मौलाना आज़ाद ने खुद ‘आज़ाद’ नाम रखकर ज़ाहिर किया वो रूढ़िवादी परंपरा के गुलाम नहीं

Posted by Prashant Pratyush in Hindi
November 11, 2017

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आज ही के दिन मक्का शहर में पैदा हुए थे। वो अपने आज़ाद और अलहदा ख्याल पसंद के कारण पिता मौलाना सैयद मुहम्मद ख़ैरुद्दीन बिन अहमद के पुकारू नाम फ़िरोज़ बख़्त के नाम के साये में कैद होकर नहीं रहें। अपने पिता से शुरुआती धार्मिक तालीम लेने के बाद आज़ाद मिश्र की शिक्षा संस्थान जामिया अज़हर से प्राच्य शिक्षा की तालीम हासिल की। 15 साल की उम्र में अपने अाज़ाद ख्याली पसंद के कारण मौलाना ने ‘आज़ाद’ नाम रखकर यह ज़ाहिर कर दिया कि उनको परंपरा में जो विश्वास, मान्यताएं तथा मूल्य मिले थे, वे अब उनसे बंधे हुए नहीं रहे हैं। यहीं कारण था कि उन्होंने अपने पिता की तरह पीरी-मुरीदी का सिलसिला जारी रखने से परहेज़ किया। पिता की तमाम बंदिशों के बाद भी उन्होंने अंग्रेज़ी तालीम भी हासिल की।

मौलाना आधुनिक शिक्षा के सर सैयद के विचारों से सहमत थे, परंतु सियासत के उनके विचारों से अलहदा रहें। उनका मानना था कि हिंदू-मुस्लिम को साथ मिलकर आज़ादी के लिए संघर्ष करना चाहिए। इसी तरह मौलाना आधुनिक शिक्षा को सभी के लिए ज़रूरी मानते थे। मौलाना आज़ाद लिखते हैं- ‘मजहब इंसान को उसकी खानदानी विरासत के साथ मिलता है। मुझे भी मिला परंतु मैं परंपरागत विश्वास की विरासत पर कायम ना रह सका। मेरी प्यास उससे कहीं ज़्यादा निकली जितनी वह प्यास बुझा सकते थे। लिहाज़ा मुझे पुरानी राहों से निकलकर नई राहें ढूंढनी पड़ीं। मज़हब की सार्वभौमिकता ने मुझे हैरानी, हैरानगी से शक तक तथा शक से इंकार तक पहुंचा दिया। फिर इसके बाद मज़हब और इल्म के बाहरी आडंबर प्रकट हुए तो उनसे मैंने रहा-सहा विश्वास ही खो दिया।’ उनके आज़ाद ख़्याल उनके अख़बार “अल-हिलाल” और “अल- बलाग़” में दिखते हैं, जो अपने समय का पहला सचित्र राजनीतिक साप्ताहिक था। ज़ाहिर है कि मौलाना एक उम्दा पत्रकार भी थे।

निजी तौर पर मौलाना आज़ाद को जानते-समझते समय उनकी दो-तीन बातें मुझे उनके काफी करीब ले जाती है और उनका मुरीद हुए बिना नहीं रहने देती हैं।

पहला, वो ऐतिहासिक भाषण जो उन्होंने जामा मस्जिद के चबूतरे से भारत-पाकिस्तान के बंटवारे पर दी थी, जो बंटवारे के खिलाफ थे। उनका भाषण सुनकर लाखों लोग जो पाकिस्तान कूच कर रहे थे वह रुक गए और यही पर सुकून से रहना पसंद किया।

ज़ाहिर है कि मौलाना आज़ाद बंटवारे के नाज़ुक दौर में भी हिंदू-मुस्लिम कौमी एकता के पैरोकार बनकर सामने आते हैं और उसकी खुदमुख्तारी भी करते हैं। जिस दौर में राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक पहचान को धर्म के साथ जोड़कर देखा जा रहा था, उस समय मौलाना आज़ाद उस राष्ट्र की परिकल्पना कर रहे थे जहां धर्म, जाति, सम्प्रदाय और लिंग किसी के अधिकारों के आड़े ना आने पाए।

दूसरा, उनकी चाय-नौशी का शौक, जो बेहद निराला था। चाय हमलोग रोज़ ही पीते हैं, दोस्तों की महफिलों और घर-परिवार के लोगों के साथ पीते हैं। मौलाना साहब को चाय से इश्क सा था, उन्होंने अपनी चाय-नोशी के बारे में लिखा है, “आपको मालूम है कि मैं चाय के लिए रूसी फिंजान को काम में लाता हूं। ये चाय की मामूली प्यालियों से बहुत छोटे होते हैं। अगर बे-जौंक के साथ पी जाए तो दो घूंट में ख़त्म हो जाए। मैं ठहर-ठहर कर पियूंगा और छोटे-छोटे घूंट लूंगा। फिर जब पहला फिंजान ख़त्म हो जाएगा तो कुछ देर के लिए रुक जाऊंगा। इस दरमयानी मुद्दत को इम्तादाद-ए-कैफ़ (आनंद) के लिए जितना तूल दे सकता हूं, तूल दूंगा। फिर दूसरे और तीसरे के लिए हाथ बढ़ाऊंगा। दुनिया को और इसके सारे सूद ज़ियां (नफा-नुक़सान) को यकक़लम (बिल्कुल) फ़रामोश कर दूंगा।” उनकी चाय-नौशी का शौंक आम चाय खौरों से अलग किस्म की थी, जो चाय हम लोग रोज़ पीते और पिलाते हैं इसको मौलाना आज़ाद चाय नहीं मानते थे।

वो बताते है, “मैं चाय को चाय के लिए पीता हूं, लोग शक्कर और दूध के लिए पीते हैं। लोग चाय की जगह एक स्याल (द्र्व) हलवा बनाते हैं और खाने की जगह पीते हैं, और खुश होते हैं कि हमने चाय पी ली। इन नादानों को कौन कहें हाय कम्बख़्त तू ने पी ही नहीं।”

तीसरा, उन्होंने आजादी के बाद किसी ओहदे को लेने से इंकार कर दिया। परंतु, गांधीजी के कहने पर देश के पहले शिक्षा मंत्री का पद स्वीकार किया, इसलिए उनके जन्मदिन के दिन शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है। शिक्षा मंत्री के रूप में एक दशक तक उनकी भूमिका अलग तरह की दिखती है।

आज विश्विद्यालय अनुदान आयोग और दूसरे तकनीकी, अनुसंधात्मक और सांस्कृतिक संस्थाएं उन्हीं की देन हैं। मौलाना आज़ाद अपनी शिक्षा नीति के ज़रिए ऐसे आर्दश की संरचना करना चाह रहे थे, जो कि नागरिकता से थोड़ा ऊपर हो, जो मनुष्यता के नाते सोचना सिखाये और जो नागरिकता के ज़रिए बनने वाले राष्ट्र-राज्यों के बंधनों में भी हमारे संवेदना को जीवित रखे। उन्होंने इंसान में तमाम खूबियों से तालीम को जोड़ने की कोशिश की। उनकी शिक्षा नीति में बुनियादी शिक्षा का अभाव उनकी आलोचना की ज़मीन तैयार करती है।

आज की स्थिति में हम मौलान अबुल कलाम आज़ाद के विचार और शिक्षा नीति को नाकाफी इंतज़ाम मान सकते हैं। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज़ाद भारत में वो मौलान अबुल कलाम आज़ाद ही थे जिन्होंने एक खुदमुख्तार मुल्क के नौजवानों को देश का नया इतिहास बनाने का जोश भरा, जिसके रास्ते पर चलकर हम आज यहां तक का सफर तय कर सके हैं।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।