स्कूल भेज देने भर से खत्म नहीं होती पेरेंट्स की ज़िम्मेदारी

Posted by Santosh Verma in Education, Hindi, Society
November 17, 2017

विद्यालय एक ऐसी जगह है जहां हर समुदाय से बच्चे आते हैं और एक औपचारिक शिक्षा ग्रहण करते हैं। हम अक्सर ये बोलते हैं कि बच्चों में शिक्षक ज्ञान निर्माण करते हैं, लेकिन असल में बहुत हद तक शिक्षक बच्चों में पहले से विद्यमान ज्ञान को एक रूप, एक ढांचे में पिरोते हैं। कुछ गतिविधियों के माध्यम से, कुछ नवाचारों से और कुछ अपने अनुभवों को क्रियान्वित करके। आज मैं ऐसे ही कुछ शिक्षकों को धन्यवाद कहना चाहता हूं और उनके द्वारा किये जा रहे सकारात्मक प्रयासों के बारे में चर्चा करना चाहता हूं।

बच्चों में विकास के लिए सिर्फ विद्यालय ही नहीं बल्कि उनके अभिभावक भी एक अभिन्न अंग हैं, जो बच्चों द्वारा स्कूलों में की जा रही गतिविधियों को देखते हैं, उनके संग खेलते हैं और बच्च्चों से एक दोस्त का रिश्ता भी साथ-साथ गढ़ते जाते हैं।

अक्सर हम सुनते हैं कि अभिभावकों का स्कूल के प्रति कोई योगदान नहीं होता है, और वो स्कूल तो आते हैं लेकिन बस पंद्रह से बीस मिनट रुककर अपने काम पर चले जाते हैं। यह सत्य है, जिसका परिणाम बच्चों में उत्साह की कमी के तौर पर दिखता है। वो बच्चे जिनके अभिभावक स्कूल नहीं आते हैं वो अपने आपको अकेला महसूस करते हैं।

लगभग एक साल पूर्व मैंने एक छोटे स्तर पर शोध किया था, जिसमें तीन तरह के स्कूल लिए गए थे। यह सभी स्कूल उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा ज़िले में आते हैं। एक स्कूल जो किसी शहर से लगभग पचास किलोमीटर दूर एक गाँव में था, दूसरा स्कूल जो उसी शहर से कुछ दस किलोमीटर के भीतर था, और तीसरा जो उसी शहर में था। इस शोध में यह देखने की कोशिश की गई थी कि क्या अभिभावकों के स्कूल में न जाने से बच्चों के उत्साह में कमी आती है?

जो स्कूल दूर गाँव में था, उसमें कभी कभार एक-दो अभिभावक स्कूल पर आते-जाते थे जिसका कारण विद्यालय और समाज की समझ में कमी थी। वो अभिभावक विद्यालय को एक फैक्ट्री के रूप में देखते थे, उनका मानना था कि उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेज दिया मतलब उनका काम खत्म हो गया। तो परिणाम कुछ यूं था कि उस स्कूल का नामांकन कम था और बच्चों में उत्साह की कमी थी।

दूसरा स्कूल जो दस किलोमीटर के भीतर था और गाँव में ही था, वहां बच्चों की उपस्थिति कई ज़्यादा बेहतर थी, क्यूंकि वहां अभिभावक सप्ताह में एक दो बार बारी-बारी से स्कूल में चले जाते थे, और वहां शिक्षक से बात-चीत करते थे अपने बच्चों के भविष्य के बारे में और उनकी पढ़ाई के बारे में।

तीसरा स्कूल जो कि शहर के बीच में था, वहां अभिभावक अपने बच्चों को एक तो लेने और उनको स्कूल छोड़ने आते थे, साथ ही साथ वो स्कूल की शिक्षिकाओं से रूबरू भी होते थे अपने बच्चे की प्रगति के बारे में।

ऊपर किये गए शोध से पता चलता है कि अभिभावकों को जोड़ने में, उनके स्कूल में निरंतर न आने के लिए एक तरह से स्कूल के शिक्षक भी ज़िम्मेदार होते हैं।

क्यूंकि, हमारे समाज में शिक्षा की तरफ झुकाव तो हुआ है लेकिन हमारे अभिभावकों को शिक्षा के प्रति बच्चों के सहयोग और उनके भविष्य को बेहतर बनाने की समझ पूर्ण रूप से नहीं है ऐसा हम कह सकते हैं। लेकिन शिक्षक एक ऐसा व्यक्ति होता है समाज में जो एक बच्चे को बखूबी समझता है, उन्होंने बच्चों के सीखने सिखाने और उनके भविष्य को एक राह दिखाने के लिए एक खास तरह की पढ़ाई की होती है, जो कि उन्हें आम जनता से अलग पेश करती हैं।

इसलिए इन अभिभावकों को जोड़ने और स्कूल में निरंतर आकर अपने बच्चों के बारे में बातचीत करना आवश्यक होता है। जिसके लिए शिक्षकों को कुछ अथक प्रयास करने पड़ेंगे, जैसे शिक्षक-अभिभावक मीटिंग में कुछ रोचक गतिविधियां करना, अभिभावक जिन पेशों में हैं उसके बारे में बच्चो के सामने रूबरू होना और उन्हें बताना। क्यूंकि अभिभावक भी चाहते हैं कि यदि हम स्कूल जाएं तो स्कूल में उनकी इज्ज़त हो, उनके साथ एक अच्छा व्यवहार किया जाए, उनके बच्चों ने जो सीखा है उसकी सराहना की जाए, और शिक्षक उनसे बच्चों की प्रगति के बारे में और क्या किया जा सकता है उसपर एक सटीक ढंग से बात की जाये। साथ ही साठ यदि अभिभावकों को कोई चीज़ नहीं आती है तो ये शिक्षक की ज़िम्मेदारी है कि अभिभावकों को सिखाएं जिससे वो घर पर अपने बच्चों को सपोर्ट कर पायें।

कुछ इसी तरह दिल्ली के एक स्कूल में समर कैम्प में शिक्षिकाओं द्वारा ऐसे प्रयास किये जा रहे हैं जिसमें अभिभावक भी रूचि ले रहे हैं और पहली मीटिंग से दूसरी मीटिंग में उनकी भागीदारी भी बढ़ रही है।

इस स्कूल में अभिभावक जब आते हैं तो शिक्षिका एक-एक कर उनकी उपस्थिति दर्ज करती हैं, अभिभावकों को उनके बच्चों के संग बैठने को कहा जाता है, कुछ एक विषय पर उनको अपने बच्चों के साथ चित्र बनाने को कहा जाता है लेकिन शर्त ये होती है कि आधा अभिभावक बनाएंगे और आधा बच्चा, उनके साथ कुछ खेल खेले जाते हैं, जैसे म्यूज़िकल चेयर। अभिभावक और बच्चे मिलकर गाना गाते हैं, कहानी सुनाते हैं, अभिभावक बच्चों के संग नाटक और डांस करते हैं और किसी एक महत्वपूर्ण विषय पर उनसे बच्चों के समक्ष बोलने को कहा जाता हैं।

इन सब गतिविधियों से अभिभावक खुश हुए, जिसका परिणाम यह रहा कि पिछले सप्ताह शनिवार के ही दिन एक मीटिंग रखी गई थी जिसमें कुल 12 अभिभावकों ने भाग लिया था, और इस सप्ताह की मीटिंग में 15 अभिभावक आये थे जो तकरीबन 2 घंटे बच्चों के साथ स्कूल में समय बिताये, शिक्षिकाओं एवं SMC के अध्यक्ष से बातचीत भी की।

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि जब भी अभिभावक स्कूल में आएं तो बच्चों के द्वारा किये गए कार्यों की प्रदर्शनी की जाए और उनसे भी सुझाव मांगा जाए, अभिभावकों को बच्चों के साथ खेलने और कुछ गतिविधियों के द्वारा मीटिंग को रोचक बनाया जाए, क्यूंकि हर एक अभिभावक स्कूल में क्या हो रहा है उनके बच्चे कितना पढ़ रहे हैं या गतिविधियों में भाग ले रहे हैं, और शिक्षक कितना बच्चों को सिखा रहे हैं यह देखना चाहते हैं। और जब यह सब होता देखते हैं तो उनको भी उत्साह आता है कि हमारे बच्चे एक ऐसे स्कूल में पढ़ रहे हैं जहां शिक्षक और शिक्षिकाएं हमारे बच्चों को अपने बच्चों की तरह व्यवहार करते हैं और उन्हें सिखाते हैं।

यदि कुछ इन्हीं प्रयासों को स्कूलों द्वारा शुरू किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी जो समस्या है कि स्कूल में अभिभावकों की भागीदारी ना के बराबर है, कुछ हद तक समाप्त कर सकते हैं। लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह ध्यान रखने योग्य है कि उस स्कूल की लीडरशिप अच्छी होनी चाहिए। प्रिंसिपल या हेड टीचर अपने शिक्षकों को एक मंच प्रदान करें जिससे शिक्षक अपनी कक्षा में दबाव महसूस न कर सकें, और जो शिक्षक अपनी कक्षा में या स्कूल में पूर्ण रूप से बेहतर बनाने और बच्चों को सीखने के लिए प्रतिबद्ध हो उनको सम्मानित किया जाए स्कूल स्तर पर, गाँव स्तर पर और उस क्षेत्र स्तर पर। जिससे उन शिक्षकों का उत्साह बना रहे और बच्चों के सीखने-सिखाने का सिलसिला नवाचार के माध्यम से आगे बढ़ता रहे।

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