एक आम आदमी की नज़र से देखिए कैसा रहा नोटबंदी का एक साल

Posted by Royal Monk in Hindi
November 9, 2017

8 नवम्बर शाम के 9बजे, मैं मुम्बई के लोकल बाज़ार में घूमकर अपने लॉज में अंदर घुसा तो लॉज का मालिक बहुत आश्चर्य से टीवी को घूरे जा रहा था। मैंने एक नज़र टीवी स्क्रीन पर दौड़ाई तो देखा हमेशा की तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने तथाकथित अंदाज़ में भाषण दे रहे थे। मैंने कोई खास ध्यान नहीं दिया, क्योंकि ये कोई नई बात नहीं थी। मैं तेज़ी से बेड की तरफ बढ़ा लेकिन झटके से फिर रुक गया। टीवी स्क्रीन पर हेडलाइन चल रही थी, ‘आज रात 12 बजे से 500 और 1000 के नोट मान्य नहीं होंगे।’ अचानक से झटका लगा। पूरी तरह से समझने के बाद मैं जल्दी से पास के एटीएम पहुंचा और जल्दी से ज़रूरी रकम निकाली।

फिर अगले दिन शुरू हुआ अफरातफरी का माहौल। राजनीतिक बयानबाज़ी और आम जनता की अग्नि परीक्षा। अग्नि परीक्षा अपने रोज़ के रोटी पानी का इंतज़ाम करने की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काले धन पर लगाम लगाने के लिए, इन बड़े नोटों को बंद कर दिया था और ज़्यादा से ज़्यादा डिजिटल लेनदेन करने की वकालत कर रहे थे। अगले दो तीन दिन एटीएम भी बंद रहें और जब वो खुले तो और भी  बड़ी दिक्कत। लाखों लोग अपना ही पैसा बैंक से निकलने के लिए एटीएम के बाहर लम्बी लम्बी लाइनों में लगे थे।

बाज़ार में 2000 का नया नोट आ गया था पर उसने दिक्कत और बढ़ा दी। सारा दिन लाइन में लगने के बाद बैंक सिर्फ 2000 का नया नोट दे रहा था और खुदरा विक्रेताओं के पास उसके बदले में खुले पैसे देने के लिए नहीं थे। रोज़मर्रा की चीज़ें खरीदना दैनिक मज़दूरों के लिए सबसे बड़ा प्रश्न बन गया था।

सरकार के इस कदम से काफी लोगों को बड़ा सदमा भी लगा, जिन्होंने ना जाने कितना पैसा जमा करके रखे थे। चोरी छिपे इधर-उधर 500 और 1000 के नोट फेंके जाने लगे। लेकिन आम जनता ने कहीं भी धैर्य नहीं खोया।

हालांकि कुछ लोगों की जाने भी गयीं। कुछ की शादियां कैंसिल हुईं या पोस्टपोन हुई और भी काफी तकलीफें आम जनता ने इस विश्वास के साथ उठाई कि चलो आगे राहत मिलेगी और इसका अच्छा फल मिलेगा। उधर मोदी जी सिर्फ 50 दिन का समय मांग रहे थे, वरना किसी भी चौराहे पर फांसी की सज़ा स्वीकार करने की बात कर रहे थे। ज़ाहिर है जनता उनपर भरोसा दिखा रही थीं।

अब नोटबन्दी के पूरे एक साल होने की बात करते हैं। सरकार ने इस दिन को  काला धन विरोधी दिवस  के रूप में मनाया और विपक्ष ने काले दिवस के रूप में। सरकार उसे देश के लिए लाभदायक बता रही और विपक्ष उसे संगठित लूट। नोटबन्दी के फैसले का क्या प्रभाव पड़ा आइये हम खुद ही देखते हैं।

क्या मिला देश को ?

  • नोटबन्दी के बाद देश में अचानक से डिजिटल लेनदेन का प्रतिशत बढ़ गया। इसमें 60 प्रतिशत से भी ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई।
  • पैसों का लेनदेन डिजिटल होने से, अब टैक्स चोरी की सम्भावनायें लगभग खत्म थी, इसलिये 2016-17 में लगभग  84 लाख नए करदाता जुड़े।
  • मोबाइल वॉलेट का प्रयोग बढ़ा। जनवरी 16 में ई-वॉलेट से सिर्फ 22.14 बिलियन का लेनदेन हुआ था। जो अगस्त 17 तक 72.65 बिलियन तक पहुंच गया।

देश ने क्या खोया ?

  • जैसा कि सब कयास लगा रहे थे, देश की जीडीपी को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। वो मार्च 16 में जहां 9.1 प्रतिशत पर थी, जुलाई 17 में घटकर 5.7 पर आ गिरी।
  • इसके अलावा छोटे दुकानदारों को काफी घाटा उठाना पड़ा। कुछ का तो व्यापार ही लगभग चौपट हो गया।
  • काफी लोगों को अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ के आंकलन के अनुसार, नोटबंदी के बाद पहले चार महीनों में 15 लाख लोगों ने रोज़गार गंवा दिया।

अगर हम इन आर्थिक आंकड़ों के इतर बात करें, तो सबसे पहला प्रश्न आता है काले धन का। क्या नोटबन्दी के बाद देश से काला धन खत्म हुआ या उसपर लगाम लगी ? सरकार तो इसका जवाब हां में दे रही लेकिन वास्तविकता कुछ और ही दिख रही है। नोटबन्दी के बाद ही सैकड़ों करोड़ की नई मुद्रा गुजरात के एक व्यापारी महेश शाह के पास पकड़ी गई। उसके पास इतनी नई मुद्रा कहां से आई?

दूसरी बात सरकार ने बार-बार नोट  बदलने के नियमों में बदलाव किए। और फिर जब 1000 और 500 के नोटों को बंद किया तो उससे भी बड़ा 2000 के नोट को चालू करने का क्या औचित्य?

निश्चित  तौर पर नोटबंदी  नरेंद्र मोदी द्वारा जल्दबाज़ी में लिया  गया एक साहसिक और हठी फैसला था, जिसके बारे में RBI के गवर्नर से सलाह लेना भी उचित नहीं समझ गया।और रही बात डिजिटल ट्रांसफर और कैशलैस इकोनॉमी की तो ये काम बिना नोटबन्दी के भी किये जा सकते थे। और फिर भी अगर ये कड़वी दवा पिलानी ही पड़ती तो कम-से-कम ज़रूरी संस्थानों और व्यक्तियों से सलाह लेनी चाहिए थी।

फिर भी  देश को नरेंद्र मोदी के साहसिक कदम के लिए आभार व्यक्त करना चाहिए और उसे लागू करने में हुई खामियों और दिक्कतों के लिए प्रधानमंत्री को अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए।

(यह लेख पहले www .praamod yogiraj .com पर प्रकाशित हुआ था )

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