कहीं महिलाओं की गधे से तुलना, तो कहीं जींस ना पहनने के लिए शपथ

किसी भी देश में समाज और सरकार दोनों के ही फैसले समाज की सांस्कृतिक व्यवहार को प्रभावित करती है। इसका असर समाज के लोकतांत्रिक चेतना पर गहरे रूप से पड़ता है क्योंकि इन फैसलों से बड़ी आबादी समूह की जीवन शैली प्रभावित होती है। हाल के दिनों में समाज के कुछ खास वर्ग समूह और सरकार के कुछ फैसले इस तरह के रहे हैं, जिसका असर लोकतांत्रिक चेतना पर गहरे रूप में पड़ेगा।

पहली खबर, राजस्थान शिक्षा विभाग की मासिक पत्रिका “शिवरा” में महिलाओं के स्वस्थ रहने के लिए कुछ सरल उपाए बताये गये हैं। जिसमें स्त्रियों को चक्की पीसना, बिलौना बनाना (माखन मथना), रस्सी कूदना, पानी भरना, झाडू पोछा लगाना आदि घर के कामों को अच्छा व्यायाम बताया गया है। हालांकि निजी दायरे में महिलाओं के घरेलू कामों की भूमिका को किसी भी देश की आर्थिक गतिशीलता में नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। परंतु, इसको महिला स्वास्थ के लिए आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं कहा जा सकता है। खासकर तब जब कुछ दिनों पहली राजस्थान सरकार ने 9वीं जमात की हिंदी की किताब में गृहणी की गधे से तुलना की गई थी। जिसमें कहा गया था कि गधा एक गृहणी की तरह होता है और गधे को गृहणी से बेहतर बताया गया था। ज़ाहिर है कि ज़रूरत महिलाओं के घरेलू कामों की प्रासंगिकता को अर्थव्यवस्था में उनके योगदान से जोड़ना है ना कि अच्छा व्यायाम बताकर श्रम की प्रासंगिकता को कम करना है।

दूसरी खबर, बिहार के बासोपट्टी (मधुबनी) में राम जानकी महाविद्यालय के परिसर में शपथ लेती बेटियां, जिसमें करीब चार सौ लड़कियों ने मोबाइल का उपयोग व जींस पैंट नहीं पहनने की शपथ ली। ध्यान रहे यह फैसला किसी समुदायिक समाज या किसी पंचायत का नहीं है। यह सर्तकता का कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि उन्हें लगता है कि लड़कियों के साथ छेड़छाड और दुष्कर्म, पहनावे और मोबाइल के इस्तेमाल के कारण होते हैं। हैरानी इस बात की है कि इस तरह के आयोजनों को जागरूकता और महिला सशक्तिकरण के लिए ज़रूरी बताकर उनको अभियान के स्तर पर चलाने  की योजना है। वर्चस्वशाली विचारों के विरुद्ध बिछ जाने वाला यह कदम आधी आबादी के युवा जोश की ऊर्जा को कुंद ही करेगा। यह उस राज्य की स्थिति है जहां राज्य सरकार मोबाइल ऐप के सहारे सामाजिक कुरतियों का समाधान खोजने के लिए प्रयास कर रही है। गौरतलब है कि पहली महिला फाइटर उड़ाने वाली भावना कंठ और गायिका के रूप में उभरी मैथली ठाकुर बिहार के मधुबनी ज़िले से ही आती हैं।

दोनों ही खबरे यहीं दिखाती हैं, आज भी ज़्यादातर महिलाएं आत्मनिर्भर होने के बावजूद या जो आत्मनिर्भर होने के लिए प्रयासरत हैं वे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चौधराहट से संघर्ष कर रही हैं। ज़ाहिर है कि दोनों ही खबरें उस तथाकथित सभ्य समाज की मानसिकता को पुष्ट करती हैं, जिसमें महिलाओं के लिए कुछ नियम बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर, स्वतंत्र महिला बनने से रोका जाता है। परंपरा, संस्कृति, रस्मों-रिवाज़ और धर्म के नाम पर उनका उत्पीड़न किया जाता रहा है।

औरत के हक यानी अधिकार क्षेत्र का सवाल आते ही स्त्री-प्रश्नों से संबंधित तमाम उलझे-अनसुलझे तथ्य मस्तिष्क में यों ही उभरने लगते हैं। आखिर ऐसा क्या है जो स्त्री अधिकार क्षेत्र की बात आते ही रसोई में चेहरे पर पर्दा डाले स्त्री का बिंब ही हमारे मानस में बन जाता है? परिवार और समाज की तथाकथित मर्यादा और इज्ज़त के नाम पर कोई भी स्त्री या लड़की मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करती। व्यवस्थाएं बड़ी-बड़ी व्याख्या करती हैं, कानून बनाती हैं, जागरूकता अभियान चलाती है, पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं होता है।

देखा जाए तो ये उन दो राज्यों की खबरें हैं, जहां समाज और सरकार महिलाओं की असमानता के आकंड़ों के पायदान में संतोषजनक स्थिति में पहुंचने के लिए तमाम नीतिगत कोशिशे कर रही हैं। साथ-साथ महिलाओं की अस्मिता की रक्षा का पुरुषवादी दंभ भी लगातार भरता है। गौरतलब है कि अन्य राज्यों में भी यह स्थिति अधिक उत्साहवर्धक नहीं है। तमाम राज्य सरकारे महिलाओं की असमानता के आंकड़े को दुरुस्थ करने के लिए नीतियां, कानून और सामाजिक स्थितियों का पुर्नमूल्यांकन कर रही हैं।

राजस्थान के पुरुष समाज का एक जाति वर्ग संजय लीला भंसाली की “पद्मावती” को लेकर महिला अस्मिता के निरूपण को लेकर अपने पेशानी का पसीना पोछ रहा है, काफी आक्रोश में दिख रहा है। समझ में नहीं आता जो समाज “पद्मावती” की अस्मिता को लेकर तोड़-फोड़ पर आतुर हो जाता है, आंदोलित हो जाता है, वहीं समाज स्कूल की किताबों में गृहणी की तुलना गधे से होने पर संगठित होकर आंदोलित क्यों नहीं हो पाता है?

वहीं दूसरी तरफ जो बिहार सरकार महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण को रोकने के लिए कभी शराबबंदी, तो कभी बाल विवाह, दहेज प्रथा को खत्म करने की तैयारियों का दंभ भर रही है, वहां का समाज लड़कियों के जिंस पहनने और मोबाइल फोन उपयोग करने से परेशान हो रहा है, सामूहिक रूप से लड़कियों को शपथ दिलवा रहा है। जींस पहनना या नहीं पहनना किसी की व्यक्तिगत इच्छा हो सकती है। जबकि सरकार इन सामाजिक कुरीतियों से निपटने के लिए मोबाइल ऐप बनाने की प्राथमिकता पर ज़ोर दे रही है।

तमाम राज्य सरकारों का मोबाइल ऐप पर निर्भरता का एक बड़ा कारण यह है कि इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार शहरी क्षेत्रों में इंटरनेट उपयोग करने वाली महिलाएं 30% की दर से बढ़ रही हैं, जबकि पुरुष 25% की दर से। तमाम सरकारे मोबाइल ऐप से समस्याओं के निदान खोजने के लिए प्रयास कर रही है। ज़रूरत उस इच्छाशक्ति की है, जो देश में इंटरनेट पर 30% महिलाओं की मौजूदगी को 100% में बदल सके। तभी महिलाएं सामाजिक कुरतियों के विरुद्ध मुखरकर अपनी यथोचित भूमिका स्वयं तय कर सकेंगी।

यह अजीबोगरीब यथास्थिति है जो यह सवाल खड़ा करती है कि किसी भी समाज में आधी आबादी को जीने के लिए मुक्त माहौल कब मयस्सर होगी? कब आधी आबादी यह महसूस कर पाएगी कि वह केवल किसी की इज़्जत या प्रतिष्ठा का टूल नहीं है, खुद भी एक जीती-जागती इकाई है। उसमें भी असीम संभावना है, वो भी जीवन में उन उपलब्धियों को पा सकती है, जो समाज, राज्य और देश का अलहदा तस्वीर पेश कर सकती है। पता नहीं स्त्री और पुरुष की कथित बराबरी का जाप जपने वाला समाज कब महिलाओं को मुक्ति देगा और कब वह मुक्तभाव से सांस भी ले पाएगी, जाने कब!

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