हमारे जैसे आम लोगों के लिए बहुत खतरनाक है चुनाव आयोग का राजनीतिक मोह

25 अक्टूबर 1951 को आज़ाद भारत ने पहली बार आम चुनाव में हिस्सा लिया। मतदान की प्रक्रिया चार महीने तक चली और इसी के साथ भारत ने दुनिया में सबसे बड़ा लोकतंत्र बनने के लिए पहली सीढ़ी पर अपना कदम रखा। तब से लेकर आज तक भारत अपनी लोकतांत्रिक गरिमा को विश्व के सामने मिसाल के रूप रखता है।

“इतिहास का सबसे बड़ा जुआ” कहा गया वह भारतीय चुनाव आज व्यवस्थित मानवीय जीवन का पर्यायवाची बन गया है। कुछ अंग्रेज़ नुमाइंदों के मुताबिक वह लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की बेहूदा नौटंकी थी, यह बात अलग है कि वर्तमान समय मे वो नुमाइंदे अपने शब्दों पर सिर्फ अफसोस ही व्यक्त कर सकते हैं। भारत ने अशिक्षा और गरीबी को चुनावी व्यवस्था का रोड़ा न समझते हुए इनसे ऊपर उठकर इन्हीं की भलाई के लिए इन्हीं लोगों द्वारा एक ऐसी व्यवस्था तैयार की जो भविष्य में भारत की रूपरेखा, पहचान और आत्मा का काम करने वाली थी।

यह चुनाव इस बात का समझने के लिए काफ़ी था कि गरीब और अशिक्षित व्यक्ति भी मानवता के विकास, साझा विरासत और सहयोग जैसे मुद्दों को न सिर्फ समझता है बल्कि उन्हें लेकर उचित निर्णय लेने में भी सक्षम है। इस पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने का जिम्मा और सफलता का श्रेय चुनाव आयोग को जाता है। सुकुमार सेन ने स्वतंत्र भारत में होने जा रहे पहले चुनाव का खाका तैयार कर उसमें पूरी भारतीय व्यवस्था को समेट दिया।

भारत में होने वाले चुनाव सिर्फ इसलिए ख़ास नहीं थे क्योंकि वो भारत में पहली बार हो रहे थे बल्कि इसलिए भी खास थे क्योंकि इसमें मतदान करने वाली 80% आबादी अशिक्षित थी, इन्हीं चुनावों में पहली बार सार्वभौमिक मताधिकार व महिलाओं के मताधिकार को महत्व दिया गया था। यह उन अमीर और शिक्षित पश्चिमी देशों के लिए शर्म का अवसर था जिन्होंने महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखा था।

भारतीय चुनाव व्यवस्था व चुनाव आयोग की सफलता का बखान आज भी हर चुनाव के दौरान किया जाता है, लेकिन 1952 से 2017 तक आते-आते चुनाव अयोग की छवि कुछ धूमिल हो गई है। राजनीतिक षडयंत्रो के काले बादलों ने आयोग को अपनी चपेट में ले लिया लिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति हो या निष्पक्ष मतदान, संदेह की उंगली इसकी भूमिका पर उठनी शुरू हो गई है, जो भारत जैसे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में चिंता का विषय होना चाहिए।

इसमें कोई दो राय नहीं कि चुनाव आयोग भारतीय जनतंत्र को अपने कंधो पर 65 सालों से उठाए हुए है और बिना इसके लोकतंत्र के मंदिरों में कोई दीपक जलाने वाला न होगा। लेकिन ये भी एक कटु सत्य है कि इसे अपने विश्वास को पुनः प्राप्त करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।

पिछले दिनों कुछ राज्यों के मतदान में हुई गड़बाद, मतों को गिनने में गलतियां व गुजरात में चुनावों के लिए केंद्र सरकार के आदेश का इंतज़ार करना आदि को देखते हुए जनता को अपना हृदय कड़ा करके इसकी तरफ संदेह की नज़र डालने पर मजबूर करता है।

जहां चार कदम पर पानी व आठ कदम पर वाणी बदल जाती है, इतनी विविधता वाले राष्ट्र में सबसे मुश्किल काम होता है चुनाव कराना। चुनाव आयोग की प्रवृत्ति एक साधु की भांति होनी चाहिए जो स्वयं को सभी मोह माया, प्रलोभनों से दूर रखे व सिर्फ ईश्वर (लोकतंत्र) की पूजा करे। इस वक्त इसकी भूमिका संदेह से घिरी हुई है लेकिन अन्य कुछ महकमों/आयोगों की तरह चुनाव आयोग पर भी लोगों का गुस्सा फूट पड़े इससे पहले चुनाव आयोग को अपना राजनीतिक मोह त्याग देना चाहिए।

फोटो आभार: getty images

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