आंतरिक लोकतंत्र का दिखावा।

Posted by Sandeep Suman
December 3, 2017

Self-Published

गुजरात चुनाव से पूर्व एक और चुनाव होने जा रहा है, शायद जिसे चुनाव कहना भी बेईमानी हो, क्योंकि उसके परिणाम से सब परिचित है और लोगो को उसमे कोई दिलचस्पी भी नहीं खुद उसमे भाग लेने वाले या चुनाव करने वाले लोगो को भी नहीं, वो चुनाव है कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव। चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है, जैसा उम्मीद थी वैसा ही होता दिख रहा है न कोई आवेदन पत्र लेने में दिलचस्पी दिखा रहे है, ना कोई खुल कर कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी पेश कर रहा है। क्योंकि सब जानते है ऐसा करने पर गांधी परिवार के वफादार सिपाही उन्हें गैर कांग्रेसी या बीजेपी का एजेंट करार दे देंगे, जैसा शहजाद पूनावाला के साथ हुआ, चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने पर कांग्रेसी नेता उन्हें कांग्रेसी मानने से इंकार कर दिए, इतना ही नहीं उनके खुद के भाई जो एक कांग्रेसी नेता है उन्होंने भी शहजाद का विरोध किया। अब सवाल उठता है कि जब इस तरह का माहौल बना दिया गया है कि राहुल गांधी के अलावे या गाँधी परिवार के अलावे कोई अध्यक्ष पद पर आसीन नहीं हो सकता तो फिर ये चुनाव का दिखावा ही क्यों ?आखिर ऐसे चुनाव का क्या फायदा जिसमें सिर्फ एक प्रत्याशी हो ? अगर कोई प्रत्याशी के काबिल खुद को समझ कदम भी बढ़ाये तो उसपर मनोवैज्ञानिक दवाब डाल हटवा दिया जाए। कितना विचित्र होगा जब एकल प्रत्याशी चुनाव प्रक्रिया को गंभीरता देने के लिए दाखिला देगे, और इंतेजार करे अन्य किसी के अपना नामांकन वापस लेने के लिए, जबकि कोई अन्य होगा ही नहीं।

पूर्व घोषित कांग्रेस अध्यक्ष के समक्ष बस चुनौती ये रह गई है की उन्हें किस दिन अध्यक्ष पद प्राप्त करने की औपचारिकता पूरी की जाए, नामांकन वाले दिन या नामांकन वापस लेने के अंतिम दिन । देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी किस मुख से इसे आतंरिक लोकतंत्र का अमलीजामा पहनाएगी, कैसे लोगो को विश्वास दिलाएगी की उसे भीतर आंतरिक लोकतंत्र है ? कांग्रेस के मुश्किल भरे इस दौर में कैसे अपने कार्यकर्ताओं में ये विश्वास जगाएगी की उसकी पार्टी में काबिलियत को तर्जी दी जाती है ? यह सही है कि देश के कई राजनीतिक दलों में अध्यक्ष कुछ इस तरह ही चुने जाते है, लेकिन कई ऐसे भी राजनीतिक पार्टियां है जहाँ अध्यक्ष पद की कई दावेदार होते है और चुनाव प्रक्रिया के द्वारा चुने जाते है, और मौजूदा दौर में लोकप्रियता भी प्राप्त कर रहे है, निम्न पृष्टभूमि से उठ कर अपने काबिलियत से ऊंचे पदों पर आसीन हुए है जिस कारण जनता की बीच अपनी पैठ बनाने में कामयाब हुए। आखिर इस तरह का आंतरिक लोकतंत्र देश की सबसे पुरानी पार्टी में क्यू नहीं दिखता ? जबकि देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के नाते औरों के समक्ष एक आदर्श होनी चाहिए, आज खुद सवालों के घेरे में है। वक़्त की नजाकत को समझते हुए कांग्रेसी वक़्त रहते स्वामिभक्ति की राह से हट लोकतंत्र का दामन थाम ले तो कांग्रेस और देश दोनों के लिए सुखद होगा। फ़िलहाल इसकी सुगबुगाहट दूर-दूर तक नहीं दिखाई पड़ती, और ये निष्क्रियता शायद औरों के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के स्वप्न को साकार करने में सहायक सिद्ध होगी।

संदीप सुमन

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