ऐसे बदनाम ना करों किसानों और क्रांति की धरती मेरठ को

Posted by Manish Poswal in Hindi, History, Society
November 27, 2017

क्रांतिधरा मेरठ ऐंवई नहीं नाम के साथ बदनामी लेकर चलती है, एक से एक तीस मार खां बसते हैं यहां। ताज़ा उदाहरण मेरठ के एक महाशय हैं, अब पता नहीं किस झोंक में जनाब ने 5 करोड़ का ईनाम भंसाली के सिर पर रख दिया। इसी तरह कुछ साल पहले मेरठ में एक कुरैशी साहब ने भी 51 करोड़ का ईनाम मुहम्मद साहब की गुस्ताखी के लिये किसी कार्टूनिस्ट के सिर पर रखा था। वैसे वो वाले कुरैशी पैसे वाले थे, कई कमेले (कसाईखाना) चल रहे हैं जनाब के। मतलब गर्दन कलम करने की घणी रकम देते हैं मेरठ वाले। आने वाले वक्त में और भी अच्छे ऑफर आएंगे मेरठ के इन बयानवीरों की ओर से, ऐसी आशा है।

पिछले कई सालों से मेरठ में कथित राष्ट्रवादियों का एक धड़ा महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के मंदिर के लिये पूरे हाथ-पैर मारता रहा है। बताओ जी गोडसे के भक्तों को मंदिर भी मेरठ में ही बनाना है, महाराष्ट्र से इत्ती दूर। ऐसे ही एक ज़माने में नेहरू जी के दौर में मेरठ के एक सांसद हुआ करते थे त्यागी जी। जब चीन ने भारत की ज़मीन हथिया ली और नेहरू जी ने कहा कि बंजर ही तो है, क्या हुआ? तो तपाक से गुस्से में त्यागी जी ने कहा कि मेरा और आपका सिर गंजा, बंजर है इसे भी चीन हथिया ले तो चलेगा। सही बात है, इधर हल्की सी डोल काटने पर लठ चल जाते हैं।

बात ऐसी है कि मेरठ में इस तरह के बड़े-बड़े पहुंचे हुए लोग हैं जो पता नहीं क्या घोषणा कर दें, किसके सिर पर तगड़ा इनाम रख दें और किसके मंदिर की घोषणा कर दें।

कुछ महीने पहले मेरठ के सरधना के ही एक सज्जन ने दो एकड़ में करोड़ों की लागत से मोदी जी का मंदिर बनाने की घोषणा की थी। गोडसे का मंदिर, मोदी जी का मंदिर और दो चार नए इसी तरह के मंदिर बन गए तो यकीन मानिए मेरठ की नई तरह की धूम मचेगी देश और दुनिया में। वैसे भी इनके भक्तों के लिये तीर्थ ही हो जाएगी क्रांतिधरा। किस्से और भी हैं, एक बार कांग्रेस की किसी रैली में मेरठ में किसी मेरठिये ने दिलीप कुमार पर जूता फेंका जिसे साथ में खड़े जॉनी वॉकर ने उठाकर प्यार से अपने कॉमिक अंदाज़ में कहा कि जनाब एहसान होगा जो दूसरा जोड़ीदार जूता भी फेंक दें तो जोड़ी बन जाएगी।

अभी तो बस शुरू हुए हैं, कल को कोई ये कहेगा कि भई मेरठ से रावण की पत्नी मंदोदरी थी और उनके पिता मय असुर के नाम पर मयासुर मंदिर बनाओ, तो क्या कीजिएगा? हां श्रवण कुमार की मिथकीय घटना भी यहां से जुड़ी है कि यहीं पर श्रवण कुमार का मन डोला था और वह अपने माता-पिता को छोड़ना चाहता था, खैर ये तो झूठ है तब तो मेरठ बसा ही नहीं था।

वैसे मेरठ की क्रांति तो जगप्रसिद्ध है पर उससे कुछ महीने पहले का एक किस्सा भी मशहूर है। एक बार कुछ अंग्रेज़ अफसर घोड़ों पर आस-पास के गांवों में रोब और ठसक के साथ घूम रहे थे। उसी वक्त मेरठ के पास के गांव पांचली के तीन किसानों से उनकी कहासुनी हो गई जो अपने खेतों में काम कर रहे थे। कहासुनी तो खैर क्या ही हुई होगी, क्योंकि किसान अंग्रेज़ी नहीं समझते होंगे और अंग्रेज खड़ीबोली तो कुल मिलाकर हाथापाई हो गई। बस उन बहादुर किसानों ने ज़बरदस्ती उन अंग्रेज़ों से हल जुतवाया और कुएं से पानी भरवाया। बाद में अंग्रेज़ों ने अपने ज़ुल्मी परंपरा को बरकरार रखते हुए दो को फांसी पर लटका दिया। कहने का लब्बोलुआब यह है कि मेरठ के किसान भी ऐसे रहे हैं जिन्होंने अंग्रेज़ तक नहीं बख्शे।

भले मानुषों अगर मंदिर जैसा कुछ बनाना ही है तो क्रांतिमंदिर बनाओ, क्रांतिघाट बनाओ, क्रांतिस्थल बनाओ क्योंकि मेरठ की बड़ी पहचान 1857 की जनक्रांति के लिये है ना। जनक्रांति के क्रांतिनायक व तत्कालीन कोतवाल धन सिंह कोतवाल की मूर्ति लगाओ उसमें। पहचान दिलानी है तो क्रांतिगांव पांचली, घाट, गगोल, सरधना के भमौरी गांव आदि को दिलाओ।

मवाना के एक महान क्रांतिवीर हुए राव कदम सिंह जिन्होंने 10 हज़ार किसान क्रांतिकारियों को साथ अंग्रेज़ों से टक्कर ली। राव कदम सिंह और उनकी क्रांतिकारी फौज के बारे में दिलचस्प तथ्य यह है कि ये सब सफेद मुंडासा कफन के तौर पर पहनते थे कि गोरों की बैंड बजाकर रहेंगे चाहें जिये या मरें। और भी हैं किसान नेता चौधरी चरण सिंह, कैलाश प्रकाश और पीएल शर्मा आदि।

वैसे एक काम और करवा सकते हैं, दोआब की धरती की देवी गंगा मैया का मंदिर बनाकर। अब देखिए कि हस्तिनापुर कस्बा मेरठ में है और देवी गंगा मिथकीय रूप में हस्तिनापुर में ही दुल्हन बनकर आई तो चट बन जावैगी थारी इस बात पर।

भले ही मैं मिथकों व गल्पों को इतिहास में ना रखता हूं, पर हमारे खेतों और जीवन के लिए गंगा एक देवी से कम दर्जा नहीं रखती।

अब इतना भी अहसानफरामोश नहीं कि बचपन से लेकर अब तक कई साल नहाण के मेले में डुबकी लगाकर गंगा का अनादर करूं और गंगा नदी का भौगोलिक पुत्र तो कहा ही जा सकता है दोआब में जन्म लेने वाले को।
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खैर क्रांतिघाट बने मेरठ में दिल्ली के राजघाट की तर्ज पर। क्रांतिघाट में मेरठ की क्रांति से जुड़ी घटनाओं को मूर्तिवत दिखाया जाए, जिसमें कोतवाल मेरठ की कोतवाली में क्रांति की हुंकार भरता दिखे।

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