पंजाब के आतंकवाद को सिख आतंकवाद कहने वाले मीडिया तुम सही नहीं हो

इतिहास में हुई हिंसा का अगर अध्ययन किया जाए तो शायद राख के सिवा कुछ भी नहीं दिखता। व्यक्तिगत रूप से मैं हर तरह की सरकारी, गैर सरकारी, राजनीति से प्रेरित या धर्म और मज़हब की आड़ में की जा रही हिंसा का कड़ा विरोध करता हूं, जितनी हो सके इसकी निंदा करनी ज़रूरी है।

अक्सर कहा ये जाता है कि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़की हिंसा में सिख समुदाय को आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक और शैक्षणिक रूप से कत्ल कर दिया गया। हिंसा हर रूप में निंदनीय है लेकिन मैं मीडिया के उस तर्क से सहमत नही हूं कि श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद ही सिख नरसंहार हुआ था। दरअसल, राजनीति की इस लड़ाई को कब धर्म का चोला पहना दिया गया, ये शायद ही कोई जानता हो। इसी कारण जब पंजाब में दहशतगर्दों द्वारा बस यात्रियों की निर्मम हत्या कर दी गई थी तब मीडिया बस में मारे गये यात्रियों को हिंदू यात्री कहकर नफरत की आग भड़का रहा था, लेकिन वास्तव में इस आंतक के नाम पर कौन मारा गया यह हमें व्यक्तिगत रूप से जानने की ज़रूरत है।

आज मेरा यहां लिखने का तात्पर्य 1984 के सिख दंगों पर मीडिया की भूमिका को दिखाना है, वह भी एक ऐसी दुखद घटना से जो अभी पंजाब में हुई है। हाल ही में पंजाब अमृतसर में किसी हिंदू सगंठन से जुड़े एक नेता को दिन दहाड़े मार दिया गया, CCTV फुटेज से कातिलों के लिबास के आधार पर हमारा मीडिया सिख कातिल के नाम से ये खबर उजागर कर रहा है। इससे पहले मैं इस मीडिया कवरेज पर अपनी राय रखूं, मैं कत्ल किये गये व्यक्ति और इनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना रखता हूं और इस हमले की कड़े शब्दों में आलोचना करता हूं। आज मीडिया इस घटना को हिन्दू सिख समाज में बढ़ती दूरियों की तरह दिखा रहा है ओर यही वजह है कि इस घटना से पंजाब में हिंदू समाज और पंजाब के बाहर सिख समाज भयभीत है।

लेकिन 2016 में हुए जाट आंदोलन की आग में, विभिन्न अखबारों ने मुख्य रूप से खबर चलाई थी कि मरुथल के पास आंदोलनकारियों ने बलात्कार जैसी ना माफ करने वाली घटना को अंजाम दिया था, जिसका बाद में हाइकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है। लेकिन क्या इस खबर को हिंदू बालात्कारी कहकर दिखाया गया था नहीं, यहां इस घिनौने अपराध को अपराधी, आरोपी तक सीमित रखा गया। यही सही भी है, हर समाज में अपराधी होते हैं जिन्हें अपराधी, आरोपी तक ही सीमित रखना चाहिये ना की इस आड़ में पूरे के पूरे समाज को कटघरे में खड़ा कर देना चाहिए। जैसे कि अक्सर मीडिया में पंजाब के आंतकवाद को सिख आंतकवाद के नाम से प्रचारित किया जाता है।

लेकिन,अमृतसर की आपराधिक घटना का अगर अध्य्यन करें तो नज़दीक के समय में ऐसी कई घटनाए हुई हैं, जो अपरोक्ष रूप से इस घटना पर अपना असर बयान करती है, मसलन:

1. अक्सर राष्ट्रीय सेवक संघ इस बात की दुहाई देता है की हिंदुस्तान का हर नागरिक हिंदू है, खासकर मोहन भागवत अक्सर इस बात की दलील दे चुके हैं कि हिंदू धर्म इतना विशाल है कि इसमें भारत की हर संस्कृत को समाने की क्षमता है। यही वजह रही कि हाल ही में राष्ट्रीय सिख संगत (जो कि आरएसएस की एक शाखा है) के द्वारा दिल्ली में गुरु गोबिंद सिंह का 350वां जन्मदिन मनाया गया जिसका कड़ा विरोध सिख समाज में देखने को मिला, यहां तक कि सिख धार्मिक संस्थाओं ने इस आयोजन का पूरा विरोध किया। ऐसे हालात में पंजाब के समाज में हिंदू और सिख समाज की आपस की दूरियां और बढ़ जाती हैं, जैसे कुछ समय तक आरएसएस सिख को केश धारी हिंदू कहने की जिद्द पर अड़ा हुआ था, हां अब ये सिख को हिंदू धर्म से अलग ज़रूर मानता है। लेकिन राष्ट्रीय सिख संगत के रूप में सिख धर्म में दखल अंदाज़ी करने की कोशिश हर वक्त चलती रहती है।

2. हाल ही में एक और आरएसएस कार्यकर्ता की लुधियाना में गोली मारकर हत्या कर दी गई इसका संबध भी सिख आतंकवाद से जोड़ा गया, लेकिन साल 2015 में जलंधर के अंदर पंजाब आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। हत्यारे अभी तक पुलिस की कैद से बाहर हैं, लेकिन उस समय सिख आंतकवाद का मीडिया में कही भी कोई शोर नहीं था। वास्तव में उस समय शिरोमणि अकाली बादल और भाजपा की सरकार थी और अब प्रदेश में काँग्रेस की सरकार है, हर वक्त जब काँग्रेस की सरकार सत्ता में होती है तब तब अक्सर आतंकवाद का भय फैलाया जाता है लेकिन एक आम नागरिक ये क्यों नहीं सोचता कि इस समय बादल दल विपक्ष में होता है और बिगड़ रही कानून व्यवस्था का फायदा इसे ही होगा। लेकिन सबसे अहम, बादल परिवार के साथ 1984 से पहले जनता दल के रूप में जन संघ और 1996 के बाद भाजपा, जो की खुद विपक्ष में होती है वह हमें कहीं नहीं दिखाई देती।

3. पिछले कुछ दिनों सिख नागरिकों पर कई हमले भीड़ द्वारा किये गये इनमें जयपुर और अंबाला की घटना अहम है जिसके वीडियो भी वायरल हुये थे।

4. सोशल मीडिया पर आए दिन, सिख समाज के लिये गैर ज़िम्मेदाराना शब्दावली का उपयोग किया जाता है जो कि धार्मिक भावनाओं को भड़काने में अहम रोल तय करता है।

5. सबसे ज़रूरी, आज उत्तर और मध्य भारत के ज़्यादातर राज्य में भाजपा सरकार है, बस एक पंजाब ही है जंहा गैर भाजपा सरकार है, अगर यहां सरकार की छवि खराब होती है, खासकर मीडिया द्वारा हो हल्ला मचा कर, हिंदू जज़्बात को अगर उभार लिया जाता है तो इसका सीधा फायदा आने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश के राज्य चुनाव में भाजपा को हो सकता है।

1984 से 90 के दौरान जब पंजाब अपने काले दौर से गुज़र रहा था और आये दिन आतंक की घटनाएं अखबारों की सुर्खिया बनती थी, तब ताया जी ज़रूर कहा करते थे कि अगर कोई गैर सिख सर पर पगड़ी बांध कर हत्या कर देता है तो इसका सीधा इल्ज़ाम, सिख समुदाय पर ही आएगा लेकिन कोई ये जांच नही करेगा कि वास्तव में हकीकत क्या थी ?

आज जब हम 21वीं सदी में बढ़ रहे हैं, आने वाले समय में एक विश्व शक्ति के रूप में उभर सकते हैं, ऐसे में हमारी मीडिया को और जवाबदेही से रिपोर्टिंग करने की ज़रूरत है। ज़रूरी नहीं कि लुधियाना और अमृतसर की घटनाओं को धार्मिक रंग दिया जाए, हो सकता है इसके और भी पहलू हों जो की जांच का विषय हैं। समाज में शांति का माहौल बनाने के लिये ज़रूरी है कि आज भारतीय मीडिया एक खबर को खबर तक ही सीमित रहने दे उसे धर्मों में दूरी लाने के हथियार के तौर पर उसका इस्तेमाल ना करे। क्योंकि खबर में शब्दों का तड़का, कई बार विस्फोटक रुख ले लेता है। जिस तरह 1984 में दूरदर्शन पर, नारों के रूप में दिखाया जाता था खून का बदला खून, ये भी एक वजह थी 84 में हुए सिख नरसंहार की।

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