मैं आईआईटी (बीएचयू) का छात्र हूं और हर रोज़ खौफ में जीता हूं, मुझे सिक्योरिटी चाहिये

मैं आईआईटी (बीएचयू) का एक छात्र हूं। हम जब आईआईटी प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे होते हैं तो हमें बेहद ऊंचे ख्वाब दिखाये जाते हैं। ऐसा माना लिया जाता है कि आईआईटी का मतलब सुरक्षित भविष्य। परन्तु भविष्य तब सुरक्षित होगा जब वर्तमान सुरक्षित हो। यहां आईआईटी (बीएचयू) में वर्तमान में यह माहौल है कि हम वो टी-शर्ट नहीं पहनते जिसके पीछे आईआईटी लिखा हो, क्योंकि डर लगा रहता है कि कहीं कोई गुंडा प्रवृत्ति का व्यक्ति आकर हमें मार न दें।

हॉस्टल ‘सेकंड होम’ कहा जाता है। सामान्यतः एक बच्चा अपने घर में सुरक्षित महसूस करता है। मगर इस ‘सेकंड होम’ में मैं एकदम असुरक्षित महसूस करता हूं।

डरता हूं कि कहीं ऐसा ना हो कि ये आर्टिकल पढ़ने के बाद कोई मेरी डिटेल निकालकर मेरे हॉस्टल के कमरे में मुझे मारने आ जाये। ऐसा कुछ दोस्तों के साथ हुआ है, उन्हें उनके कमरे में घुसकर मारा गया।

ऐसा नहीं है कि हम किसी से लड़ नहीं सकते। पर बात ये है कि मैं अपने घर से 1000 किमी दूर यहां पढ़ने आया हूं। हम कोचिंग में सालों मेहनत करके, लाखों की फीस भरकर यहां आये हैं और फिर अब आईआईटी में भी 3 लाख रूपये सालाना की फीस भरते हैं। हम स्थानीय गुंडों को मारपीट का जवाब मारपीट से नहीं दे सकते हैं।

नहीं, ये कोई नई बात नहीं है जब से आईटी (बीएचयू), आईआईटी (बीएचयू) हुआ है तब से हालात ऐसे ही हैं। सबसे निराशाजनक बात ये है कि ये ‘गुंडा-प्रवृत्ति’ के लोग जिन वजहों से आईआईटी के छात्रों से हिंसात्मक व्यवहार करते हैं, उनमें एक प्रमुख कारण है आईआईटी में होने वाली छात्रों की विभिन्न ‘को-करिकुलर एक्टिविटीज़’, जो इन्हें असांस्कृतिक लगती हैं। अतः वे हिंसात्मक कार्यवाही करके इन्हें रोकने का प्रयास करते हैं। एक भारत के नागरिक को अपनी संस्कृति और धर्म चुनने का अधिकार है, यह कोई थोपने की चीज़ नहीं है। ऐसे में संस्कृति के ठेकेदारों का ऐसी कार्यवाही करना शर्मनाक है और छात्रों के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

आईआईटी, प्रशासन कहता है कि सुरक्षा बीएचयू विश्वविद्यालय का विषय है ना कि संस्थान का और विश्वविद्यालय की माननीय चीफ प्रॉक्टर कहतीं हैं, “जब मैं ही नहीं सुरक्षित, जब मेरी कार पर पत्थर फेंके गये, तो मैं आपको कैसे सुरक्षित रख सकती हूं?”

आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक महोदय का कहना है, “सुरक्षा की गारंटी तो नरेंद्र मोदी जी की भी नहीं है, तुम लोगों की क्या होगी?”  दूसरे, ये मारपीट करने वाले लोग राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं, अतः कोई कानूनी कार्यवाही करना बच्चों सी बात लगती है। ये गुंडागर्दी की परिस्थितियां एकदम फिल्मी सी लगती हैं।

एक ऐसा विश्विविद्यालय जहां छात्रों को कुछ गुंडे सरेआम पीट सकते हैं, वहां छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटनाएं कोई नई बात नहीं। यह एक अनकहा सच है कि इस तरह के लोगों में कुछ लोग विश्विविद्यालय के ही कुछ विशेष संकायों और हास्टलों के छात्र हैं। अतः इन अराजक तत्वों को विश्वविद्यालय से बाहर नहीं किया जा सकता।

मुझे यहां हो रही राजनीति से कोई मतलब नहीं है। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि अगर मैं किसी दूसरी आईआईटी में होता तो इस तरह की संकीर्ण मानसिकता और हिंसक प्रवृत्ति के स्थानीय गुंडों से मेरा सामना नहीं होता। एक आईआईटी को जिस स्तर की सुरक्षा की आवश्यकता है, आईआईटी कानपुर उसका सर्वश्रेष्ठ उदहारण है। हम मेस के खाने, संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य दूसरे दर्जे की सुविधाओं के साथ तो कॉम्प्रोमाईज़ कर सकते हैं, मगर सुरक्षा से नहीं।

मुझे बहुत दुख होता है जब मां फोन करके बोलती हैं, बेटा रात में कॉलेज में मत घूमा करो। मुझे पता है कई बार जब मैं उन्हें बताता हूं कि रात के 9 बजे मैं हॉस्टल से बाहर हूं तो उनका आधा ध्यान इसी बात में लगा रहता है कि उनका बेटा बस सुरक्षित हॉस्टल तक पहुंच जाये। मैंने उन्हें कभी नहीं बताया कि हॉस्टल आने के बाद भी मैं सुरक्षित नहीं हूं।

आप हम लोगों से भारत का भविष्य सुरक्षित करने की क्या उम्मीद करेंगे जब हमारा वर्तमान ही सुरक्षित नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि ज़िम्मेदार लोग इस समस्या का कोई समाधान ढूंढ पायेंगे या नहीं। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि वो लोग यह सब पढ़ने के बाद मेरी ‘बेचारों’ जैसी स्थिति पर हंसेंगे। बस मैं अपने मम्मी-पापा को किसी चिंता में नहीं देखना चाहता। मुझे सिक्योरिटी चाहिये, प्लीज़।

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