डियर जल्लिकट्टू बैल, तुम इंसानों के खेल को समझो और मौका मिलते ही भाग जाओ

Posted by Prakriti in Culture-Vulture, Hindi, Staff Picks
November 10, 2017

डियर जल्लिकट्टू बैल,

तुमसे पूछना है कि तुम कैसे हो ? थोड़ा अटपटा लगेगा क्योंकि जब मैं यह लिख रही होंगी तो तुम उस तमिल उत्सव के लिए आदर के साथ तैयार किए जा रहे होगे। खैर, गुड लक। कई और बैलों को भागते हुए देखा है इस खेल में, तुम अपनी मर्दानगी बढ़ाने का प्रयास करना और थोड़ा आगे जाकर एक गेट होगा, उसको तोड़कर फुल विजय माल्या स्टाइल में पलायन करना।

अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है, मैं कक्षा में बैठी थी, और राजनीति विज्ञान का पीरियड था। हम ‘फेडरलिज़म’ यानी संघवाद के बारे में पढ़ रहे थे। इतनी ठंड थी कि दो जोड़ी मोज़े पहनकर भी पैर जमे हुए थे। टीचर के पढ़ाते समय सोचने में मज़ा तो आता है, मगर खिड़की से थोड़ी सी धूप आने पर इतनी राहत मिली कि मेरी आंखें बंद होने लगी। आमतौर पर हमलोग पढ़ने के बाद कक्षा में किसी न किसी विषय पर चर्चा करते हैं, जिसमें सबकी खूब दिलचस्पी है।

उस दिन जल्लिकट्टू की बात छेड़ी गई। सच बताऊं तो उससे पहले मैंने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था, क्योंकि मैंने इसको गौर से नहीं देखा, सोचा कि ऐसी ही कोई खबर होगी, गिने-चुने लोग ही चाहते होंगे कि जल्लिकट्टू की प्रथा चलती रहे। लेकिन, जैसे ही टीचर ने बताया कि हज़ारों की भीड़ कई दिनों से मरीना बीच पर शांति से विरोध कर रही है, मेरी आंखें खुल गई। टीचर ने कहा, “आई एम अपोज़्ड टू एनीथिंग इन्वॉल्विंग अनिमल क्रूयेल्टी, आई वंडर वाइ सो मेनी पीपल आर इन सपोर्टऑफ दिस..” ( मैं हर उस चीज़ के खिलाफ हूं जिसमें पशु क्रूरता शामिल है। मैं सोच रही हूं कि क्यों इतने सारे लोग इसका समर्थन कर रहे हैं। तभी से जिज्ञासा थी कि उन लोगों की राय जानूं जो जल्लिकट्टू का समर्थन करते हैं और उसके बैन के खिलाफ हैं।)

घर पहुंचते ही लैपटॉप खोला और इस बारे में विस्तार से चीज़ें ढूंढ़ने लगी। यहां मैं जल्लिकटटू के समर्थन में लोगों के तर्क लिख रही हूं जो एक अंग्रेज़ी वेबसाइट में छपी थी।

1) एम. मुनीरज, पच्चीस साल के युवक जो कपड़े की दुकान में काम करते हैं-

“डू दे थिंक वी आर मीक?” ही आस्क्ड. “दे थिंक दैट वी शुड लिसन टू वॉटेवर दे से। वी वोंट लेट दैट हैपन ऐंड अलाओ द नेक्स्ट जेनरेशन टू सफर टू। फॉर एग्ज़ाम्पल, OPS ओपंड द डोर फॉर मोदी।  इज़ दैट द चीफ मिनिस्टर्स वर्क? वाइ आर यू बेंडिंग डाउन? स्टैंडअप!”;

“जस्ट फॉर ए फ्यू पीपल वाइ शुड वी गिव अवे आवर ट्रेडीशन? वी डोंट वॉंट टू गिव इट अप ऐंड विल फाइट अंटिल वी विन दिस बैटल!”

(“क्या वे हमें दब्बु समझते हैं?” उन्होनें पूछा, “वे सोचते हैं कि हमें उनकी हर बात सुननी चाहिए। हम यह नहीं होने देंगे और ना ही अगली पीढ़ी को भुगतने देंगे। उदाहरण के लिए, OPS ने मोदी के लिए रास्ता बनाया। क्या यह मुख्यमंत्री का काम है? तुम क्यों झुक रहे हो? खड़े हो!”)

2) आर. शांति, पचास वर्ष की वकील-

“इट इज़ अ पार्ट ऑफ द लाइव्लिहुड ऑफ फार्मर्स, विच हैज़ बिन कमिंग डाउन द जेनरेशन्स,”

(“यह किसानों की आजीविका का हिस्सा है, जो सदियों से चला आ रहा है।”)

3) जी. एज़हाइलेयरासी, छात्रा, थर्ड-यीअर (चेट्टीनाद मेडिकल कॉलेज)-

“दिस वे द काफ विल बी स्ट्रॉंग ऐंड द नेटिव ब्रीड्स विल बी स्ट्रेंतएंड”, “दिस इज़ मोर देन जस्टअ स्पोर्ट, और ईवन प्रेज़र्विंग आवर कल्चर। दिस इज़ ईवन अबाऊट प्रोटेक्टिंग आवर हेल्थ ऐंड एकॉनमी।”

(“इससे बछड़ा तन्दरुस्त होगा और देसी नस्लों को बढ़ावा मिलेगा।”; “यह बस खेल या संस्कृति के संरक्षण की बात नहीं है। यह हमारे स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था की भी बात है।”)

4) समीर भोवमिक, कॉर्पोरेट वकील-

“इफ़ इट इज़ अ कस्टम दैट हैज़ बिन प्रैक्टिस्ड फॉर 2,000 इयर्स , इट मस्ट हैव सम बेसिस और लॉजिक बिहाइंड इट। फॉर फ्यू एक्सेप्शन्स, वी कैननॉट बैन द एंटाइयर प्रॅक्टीस।”

(अगर ये दो हज़ार साल पुरानी रिवाज़ है तो इसके पीछे कोई आधार या तर्क ज़रूर होगा। कुछ अपवादों की वजह से हम पूरी प्रथा पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते।)

इनके अलावा और कई लोग जैसे कि विश्वनाथन आनंद, ए.आर.रहमान, धनुष, रजनीकांत आदि ने भी जल्लिकट्टू के समर्थन में बोला है, ट्वीट किया है। मैं तो कहती हूं कि तुम, मेरे प्यारे जल्लिकट्टू के बैल, तुम भी आ जाओ ट्विटर पर, बोल नहीं सकते, कम से कम ट्वीट तो कर लो।

कई लेख और बयान पढ़ते हुए यही लग रहा था कि दक्षिण भारत के लोगों का उत्तर भारत के लोगों और सरकार के प्रति गुस्सा है, जो जायज़ भी है। उनका मानना है कि हर चीज़ बैन करने का चलन अब जल्लिकट्टू को भी अपनी चपेट में ले बैठा है। गरीबों और नीचली जातियों को दबाया जा रहा है, उनकी परंपरा पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। जल्लिकट्टू मर्दों के लिए अपनी मर्दानगी साबित करने का एक ज़रिया है, जो युवकों को शराब के शिकंजे से छुड़ाता है। यह उन कई तर्कों में से कुछ हैं जो जल्लिकट्टू के समर्थन में रखे गए हैं।

यह सब पढ़ते हुए मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। दिमाग के किसी कोने में एक बात खटक रही थी। लग रहा था कि ज़ाहिर है कोई न कोई तो यह मुद्दा ज़रूर उठाएगा, यह बात तो ज़रूर कहेगा। निराश कर दिया सबने।

किसी ने यह नहीं सोचा कि तुम्हारा क्या। सब लोग अमीर-गरीब, जाति और धर्म के झमेलों में पड़ गए, एक दूसरे से भिड़ने लगे। शायद यह देखना भूल गए कि इसमें इंसानों की बात ही नहीं है, तुम्हारी बात है जो ना तो उच्चतम न्यायालय के बारे में जानता है ना तो परंपरा के बारे में। तुम्हारे लिए तो सब सिंपल है- या तो कुछ आदमी तुम्हें घेरकर तुम पर कूदने और तुम्हें पकड़ने की कोशिश करेंगे, या नहीं।

इतना सिंपल होना नहीं चलेगा। बी प्रैक्टिकल। इस बात की बारीकियों को समझो दोस्त। इस खेल को समझो और भीड़ जब तक एक दूसरे से भिड़ रही है, मौका मिलते ही भाग जाओ, बात मानो मेरी, सुखी रहोगे।

माफी चाहती हूं तुमसे, जहां तुम्हारा हित अहम मसला था, वहां पर भी हमलोग “हम इंसान, हमारी तकलीफें, हमारी परंपरा” ले ही आए। हो सके तो माफ कर देना।

तुम्हारी अच्छी सेहत और अच्छे जीवन की कामना करूंगी। अगर तुम यह पत्र पढ़ने से पहले स्वर्ग ना सिधार गए हो वरना फिर फायदा क्या।

हैप्पी जल्लिकटटू!

प्रकृति

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