महत्वाकांक्षी और दृढ़ निश्चित व्यक्ति की कहानी है “An Insignificant Man”

Posted by Shreyas Kumar Rai in Art, Culture-Vulture, Hindi
November 19, 2017

सृजन संघर्षों से भरा होता है! ये फिल्म इन्हीं संघर्षों की कहानी है, एक ऐसी कहानी जो उसके किरदार खुद ही बताते जाते हैं और आप उनके साथ फ्रेम दर फ्रेम आगे बढ़ते जाते हैं। फिल्म देखने से पहले कई समीक्षाएं पढ़ीं थी। अधिकांश में अरविन्द(अरविन्द केजरीवाल) को हीरो और योगेंद्र(योगेंद्र यादव) को विलन तो कहीं योगेंद्र को दूसरे हीरो के रूप में प्रस्तुत किया गया, पर मैं इन सब से इस बात पर अलग रहना चाहूंगा!

पूरे फिल्म के दौरान अरविन्द और योगेंद्र के बीच एक भी वार्तालाप का दृश्य नहीं है!( मैं 20 मिनट लेट पहुंचा था, अगर पहले 20 मिनट में कहीं है तो comment में आप बता सकते हैं) अरविन्द को शुरू से ही नेता की भूमिका में दिखाती है ये फिल्म।

आप योगेंद्र में एक अलग किरदार की झलक पाते हैं, अरविन्द जहां शांत हैं, अपने भावों को हर वक्त प्रकट नहीं कर रहे, वहीं योगेंद्र अपने भावों को जाने-अनजाने में प्रकट करते जाते हैं और कैमरा उन्हें कैद करते जाता है।

हो सकता है एडिटर ने ये जानबूझ कर किया हो पर इससे आप पूरी फिल्म के दौरान अरविन्द को ही हीरो की भूमिका में पाते हैं और उन्हीं के भाव के हिसाब से हर्ष और शोक का अनुभव करते जाते हैं। अरविन्द के अलावा किसी को यदि सबसे अधिक जगह मिली है तो निःसंदेह योगेंद्र यादव हैं पर योगेंद्र ना तो विलन लगते हैं और ना ही हीरो!

यदि आप फिल्म देखने जाएंगे तो संतोष कोली की मौत होने के बाद उनकी अंतिम क्रिया के दौरान अरविन्द, योगेंद्र, मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास सभी को एक फ्रेम में दिखाया जाता है, उस वक्त अरविन्द के चेहरे पर शोक देखने लायक है! उनका चेहरा लाल है, उसी चेहरे पर आंसू है और वो बेबस से प्रतीत होते हैं! बाकी तीनों पर आप वो शोक नहीं देख पाते हैं, ऐसा नहीं है की उन्हें दुःख नहीं है पर जिस तरह से अरविन्द के भाव उस फ्रेम में दिखते हैं वैसा उन तीनों में से किसी पर भी नहीं आ पाता|

एक और दिलचस्प किस्सा है, ये दिखाता है कि जब आप पहली बार अपने मंज़िल के आखिरी पड़ाव से एक पड़ाव पहले हों और आपको आखिरी पड़ाव पर जाना है तो आप कितना संभल कर कदम रखने लगते हैं। फिल्म में जब अरविंद और शीला दीक्षित अपना पर्चा भरने जाते हैं तो अरविन्द घबराए हुए प्रतीत होते हैं और अफसर से बार-बार अपने पर्चे को देखने को बोलते हैं कि कहीं चूक ना हो जाए! वहीं शीला को दिखाया जाता है कि पर्चा भरते ही वो किसी अखबार में निकले किसी कार्टून का ज़िक्र करती हैं और हंस पड़ती हैं। शीला के लिए पर्चा दाखिल करना नयी बात नहीं थी तो उन्हें वो घबराहट नहीं रही होगी जो केजरीवाल महसूस कर रहे थे, 15 साल से मुख्यमंत्री जो रहेगा वो क्यों ही घबराएगा भला?

योगेंद्र यादव एक रणनीतिकार के तौर पर हर फ्रेम में नज़र आते हैं! एक इंसान जिसे आप हर समस्या को सुलझाते हुए पाते हैं, जो आपको राजनीति अपने संवाद से समझाते हैं। जब टिकट वितरण के वक्त पार्टी कार्यकर्ता अरविन्द से बहस करते हैं तो फिल्म ये दिखाती है कि योगेंद्र कार्यकर्ताओं को शांत रहने और बैठने को कहते हैं और माफी मांगते हुए ये कह जाते हैं,

“अपनी टीम में कई बार इंटरनल डेमोक्रेसी नहीं चल पाती है!” जितने भी लोग किसी संस्था या टीम के मुखिया हैं या रहे होंगे, आप इस वाक्य से कहीं न कहीं एक सम्बन्ध स्थापित कर पाएंगे।

योगेंद्र यादव एक पढ़े लिखे राजनीतिक शास्त्री की भूमिका में उत्तम कार्य करते हुए नज़र आते हैं। हर दर्शक को उनके वाक्य और उनके संवाद को ध्यान से सुनना चाहिए, असलियत का ज्ञात होगा! चुनाव आयोग से जब योगेंद्र अनुरंजन झा द्वारा किए गए स्ट्रिंग का सच पता लगवाते हैं वो दृश्य भी षड्यंत्रों की पोल खोलते हुए परदे के पीछे हो रहे खेल को उजागर करता है! इसमें अरविन्द नहीं दिखाई पड़ते पर योगेंद्र की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।

TV पर हर चीज़ भव्य लगती है, इस फिल्म में मुझे BJP और Congress के प्रचार का तरीका अजीब लगा, मोदी स्टेज पर तो आते हुए दिखते हैं पर उनमें वो अपनापन नज़र नहीं आता, शैली में घमंड और एलिटिज़्म नज़र आया, हो सकता है ये भी एडिटिंग की वजह से हो, पर जो दिखा वो ऐसा ही था।

ये फिल्म एक अलग ही रोमांच भर जाती है, इतने सारे संवाद हैं और हर एक संवाद महत्वपूर्ण है जिसे मैं लिख नहीं सकता। बेहतर होगा आप भी जाइये और देख कर आइये कि आम आदमी पार्टी बनाने की जो शुरुआत हुई थी उसमें कितने संघर्षों का सामना करना पड़ा! कितनी सफल रही पार्टी अपने सिद्धांतों को साथ लेकर चलने में ये तो कोई ऐसी ही अन्य फिल्म आए तो बेहतर पता चल पाएगा क्यूंकि आप योगेंद्र को कई अवसर पर निराश होता पाएंगे जहां अरविन्द अपने सिद्धांतों पर अडिग नहीं रहते और राजनीति के प्रचलित तरीकों को अपनाने लगते हैं!

EPW (Economic and Political Weekly) के पूर्व एडिटर परंजॉय गुहा योगेंद्र से ये सवाल करते हैं कि अरविन्द बाकी पार्टियों की तरह वो वायदे करते जा रहे हैं जो पूर्ण करना मुमकिन नहीं होगा तो इस पर योगेंद्र की निराशा और हल्का सा क्रोध भी आप फिल्म में देखते हैं।

अरविन्द को दिखाते दो दृश्य मैं भूल नहीं पा रहा हूं, एक इंटरमिशन के पहले का है जब अरविन्द अपना एक सन्देश रिकॉर्ड करने जाते हैं, वो इस बात पर संतुष्ट हैं कि हमारी जनता “जनतंत्र” को अभी तक नहीं समझ पाई है और इसी के कारण वे इससे अपने आप को जोड़ नहीं पा रहे हैं, हमें शुरुआत में जनतंत्र को सरल रूप में उनके सामने रखना होगा जिससे कि वे जनतंत्र को पूर्ण रूप से समझने लगें! और इंटरमिशन के बाद एक सन्देश है जो ट्रेलर में दिखाया गया है।

अरविन्द सीधे तौर पर जनतंत्र को परिभाषित कर डालते हैं, शब्दों में बयान करते जाते हैं! शायद अरविन्द तब तक आश्वस्त हो जाते हैं कि उनके प्रयास से अब लोग जनतंत्र की समझने लगे हैं!

ये दस्तावेज है जिसे हर उस इंसान को पढ़ना चाहिए जो बिन पैसों और बिना बाहुबल के बदलाव लाना चाहता है। आप समझ पाएंगे कि आपको कहां-कहां, कौन-कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए! अच्छा होता अगर खुशबू और विनय कुछ और दृश्यों को फिल्म में दिखा पाते, बहुत से सवाल रह गए पर उनके जवाब देना अब कठिन न होगा। इस फिल्म को देखने के बाद आप हर उस जटिल सवाल का जवाब खुद देने में सक्षम हो जाएंगे। बस ध्यान से हर संवाद सुनिएगा।

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