इस मास्क का अस्पतालों से निकलकर दिल्ली वालों के मुंह पर चिपक जाना बहुत खतरनाक है

Posted by Shambhavi Singh in Health and Life, Hindi
November 10, 2017

सुबह दफ्तर के लिए निकलो तो लोग चेहरे पर काला सफेद मास्क पहने दिख जाते है। हमारे दफ्तर में भी बातें होने लगी हैं कि हालत ऐसी है कि अब मास्क लेना ही पड़ेगा। बचपन में हम ऐसे मास्क अस्पताल जाने पर ही देखते थे, जहां डॉक्टर या अस्पताल के कर्मचारी या गिने-चुने मरीज इसे लगाए दिखते थे। इन्हें कहा भी सर्जिकल मास्क जाता है, लेकिन पिछले कुछ सालों से ये सिर्फ अस्पताल के अंदर डॉक्टरों या सर्जन तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि सड़कों पर उतर आया है। सड़कों पर घूम रहे लोग भी इसे लगाए दिख जाते हैं। वैसे तो कई शख्स हैं जो पूरे साल ही आपको इनके साथ दिख जाएंगे लेकिन सर्दी आने-आने तक इनकी तादाद बढ़ जाती है।

आखिर अस्पताल से सड़कों तक ये मास्क पहुंचे कैसे? तो इसका सीधा सा जवाब है इन्हें हमने ही लाया है, प्रदूषण के ज़रिये। सरकार ने किसानों को खेत में फसल अवशेष जलाने से रोका तो सरकार किसान विरोधी हो जाती है, सुप्रीम कोर्ट हमें दीवाली पर पटाखे फोड़ने से रोकती है तो हम कोर्ट को हिंदू विरोधी कहने लगते हैं, लेकिन ये नहीं सोचते की अगर हर साल खुद से ही इसपर नियंत्रण किया जाता तो शायद सुप्रीम कोर्ट या सरकार को रोक लगाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

ऑड इवन फाॅर्मूला की तारीफ सबने की, लेकिन बंद होने के बाद कितनों ने उसे जारी रखा? अगले दिन ही अपनी-अपनी गाड़ियां निकाल ली गईं और अब सरकार को ही कोस रहे हैं कि उसने प्रदूषण रोकने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया?

लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि हमने इसे रोकने के लिए क्या किया? हमारी समस्या ही यही है हमें चाहिए भी सब और करना भी कुछ नहीं है। सब ठीक हो जाए और हमारे सहूलियत में कोई तकलीफ भी न आए।

हवा की गुणवता बताने वाले सूचकांक के मुताबिक 500 अंक वाला सूचकांक उच्चतम खतरे का निशान है और अभी दशा ये है कि दिल्ली के हर इलाके में ये अंक 450 को पार कर गया है। दिल्ली की हवा में प्रदूषण का ज़हर पूरी तरह से घुल चुका है जो धीरे-धीरे लोगों को अपनी चपेट में लेने लगा है। इसका सबसे गहरा असर बच्चों, बुजुर्गों और दमा के मरीजों पर पड़ रहा है। बच्चों का स्कूल जाना तो बंद कर दिया गया लेकिन आप कब तक किसी को घर में कैद करके रखेंगे क्योंकि हम जिस तरह आगे बढ़ रहे हैं उसे देखकर ये तो नहीं लगता कि ये समस्या आने वाले भविष्य में कम होने वाली है।

हम अपनी ज़िंदगी में मिलने वाली सहूलियत के इतने आदि हो चुके हैं कि उससे बाहर आना हमारे लिए मुश्किल हो गया है। हम मास्क ले लेंगे, दवा के लिए भी पैसे खर्च कर देंगे, घर में प्यूरिफायर लगा देंंगे, लेकिन प्रदूषण कम करने के लिए कोई कदम नहीं उठाएंगे। घर में जितने लोग नहीं उतनी कारें हैं, गर्मी में हम पूरा-पूरा दिन AC में बैठते हैं। अगर आराम की बात करें तो स्थिति ऐसी है कि एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने पर हम सबसे पहले AC ही आॅन करते हैं, और फिर बात करते हैं प्रदूषण कम करने की।

हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक गैस-चेम्बर तैयार कर रहे हैं, जिसमें हम जानकर खुद तो जा ही रहें बल्कि उन्हें भी धकेल रहे हैं। सरकार को उसकी ज़िम्मेदारी याद दिलाने में हम सबसे आगे रहते हैं लेकिन कभी अपनी ज़िम्मेदारियों के बारे में सोचा है। कभी सोचा है हम क्या कर सकते हैं इसे रोकने के लिए। गाड़ियां साफ करने के लिए हम कई लीटर पानी बहा लेते हैं लेकिन कभी हुआ है कि दिन में थोड़ा सा समय निकालकर घर के बाहर भी पानी का छिड़काव कर दिया हो। पौधों की देखभाल में बहुत मेहनत है इसलिए हम घरों में प्लास्टिक के फूल-पौधे रखने लगे। अपनी गाड़ी से रोज़ जाने के बजाय कभी जन-परिवहन या कार पूलिंग का इस्तेमाल किया? घर में रहते हुए AC का सीमित इस्तेमाल करने की कोशिश की? हमें कोई कुछ ना करने को कहे लेकिन हम दूसरों को उनकी ज़िम्मेदारी याद अच्छे से दिलवा सकते हैं। हम जब तक अपनी ज़िम्मेदारी खुद नहीं समझेंगे तब तक सरकार, सुप्रीम कोर्ट या कोई भी एजेंसी कितने भी रोक लगा ले कोई असर नहीं होगा।

प्रदूषण के खिलाफ इस लड़ाई में देश के हर घर, हर शख्स की भागीदारी अहम है। वो कहते हैं न ‘charity begins at home’ वैसे ही सुधार भी घर से ही शुरू होता है और इसकी शुरुआत जितनी जल्दी हो जाए देश-दुनिया और हमारे भविष्य के लिए उतना ही अच्छा है।

 

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