हर डॉग लवर को देखनी चाहिए फिल्म “हाची: अ डॉग्स टेल”

Posted by Syedstauheed in Art, Hindi, Media
November 23, 2017

मानव व पशु का रिश्ता एक प्यारा सा रिश्ता होता है, जिसे इंसानी संवेदना आगे भी ज़िंदा रख सकती है। बहुत से लोग पशुओं को लेकर संवेदनशील होते हैं और बहुत से नहीं भी।

पशु-पक्षियों के साथ व्यवहार में अमानवीय स्तर कभी-कभी बहुत परेशान कर जाता है। हुक्मरान व मालिक होने के नाते इन बेज़ुबानों के प्रति हमारी एक ज़िम्मेदारी बनती है। आपको मालूम होगा कि यह हम पर आश्रित हैं। कोई भी यदि हित की दिशा में इन्हें अपना साथी रख ले तो जीवन बदला हुआ दिखता है।

हम जिस पशु-पक्षी को अपना दोस्त या साथी बना लेते हैं, वो भी हमें अपना अभिन्न हिस्सा बना देता है। इन साथी-संगियों द्वारा किए गए कामों की कीमत नहीं लगाई जा सकती। इनकी सेवाएं अक्सर बहुत से मामलों में इंसानी फर्ज़ से महान पाई गयी हैं। इन साथियों का प्यार दुनिया को प्यार करना सिखा सकता है। क्या किसी पशु की वफादारी को बराबरी से लौटाया जा सकता है?

पशुओं की वफादारी की मिसाल का जायज़ा लेना हो तो लास हाल्स्ट्रोम (Lasse Hallström) की हाची: ए डॉग्स टेल (Hachi: a Dog’s Tale) को देखें। वफादारी में कुत्ते की बराबरी नहीं की जा सकती। उसकी वफादारी को एक महान श्रद्धांजली हाल्स्ट्रोम की यह फिल्म थी। पशु साथी-संगियों में कुत्ता इंसान के सबसे पुराने साथियों में एक है और इ्नकी वफादारी की मिसाल उसी समय से कायम है। यह अपने शारीरिक हाव-भाव से आनंद के अनेक स्तर को जीना जानते हैं। क्या उसकी प्यारी वफाभरी नज़रों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?

यदि आपने कभी किसी कुत्ते को अपनाया हो या अपनाने की तमन्ना रखते हों तो लास हालस्ट्रोम की फिल्म में डूबने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। आदर्श नीति-कथाओं की तरह इसे भी एक आध्यात्मिक दस्तावेज के रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है। किसी अपने को पाने की कामना का सुंदर चित्रण।

फिल्म की कहानी आदर्श हीरो की खूबियों पर क्लासरूम विमर्श से निकलती है। प्रोफेसर का पोता वहां अपने हीरो के बारे में बता रहा है और  उसका आदर्श एक वफादार पशु है। स्वर्गीय दादा (प्रोफेसर) का वफादार हाची उसका हीरो था। दोस्ती व वफा की बातें उसने उसी फरिश्ते से सीखी थी। त्याग व समर्पण की यह कथा सिर्फ पार्कर परिवार तक सीमित नहीं रही। एक खूबसूरत बात का दुनिया तक पहुंचना लाज़मी था।

कहानी अकिता प्रजाति के बाल श्वान (कुत्ते) के जापानी मठ में पाए जाने से आगे बढ़ती है। मठ के लोग उसका नामकरण कर अमेरिका के किसी पते पर रवाना कर देते हैं। लेकिन बीच रास्ते में हाची से लगा अड्रेस टेग निकल जाता है। जिस कंटेनर में उसे सुरक्षित कर ले जाया जा रहा था, वह सामान की खेप से जुदा होकर बेड्रिज (Bedridge, America) स्टेशन के प्लैटफॉर्म पर गिर जाता है। इसी क्रम में नन्हा हाची उससे बाहर निकल स्टेशन पर आ जाता है।

आज़ाद होकर नई जगह पर इधर-उधर तफरीह करता हुआ हाची इसी तरह से प्रोफेसर पार्कर विल्सन (रिचर्ड गेर) से जा टकराता है। प्रोफेसर यह सोच कर स्टेशन मास्टर के पास उसे ले जाते हैं कि किसी सज्जन का यह प्यारा गुम गया होगा। लेकिन उनकी सोच में स्टेशन मास्टर ने साथ नहीं दिया। वो उस बिछड़े हुए पशु की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हुआ। नतीजतन प्रोफेसर जिसे कुत्तों से काफी प्यार था उसे अपने साथ ले जाते हैं।

प्रोफेसर पार्कर की पत्नी केट पालतू जानवरों को लेकर उदासीन प्रवृत्ति की है। घर की मालकिन का नज़रिया पार्कर को मालूम था। यह आश्वासन देकर कि वो नन्हे हाची को रखने के लिए नहीं लाए, दोनों को घर मे जगह मिल जाती है। सुबह होते ही पार्कर हाची के मालिक की खोज में फिर से रोड आइलेंड स्टेशन पहुंच जाते हैं। उन्हें यह जानकर थोड़ा अचरज होता है कि अब तक किसी व्यक्ति ने हाची पर अपना हक नहीं दर्ज किया था। शहर के किसी भी बसेरे में पशुओं की बड़ी भीड की खबर से प्रोफेसर की खोज थोड़ा और डूब जाती है।

ऐसे हालात में वो हाची का एक विज्ञापन स्टेशन पर लगा कर उसे फिर से घर ले आते हैं। हालांकि हाची के प्रति पार्कर की बढ़ती ज़िम्मेदारी को देखकर नहीं लगता कि वो उसे लौटाने को मन से तैयार नहीं थे। इस तरह मालिक और जानवर के बीच एक प्यारा सा बंधन सांसे लेने लगता है। इन खुशमिजाज पलों का दृश्यों में भी लुत्फ उठाया जा सकता है।

मालकिन केट भी इन पलों की भावात्मक महानता को कबूल कर हाची को अपनाने के लिए विवश हो जाती है। नया मेहमान वक्त के साथ पुराना हो रहा था, मुहब्बत का तकाज़ा बढ रहा था। प्रोफेसर के लिए वफादार साथी बनने की तमन्ना उसके मन में खूब थी और उसने प्रोफेसर के पीछे स्टेशन जाने की आदत बना ली थी। पार्कर जब भी काम पर जाते हचिको साथ लग जाता। मालिक की वापसी तक वो वहीं पर इंतज़ार करने लगा था।

हाची के इंतज़ार के साक्षी लोगों के सामने महान बंधन का उदाहरण था। वो बंधन जिसे प्यार और वफा के जज़्बों में बयान किया जा सके। एक रोज पार्कर काम पर तो गए, लेकिन वापस नहीं लौटे। म्युज़िक के प्रोफेसर पार्कर की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। हाची का जान से भी प्यारा साथी दुनिया छोड़ चुका था। प्रोफेसर की वापसी अब मुमकिन नहीं थी। क्या मुहब्बत के मारे जानवर को भी यकीन था? वो इंतज़ार करता रहा… बरसों करता रहा। घर वालों को पता था कि मौत ने घर के मुखिया को छीन लिया है। वफा के सिपाही को बहलाने की बहुत कोशिशें भी की जाती हैं…लेकिन वो मासूम भाग-भाग कर इंतजार की जगह (रेलवे स्टेशन) जाता रहा और आखिरी आस तक इंतज़ार करता चला गया।

शिबुया स्टेशन पर लगी हचिको की कांस्य प्रतिमा; फोटो आभार: flickr

परदे की यह पेशकश हकीकत की एक घटना से प्रेरित थी। घटना टोक्यो विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर व उनके अजीज वफादार हचिको (Hachiko) से जुड़ी है। प्रोफेसर उयुनो व हाची के बीच एक अनूठा बंधन था। वफादार जानवर ने मालिक के साथ रेलवे स्टेशन चले जाने की आदत बना ली थी वो हमेशा ही प्रोफेसर के पीछे लग जाता था। वो वहीं देर तक इंतज़ार करता ताकि वापसी में मालिक के दीदार के साथ घर लौट सके। शिबुया (जापान) स्टेशन पर के वेंडर इस प्यारे से रिश्ते के मुरीद थे। दिल का दौरा पड़ने से प्रोफेसर की एक दिन अचानक मौत हो गई।

वो मासूम रोज़ की तरह उस दिन भी इंतज़ार कर रहा था लेकिन उसका प्यारा साथी वापस नहीं आया। वो वहीं इंतज़ार करने लगा जहां अपने मालिक को उसने आखिरी बार देखा था। वो मालिक की सिर्फ एक झलक की खातिर इंतज़ार… बरसों इंतज़ार करता रहा। शिबुया स्टेशन में इंतज़ार की जगह स्थापित हचिको की कांस्य प्रतिमा उस कहानी को बयान करती है।

प्यार, दोस्ती और वफा की यह मिसाल बहुत कम देखने को मिलेगी। फिल्म में कहानी को भी उसी मार्मिक अंदाज़ में पेश किया गया। फिल्म की कहानी भी विकास क्रम में पशु के गुणों से एक हो जाती है। फिल्म के आखिरी हिस्सों में उसका दु:ख हमारा दु:ख बन जाता है। उसकी विरह की पीड़ा का अनुभव काफी मार्मिक है।

इंसान के लिए पशु का प्रेम देख रूमी यही कह गए कि जानवर प्यार के फरिश्ते हैं। लास हालस्ट्रोम की यह पेशकश पारिवारिक फिल्मों की जीत में विश्वास रखती है। प्रेम, समर्पण, वफादारी और नि:स्वार्थ सेवा के अजय भावों का संदेश देती है।

 

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