“मेरे लेस्बियन होने या नहीं होने से तुम्हारी ममता में फर्क क्यों पड़ता है माँ?”

अपूर्वा श्रीवास्तव

मैंने जीवन में जब से समलैंगिकता को समझा है तब से इसके हित में कई छोटे-छोटे युद्ध लड़कर अपने आप को विजेता घोषित करती रही हूं। LGBTQ+ के अधिकार के हित में मुस्कुराते हुए अपने स्वर को हर मौके पर प्रबल रखती हूं। एक मनुष्य होने के नाते दूसरे मनुष्य का तिरस्कार होते देखना एक पाप है।

हाल फिलहाल की बात है, मेरी मॉं और मैं यूं ही छुट्टी के दिन बैठे कुछ गुफ्तगू कर रहे थे। मैंने माँ से पूछा, “कितना प्यार करती हो मुझसे मॉं?” मॉं ने हंसकर बोला, “निशर्त (unconditional) प्यार करती हूं तुमसे। जब बिजली नहीं होती थी तो तुम्हें रातभर पंखा कर सुलाया करते थे। जो पसंद होता वह खिलाते। बड़े अरमान से तुम्हें पढ़ाया।”

अब मैंने माँ से पूछा, “क्या तब भी इतना प्यार करती अगर मैं हिजड़ा होती?” माँ ने मेरी बात सुनकर भी अनसुना कर दिया।” माँ ने कहा कि कब से सोच रखा है तुम्हारी शादी एक बेहतरीन नौजवान से करेंगे। अब मेरा अगला सवाल था, “माँ अगर मैं लेस्बियन होती तो….”

इस बार शायद माँ और सुन ना सकीं। अचानक भाव बदल गए, तिलमिला कर कहा, “लेस्बियन होती तो ज़िन्दगी भर तड़प कर रहती मगर समाज के सामने ऐसी ओछी हरकत करने की इजाज़त नहीं मिलती तुमको।” इसके बाद मैंने पूछा, “माँ क्या मेरी अभिलाषा तुम्हारे लिए सर्वोपरि नहीं?” मॉं का जवाब था, “नहीं!”

पूर्वाग्रहों से ग्रसित जिस समाज को मेरे ब्रा के स्ट्रेप से डर लगता है, जिस समाज को मेरे काले रूप से डर लगता है, जो समाज मानसिक रोगियों का बहिष्कार करता है, उस समाज से बैर करना भी बचकाना ही है। इसके बावजूद मेरे साथ स्वीकृति और समानता के लिए लड़ रहे हर उस व्यक्ति पर अहंकार है मुझे। यह समाज होमोफोबिक नहीं फोबिक है। देखा जाए तो इस बनावटी समाज का जो ढांचा है, वह असुरक्षा और भय के बल पर निर्मित है।

वह घृणात्मक टिप्पणियां जो समाज तुमसे करता है, उसको फर्क से मैंने भी खंगाला है। तुम्हारी मासूम सी मुहब्बत पर जब-जब सवाल उठे हैं, उन सवालों को सीने से लगाया है और वादा करती हूं जब कभी भी यह समाज तुम्हारे स्वभाव के लिए तुम्हें लज्जित करेगा, उस निर्लज्जता को अपने माथे का आभूषण बनाकर पहनूंगी। क्योंकि तुम्हारे स्वभाव के लिए तुम्हें कोई कटघरे में खड़ा करे, यह इजाज़त तो खुदा के भी पास भी नहीं।

मुझे तो समझ ही नहीं आया कि अचानक मॉं की ममता में शर्त कहां से आ गए थे। एक पल में ऐसा लगा कि जैसे माँ का प्यार भी एक इत्तफाक मात्र ही होता है। ऐसा क्यों है कि इस ममता को पाने के लिए हेट्रोसेक्शुअल होना अनिवार्य है? यह तो ऐसी लड़ाई है जहां ज़्यादातर दुश्मन वह होता है जिससे हम बेहद प्यार करते हैं। एक भूरी एशियाई महिला होने के नाते मैं इस बात को समझती हूं कि कुरीतिक और विभेदात्मक मानसिकता के प्रेतों से जूझते हुए विद्रोह करके आगे बढ़ जाने का क्या अर्थ होता है।

मगर प्रसन्नता इस बात की हुई कि क्रोध में ही सही मगर समलैंगिगता की अभिस्वीकृति तो हुई। यह अभिस्वीकृति साक्षी है इस बात की कि इंद्रधनुष के जीवंत रंग सूक्ष्मता से अपना प्रभाव छोड़ रहे हैं। हमारी जीत हो रही है।

मेरे लिए प्राइड एक लफ्ज़ मात्र नहीं, जीवन को निरपराध और बेगुनाही से जीने का एक मार्ग है। प्राइड, इस संसार को एक बार फिर खुशनुमा कर देने वाला मौसम है। प्राइड, एक स्टेशन है उस सम्मिलित संसार की ओर जहां सहानुभूति के साथ-साथ आपसी सम्मान हो और विशेषण का बहिष्कार हो।

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