ऑनलाइन शॉपिंग और मॉल की चमक-दमक में कहीं खो गए मेरे गांव के फेरीवाले

Posted by Prashant Tiwari in Culture-Vulture, Hindi, Society
November 29, 2017

वर्तमान दौर ई-कॉमर्स का दौर है जिसमें लोग ज़्यादातर खरीदारी बैठे-बैठे अपने मोबाइल या लैपटॉप से कर लेते हैं। कभी अगर मन भी हुआ बाहर जाकर खरीदारी करने का तो मॉल चले जाते हैं जहां ज़रूरत की लगभग सारी चीज़ें एक ही जगह पर मिल जाती हैं, तो अलग-अलग दुकानों पर घूमने की ज़हमत कोई नहीं उठाता। इसकी कई वजहें हैं जिनमें से एक है लोगों के पास समय की कमी का होना और बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो मोलभाव से बचना चाहते हैं इसलिए ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं।

फिर भी अब भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो बाजार जाकर छोटी दुकानों से मोलभाव कर खरीदारी करते हैं, क्योंकि उनके पास पैसे भी कम होते हैं और उनको ये ऑनलाइन शॉपिंग के बारे में जानकारी भी कम है और विश्वास भी।

फोटो आभार: flickr

होम डिलीवरी के साथ खरीदारी के मामले में ज़माना एक कदम आगे निकल चुका है जिसमें एक आदेश पर सारा सामान आपके घर तक पहुंच जाता है, तो न बाहर जाने की ज़हमत न ही मोलभाव करने की। ये होम डिलीवरी की परंपरा भी बहुत पुरानी है। चौंकिए नहीं, मैं गांव-गांव घूमकर सामान बेचने वाले फेरीवालों की बात कर रहा हूं, वो भी तो एक तरह की होम डिलीवरी ही है। फेरीवाला अपनी साइकल और ठेले पर चूड़ी, बिंदी, कपड़ें, कम्बल, खिलौने और आम ज़रूरत की लगभग सारी चीज़ें लेकर गांव-गांव घूमता है और लोग उससे सामान खरीदते हैं।

अब फेरी का चलन बहुत कम हो गया है या कहें कि लगभग खत्म ही हो गया है। फेरीवालों से सबसे अधिक सुविधा महिलाओं को होती थी, वे ज़्यादा बाजार नहीं जा पाती थी तो उन्हें फेरीवालों से अपनी ज़रूरत के सारे सामान घर बैठे मिल जाया करते थे।

अलग-अलग फेरीवाले सामान लेकर हफ्ते में एक निश्चित दिन आया करते थे और लोगों को भी बेसब्री से उनका इंतज़ार रहता था। कोई सामान अगर उस बार नहीं लाए तो लोग अगली बार अपनी पसंद का सामान लाने को बोल देते थे। इतना ही नहीं पैसे न होने पर लोग उनसे उधार भी कर लेते थे और वो दे भी देते थे क्योंकि वहां उनका रिश्ता एक व्यापारी और ग्राहक से कहीं बढ़कर था।

मुझे याद है, बचपन में एक फेरीवाले महिलाओं की ज़रूरत के सामान लेकर आते थे। लोग उनको मुल्ला जी बुलाते थे और उनसे इतना मज़ाक करते थे कि उतना शायद अपने घरवालों से कर पाएं। वो कभी नाराज़ भी होते लेकिन लोगों की बैटन का कभी बुरा नहीं मानते थे। किसी हफ्ते अगर मुल्ला जी ना आएं तो लोग सोचने लगते की कहां रह गए मुल्ला जी, आए क्यों नहीं? एक अनाम सा रिश्ता बन गया था उनसे।

फिर, एक दिन अचानक से मुल्ला जी का आना बंद हो गया। काफी दिन गुज़रने के बाद लोगों को पता चला की मुल्ला जी नहीं रहे। यह सुनकर गांव में ऐसा माहौल बन गया था जैसे गांव का ही कोई आदमी चला गया हो। इसकी वजह थी इतने सालों में लड़ते-झगड़ते उनसे एक खास रिश्ता बन गया था।

फोटो आभार: flickr

बात जब फेरीवालों की हो रही है तो बिना हींग वालों का ज़िक्र किए बात पूरी नहीं होगी। मुझे हींग वालों की एक बात पर बहुत आश्चर्य होता है कि वे ठंड के मौसम में गांव-गांव जाकर हींग देते हैं और सबके नाम अपनी डायरी में नोट कर लेते हैं। फिर गर्मियों में आकर सबसे पैसे ले जाते हैं। कभी-कभी लोग थोड़े पैसे दे देते थे और कभी-कभी कुछ भी नहीं। जब हींगवाले पैसे लेने आते और अगर हींग में कोई खराबी होती तो लोग उसकी शिकायत करते, जिसपर वे पैसे कम कर देते या अगली बार उसके बदले हींग देने को कहते। उनकी हींग में कोई मिलावट नहीं होती थी। लोग वो हींग सालों तक रखे रहते थे और मेहमानों के आने या किसी खास अवसर पर उसका उपयोग करते थे।

गांवों में अब भी इक्का-दुक्का फेरीवाले आते हैं लेकिन लगभग ना के बराबर। गांव के लोग भी अब बाज़ार से खरीदारी करने लगे हैं, लोगों ने भी अब फेरीवालों से सामान खरीदना कम कर दिया है, इसलिए फेरीवालों को भी बाज़ार की ओर पलायन करना पड़ रहा है या उन्होंने कोई दूसरा धंधा संभाल लिया है।

इस परंपरा के खत्म होने से कई बातों का नुकसान हुआ, जैसे- फेरीवाले कभी-कभी अपने घर पर बनाई चीज़ें भी आस-पास जाकर बेच आते थे जिससे उनका जीवनयापन चलता था, वो भी खत्म ही हो गया है। फेरीवालों से गांव वालों को अलग-अलग जगहों के बारे में जानने-समझने के साथ-साथ खरीदारी के दौरान जो उनके साथ संवाद की प्रक्रिया होती थी वो भी खत्म हो चुकी है। साथ ही इस बहाने जो एक मानवीय रिश्ता बनता था वो भी फेरीवालों के गायब होने के साथ समाप्त हो चुका है।

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