आधी आबादी के अधूरे अधिकारों बिना कैसे पूरा होगा संपूर्ण मानवाधिकार का सपना

Posted by Rachana Priyadarshini
December 9, 2017

Self-Published

हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है. मानवाधिकार किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान से जीने का अधिकार है,चाहे वह महिला हो या पुरुष. विडंबना यह है कि हमारे देश के कानून में भी महिलाओं व पुरुषों के समान अधिकार दिया गया है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर इस उद्देश्य को सफल बनाने के लिए अभी भी काफी कुछ करना बाकी है.
महिलाओ को भारत में हमेशा से बहुत ऊंचा मान-सम्मान मिला हुआ है. हमारे देश में स्त्री देवी है, मां है, बहन है, अर्धांगिनी है. उन्हें ‘घर की इज्जत’ मानते हैं. इसमें कोई दो राय नही है, क्या आपको याद है स्त्री के इन जिम्मेदार रूपों को देखने के आदि होने के बीच मे आखिरी बार कब आपने उसे इंसान माना था? कब उसके अधिकारों की, उसके खुशियों की परवाह करते हुए उसके लिए अपनी खुशियों का त्याग किया था? शायद हम सबके लिए यह बताना मुश्किल हो. कारण हम एक बहन, बेटी, पत्नी और मां के रूप में स्त्रियों से अपेक्षाएं तो बहुत रखते हैं, लेकिन उनके प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय उनकी अनदेखी कर देते हैं. कहने को तो स्त्री आधी आबादी है, लेकिन यह आधी आबादी आज भी अपने अधूरे अधिकारों व सपनों के पूरे होने के इंतजार में मर्यादाओं की बलि बेदी पर खड़ी है और पुरुष समाज अपने वर्चस्व और सृष्टि पर एकाधिकार की लाठी लिए उसका सिरमौर बना हुआ है. किसी स्त्री को क्या और कितने अधिकार देने हैं, यह आज भी पुरुषों के स्वविवेक पर निर्भर है. आखिर ऐसा क्यों? क्या लड़कियां इंसान नहीं या फिर उनके पास सोचने-समझने की क्षमता की कमी है? आखिर कब तक उन्हें बार-बार उनसे खुद को साबित करने की अपेक्षा की जाती है? अरे भाई, वे लड़कियां हैं, कोई मैथ्स की थ्याेरी नहीं, जो उन्हें  हर बार खुद को प्रूव करने की जरूरत पड़े.

एनसीआरबी (2016) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार आज भी महिलाओं के प्रति सबसे ज्यादा उनके पति या सगे-संबंधियों द्वारा किये जानेवाले मारपीट के मामले ही है. ऐसा नहीं है कि अपराधों के इन आंकड़ों के लिए सिर्फ भारत ही कटघरे में खड़ा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया मे हर तीसरी महिला यौन हिंसा का शिकार होती है. अति शिक्षित सम्पन्न देश अमेरिका भी इसका अपवाद नही है. दुनिया भर के संसदों में भी महिलाओं को दुर्व्यवहार ,यौन शोषण,और हिंसा से गुजरना पड़ता है.विश्व की 80 फीसदी महिला सांसद भी यौन हिंसा का शिकार हुई है जिनपर देश की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी है.जरा सोचिये जब इतने जिम्मेदार पदों पर आसीन महिलाएं भी सुरक्षित नहीं हैं, तो फिर ऐसे में तीसरे मुल्क के देशों की बात करना भी बेमानी है.

क्या कहते हैं आंकड़ें
एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार बीते एक साल में भारत में पति या सगे-संबंधियों द्वारा महिला प्रताड़ना के सबसे ज्यादा कुल 1,10,378 मामले हैं,जिनमें पश्चिम बंगाल (19,302), राजस्थान (13,811) यूपी (11,156) क्रमश: पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर है. वहीं महिलाओं को अपमानित करने के उद्देश्य से प्रताड़ित करने के कुल 84,746 मामले सामने आये हैं, जिनमें महाराष्ट्र (11,396) नंबर वन पर है, जबकि उत्तर प्रदेश (11,335) दूसरे और मध्यप्रदेश (8,717) तीसरे स्थान पर है. महिलाओं के अपहरण के मामले भी कुछ कम नहीं हैं. इनकी कुल संख्या 64,519 है, जिसमें भी उत्तर प्रदेश (12,994) पहले स्थान पर है और उसके बाद क्रमश: महाराष्ट्र (6,170) और बिहार (5,496) के मामले शामिल हैं. बीते एक साल में रेप के मामले में मध्य प्रदेश नंबर वन पायदान पर है. देश भर के कुल 38,947 दर्ज मामलों में से अकेले मध्यप्रदेश में ही 4,882 मामले पाये गये. उसके बाद उत्तर प्रदेश (4,816) और महाराष्ट्र् (4,189) में ऐसी घटनाएं सामने आयीं.
मध्यप्रदेश के माथे पर लगे इस दाग को धोने के लिए शिवराज सरकार ने हाल ही में एक विधेयक पारित किया, जिसके मुताबिक 12 साल या उससे कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार के आरोपियों को फांसी की सजा दिये जाने का प्रावधान शामिल है. इस बिल को विधानसभा एमपी ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया है. इस तरह नाबालिग से रेप और गैंगरेप के आरोपी को मृत्युदंड की सजा देने के विधेयक को मंजूरी देने वाला मध्य प्रदेश पहला राज्य बन गया है. लेकिन क्या मात्र कानून बना देने या आदेश पारित कर देने मात्र से ही महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी? अगर ऐसा है तब तो देश में हर साल महिला अपराधों के मामलों में उत्तरोत्तर कमी ही आनी चाहिए थी, क्योंकि देश की आजादी से लेकर अब तक महिला सुरक्षा के न जाने कितने कानून बनाये जा चुके हैं, पर अफसोस कि हो इसका ठीक उल्टा रहा है. महिलाओं के खिलाफ अपराध कम होने के बजाय साल दर साल बढ़ते ही जा रहे हैं. वर्ष 2014 – 2015 में देश में जहां अपराध की दर 3.0% फीसदी थी, वहीं 2015 – 2016 यह 2.6% फीसदी रही. अब ऐसे में हम क्या यह कह सकते हैं कि अपराध में वास्तव में कमी आयी थी? क्योंकि अगर हम कुल आंकड़ों पर गौर करें, तो वर्ष 2014 में भारत में कुल 3,39,457 मामले (56.6 फीसदी), वर्ष 2015 में कुल 3,29,243 मामले (54.2 फीसदी) और वर्ष 2016 में कुल 3,38,954 मामले (55.2 फीसदी) दर्ज हुए.
एक तरह से देखा जाए तो ये बुनियादी आंकड़ें हमारे समाज की गिरती सेहत का संकेत हैं. बीच में एकाध साल कमी आने का मतलब यह नहीं है कि सबकुछ ठीक हो गया या ठीक हो रहा है, क्योंकि ये कमी भी नाममात्र की बेहतरी ही दर्शाती है. ये आंकड़ें बताते हैं कि तमाम दावों के बावजूद आधी आबादी को उनका पूरा हक नहीं मिल पा रहा. आज भी बेटों की चाहत में दर्जनों बेटियां पैदा करनेवाले दंपतियों की कमी नहीं है. बेटियों को जन्म से पहले कोख में मारने की परंपरा आज भी कायम है. कहीं उसकी पढ़ाई के खर्चों में कटौती की जा रही है, तो कहीं दहेज के नाम पर किसी घर की बहू को घरेलू हिंसा की शिकार होना पड़ रहा है. जाहिर है जब तक यह स्थिति बदलती, तब तक हम बराबरी और न्याय की लड़ाई जीत नहीं सकते, जो कि किसी भी सभ्य समाज की पहली शर्त है. सही अर्थों में मानवाधिकार के लक्ष्यों की प्राप्ति तभी संभव है, जब दुनिया के हर इंसान को उसके लिंग, जाति, संप्रदाय, धर्म और क्षेत्रीय सीमाओं से परे उसे एक इंसान के तौर पर जीने का पूरा-पूरा हक मिले.

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