अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के विरोध में 18 दिसम्बर विरोध दिवस रामलीला मैदान दिल्ली में।

Posted by Mohammad Aadil
December 14, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

मुहम्मद आदिल

14 दिसंबर 2017 नई दिल्ली

अल्पसंख्यक अधिकार दिवस
18 दिसम्बर-2017
डॉक्यूमेंट्री प्रूफ़ और मुद्दों के आधार पर हम इस अंतर्राष्ट्रीय दिवस का बहिष्कार करते हैं।
18 दिसम्बर 1992 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने सभी मित्र देशों से आवाहन कर एक क़रार दाद पेश करते हुआ कहा था की 18 दिसम्बर – ( अल्पसंख्यक अधिकार दिवस ) के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जायगा इस दिन अल्पसंख्यकों के लिए नई नई योजनाये शुरू की जाएँगी, इनके अधिकारों के सुरक्षा की बात की जायेगी, इनकी जानमाल की हिफ़ाज़त की बात की जायगी आदि ताकि अल्पसंख्यक ख़ुद को सुरक्षित महफूज़ कर सकें और बराबरी का एहसास कर सकें व् किसी भी प्रकार के भेदभाव से सुरक्षित रह सकें । और 18 दिसम्बर को हर्षोउल्लास के साथ मना सकें।
परन्तु आज जिस प्रकार देश में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव, अत्याचार, ज़ुल्मो-सितम खुले तोर पर नाइंसाफ़ी, नफ़रत भरे भाषण, आये दिन मोब्लिंचिंग, लगातार राज्य व केंद्रीय सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के सालाना बजट में कटौती की जा रही है,

अल्पसंख्यकों पर लगातार होती साज़िशें को, देखते हुआ हुआ ज़रूरी हो जाता है कि अल्पदंख्यक अधिकार दिवस के मौक़े पर हम अपने ऊपर होने वाले सरकारी ज़ुल्मो सितम, ज़्यादतियों, खुले भेदभाव और ग़ैर बराबरी के ख़िलाफ़ उठ खड़े हों और अपने ज़िंदा होने का सबूत पेश करेते हुआ दिनॉक: 18 दिसम्बर का बहिष्कार करते हुआ अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर अपना विरोध दर्ज करें।
18 दिसम्बर 2017 को हम दिल्ली के रामलीला मैदान में दोपहर 12 बजे अल्पसंख्यक अधिकार दिवस का पुरज़ोर तरीके से बहिष्कार करेंगे और सरकार की बेईमानी व् इंज्यूस्टिस, डिस्क्रिमिनेशन को दुनियां के सामने रखेंगे। आप लोगों से गुज़ारिश है के रामलीला मैदान पुहुचँ कर प्रोग्राम को कामयाब बनाने में योगदान करें।

देश के सभी बुद्धिजीवी, जागरूक मीडिया समूह, समाजसेवी, सिविल सोसाइटी, युवा, पत्रकार, छात्र 18 दिसम्बर को रामलीला मैदान दिल्ली पहुचकर, और अपने छेत्र में कार्यक्रम कर अलपसंख्यक दिवस का बहिष्कार करे।

हाल ही में अमेरिकी कमीशन के “इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम” द्वारा सार्वजनिक तौर पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई। यह कमीशन विश्व स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता पर नज़र रखता है और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में उल्लिखित मानकों को ध्यान में रखकर अपना रिपोर्ट बनाता है। और अमेरिकी सरकार को उस देश के प्रति नीतिगत फैसला लेने के लिए सुपुर्द करता है। इस रिपोर्ट में 1 फ़रवरी, 2015 से 29 फ़रवरी, 2016 तक की अवधि की महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख किया गया ह

दलित और मुस्लिम समुदाय के ऊपर हमले के खिलाफ विरोधरिपोर्ट के अनुसार, 2015 में, भारत में धार्मिक सहिष्णुता की स्थिति बिगड गई है और धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघनों में अधिक वृद्धि पाई गई। अल्पसंख्यक समुदायों को हिंदू राष्ट्रवादी समूहों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रताड़ना, उत्पीड़न और हिंसा की कई घटनाओं का अनुभव करना पड़ा है। इन तथाकथित राष्ट्रवादी समूहों को भारतीय जनता पार्टी का मौन रूप से समर्थन प्राप्त होने का आरोप लगा है। ये राष्ट्रवादी धार्मिक –विभाजनकारी भाषा का इस्तेमाल कर लोगों क भड़काते हैं, और भिन्न-भिन्न समाज के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा करते हैं।राष्ट्रीय सरकार या राज्य सरकारों ने धर्मांतरण, गौ हत्या और गैर सरकारी संगठनों द्वारा विदेशों से आर्थिक सहायता लेने पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए कई कानून लागू किए हैं। भारत के संविधान में किये गये प्रावधान अल्पसंख्यक  समुदाय को समानता और धर्म के विश्वास की स्वतंत्रता प्रदान करते है, लेकिन इसके विपरीत सरकारों और तथाकथित राष्ट्रवादियों द्वारा उनके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। इन परिस्थितियों को देखकर अमेरिकी कमीशन के “इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम” (USCIRF) ने भारत को फिर से टायर-2  की  स्थिति में रखा है, जहां वह 2009 से स्थित है। इसके तहत आने वाले वर्षों के दौरान अगर स्थिति और गंभीर होती है तथा धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन होते रहे तो ऐसी स्थिति में भारत को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (IRFA) के तहत “विशेष चिंतावाला देश” घोषित करने के लिए अमेरिकी प्रशासन को कमीशन द्वारा सिफारिश की जा सकती हैअधिकारिक तौर पर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की अनुमानित संख्या 20 करोड़ है। रिपोर्ट कहती है कि जनवरी 2016 में, अल्पसंख्यक मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष संवाददाता रीटा नाडिया के अनुसार, 2015  में दलितों के विरुद्ध अपराधों की संख्या और उसकी भीषणता बढ़ी है। हिंदू दलितों को धार्मिक भेदभाव का सामना करना पडता है। कई मामलों में, “उच्च जातियों” के व्यक्तियों और स्थानीय राजनीतिक नेताओं द्वारा उन हिंदुओ को धार्मिक मंदिरों में प्रवेश करने से रोका है, जिन्हें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (दलितो) का हिस्सा माना गया है। तमिलनाडु राज्य में तिरुपुर जिले के 7 गावों में, दलितों को मंदिरों में  दाखिल होने या आरती करने की अनुमति नहीं थी क्योंकि दलितों के प्रवेश से मंदिर “अपवित्र” हो जाता है ऐसी एक धारणा है। ऐसे मंदिर प्रतिबंध के विरोध में दर्ज मामले जिला अदालत में अधिकतर अनिर्णीत होते हैं। जून 2015 के अनुसार, पिछले 5 वषों में गुजरात राज्य के 8 जिलों में ऐसे 13 मामले दर्ज थे, जहां दलितों द्वारा मंदिरों में प्रवेश करने पर प्रतिबंध था। इसके अतिरिक्त, गैर-हिंदू दलित, विशेष रूप से ईसाइयों और मुसलमानों को हिंदू दलितो के लिए उपलब्ध नौकरियों या स्कूल नियोजन में अधिकारिक आरक्षण नहीं मिलता, जो इन समूहों की महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक उन्नति में बाधा पहुंचाता है।रिपोर्ट में कहा गया कि भारत एक बहु-धार्मिक, बहु-जातीय, बहु-सांस्कृतिक देश और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है।  भारत विश्व की कुल जनसंख्या की 1/6 जनसंख्या वाला विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है, जहां लगभग 80% जनसंख्या हिंदू, 14% से ज्यादा मुस्लिम, 2.3% इसाई, 1.7% सिख , 1% से कम बुध्दिष्ट हैं (80 लाख), 1% से कम जैन हैं (50 लाख) और एक प्रतिशत वे लोग हैं, जो अन्य धर्मो से सबंधित हैं या जिनका कोई धर्म नहीं है। फिर भी देश ने समय-समय पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसाओ का अनुभव किया है। 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुई हिंसक घटनाओं के कारण 40 लोग मारे गए, 12 से अधिक औरतें और लडकियों के साथ बलात्कार हुआ और 50,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए।रिपोर्ट के नुसार, जब से भाजपा ने सत्ता संभाली है, तब से धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों पर भाजपा नेताओं द्वारा अपमानजनक टिप्पणियाँ हुई हैं और हिंदू राष्ट्रवादी समूहों, जैसे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद द्वारा बल-पूर्वक धर्मांतरण के लिए मजबूर किया गया है और कई हिंसक हमले हुए हैं। भाजपा एक हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोग से स्थापित हुई है और इन दोनों ने उच्चतम स्तर पर घनिष्ठ संबंध बनाए रखें हैं। ये समूह हिंदुत्व की विचारधारा को मानते हैं, जो हिंदुत्व के मूल्यों पर भारत को एक हिंदू राज्य बनाने का प्रयास करते हैं।भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे वर्तमान सरकार से पहले से ही मौजूद हैं, लेकिन भाजपा सरकार के समय से उन्हें अधिक लक्षित किया जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि 2008 और 2010 में भारत में आतंकवादी हमलों के बाद से मुसलमानों (युवा लड़को एंव पुरुषों) को अनुचित जांच और मनमाने ढंग से गिरफ़्तारी का सामना करना पड़ा है, जिसे सरकार आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए आवश्यक ठहरा रही है।  एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक वर्ष के दौरान भारत में मुस्लिम समुदाय के प्रति उत्पीड़न, हिंसा, नफरत और लक्षित अभियानों में वृध्दि हुई है। मुसलमानों पर अक्सर आतंकवादी होने, पाकिस्तान के लिए जासूसी करने, धर्म परिवर्तित करने और हिंदू महिलओं से शादी करने और गायों का कत्लेआम करने का आरोप लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त, मुस्लिम समुदाय के नेताओं और सदस्यों का कहना है कि  मसजिदों की निगरानी रखी जा रही है. अल्पसंख्यकों के इन आरोपों के मद्देनजर अमेरिकन कमीशन (USCIRF) के प्रतिनिधि मंडल ने मार्च 2016 में भारत का दौरा करने की योजना बनाई थी, लेकिन भारत सरकार ने इस पर आपत्ति कर वीजा जारी करने के लिए इन्कार कर दिया था। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने इसे निराशाजनक कहा था।रिपोर्ट में कहा गया है की, भाजपा और आरएसएस के सदस्यों द्वारा यह दावा करना कि मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि हिंदू बहुमत कम करने का प्रयास है, धार्मिक तनाव को बढ़ाता है। योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज जैसे भाजपा सांसदों द्वारा मुस्लिम जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने के लिए कहकर हिन्दुओं  को मुसलमानों के खिलाफ उद्दीपित किया जाता है। फ़रवरी, 2015 में संघ परिवार की बैठक का वीडियो सामने आया है। जहां स्पष्ट कहा गया कि, प्रतिभागी “मुसलमानों को नियंत्रित करें और राक्षसों को नष्ट करें”। भाजपा शासित कई राज्य और राष्ट्रीय राजनीतिक स्तर के नेता वीडियो में दिखाई दे रहे हैं, मुसलमान दावा करते हैं कि  वे पुलिस पक्षपात और आरएसएस द्वारा पुलिस की धमकी के कारण शायद ही कभी दुर्व्यवहार की रिपोर्ट करते हैं।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 के मद्देनजर ज्यादातर भारतीय राज्यों (2015 में, 29 में से 24) ने गौ हत्या पर पाबंदी लगाई है। इन प्रावधानों ने मुसलमानों और दलितों को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है। सितंबर  2015 में,  उत्तर प्रदेश के बिशारा गांव में, लगभग 1,000 लोगों की भीड़ ने मोहम्मद अखलाक को कथित तौर पर गाय की हत्या के लिए मार डाला। रिपोर्ट कहता है कि हत्या व दंगा करने के आरोप की समीक्षाधीन अवधि के अंत तक कोई अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध नहीं हुई। अक्टूबर 2015 में कश्मीर में जाहिद रसूल भट्ट को कथित तौर पर गौ हत्या के लिए गायों को ले जाने के कारण आग लगाकर मार दिया गया। पिछले दो वषों में भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के सदस्यों द्वारा गौमांस प्रतिबन्ध कानून के उल्लंघन का इस्तेमाल हिंदुओ को मुसलमानों और दलितों पर हिंसक हमला करने के लिए भड़काया गया।हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने तथाकथित “घर वापसी” कार्यक्रम के हिस्से के रूप में हजारों ईसाई और मुसलमान परिवारों को हिंदू धर्म में वापस लाने की योजना की घोषणा की। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादियों ने इस अभियान के लिए धन इकट्ठा करना शुरू किया। लेकिन घरेलू और अंतराष्ट्रीय हाहाकार के बाद आरएसएस ने अपनी योजना को स्थगित कर दिया। फिर भी, 2015 में भारत के धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों का छोटे पैमाने पर बलपूर्वक धर्मांतरण की रिपोर्ट सामने आई है।

लेखक नेचर वॉच के उप संपादक है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.