

लेकिन इस से भी भयावह स्थिति ये थी की नये उभर रहे  अहमदाबाद शहर में मुस्लिम।समुदाय के लिये जगह नही थी, अगर कोई नई बिल्डिंग बन रही हूं तो वँहा मकान खरीदने से लेकर किराये तक लेने में, एक मुस्लिम नाम सुन कर ही मना कर दिया जाता है, यही हाल कुछ स्कूलों का भी था, यँहा तक की कई।कोचिंग क्लास भी मुस्लिम नाम सुनकर, सीट ना होने का फरमान सुना दिया जाता है, यही वजह है की मुस्लिम बहुताय आबादी गरीब और अशिक्षित है, ज्यादातर गैरेज, कपड़ो के काम, इत्यादि रोज दिहाड़ी।तक सीमित है, अब जब व्यवस्था और समाज एक समुदाय के प्रति अपना फर्ज भूलकर, आँख मीच लेगा तो यकीनन समाज असुंतल ही रहेगा, ओर इसी पर पेक्ष में, समाज के विरोधी इस समाज की इस स्थिति का जरूर फायदा उठायेगे, जँहा 2002 को दिखाकर दहसत गर्द तैयार किये जाते है इसका स्रोत खुद दिल्ली पुलिस है, 2002 के दंगों के बाद देश में कई आत्मघाती और आंतकवादी हमले हुए, लेकिन ये दहशतगर्द कैसे पैदा हुए? इस पर कोर्ट में दिल्ली पुलिस द्वारा रखी गयी एक रिपोर्ट पढ़ने की ज़रूरत है। इसमें कहा गया है कि 2002 के गुजरात और 2012 के मुजफ्फरनगर के दंगों की बाद और अधिक युवा आतंकवाद की और मुड़े हैं। 2002 का अंसतुलन हमें इसके बाद कई जगह दिखाई दिया है, यँहा ये सोचने की जरूरत है की 2002 के बाद हुये सभी आतंकी हमलों में वह लोग कितने कसूरवार है जो 2002 का समर्थन करते है.

रिपोर्ट लिंक: http://www.deccanchronicle.com/nation/crime/211016/gujarat-muzaffarnagar-riots-led-youths-to-terrorism-delhi-police-tells-court.html

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