आध्यात्मिकता और हमारे बच्चे

Posted by Sparsh Choudhary
December 28, 2017

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पोप फ्रांसिस जो 1.2 बिलियन ईसाईयों के मुखिया हैं –अपने क्रिसमस सन्देश में कहते हैं कि ‘जीसस’ म्यांमार,बांग्लादेश,इजराइल, यमन और सीरिया जैसे तमाम हिंसाग्रस्त देशों के ‘बच्चों ‘ में रहते हैं . धर्म आध्यात्मिकता और मानसिक शांति इन “बेबी जीसस ‘ के सन्दर्भ को ध्यान रखे बिना अधूरी है .

हम शिक्षित नागरिक खुद को सेक्युलर याने धर्मनिरपेक्ष कहने में सीना चौड़ा करते हैं . करना भी चाहिए . हम इसीलिए किसी भी धर्म के हों ,सारे त्यौहार हमें प्रफ्फुलित करते हैं और कुछ मूल्य सिखाते हैं ,कुछ फेस्टिव शौपिंग कराते हैं ,कुछ मीठा और कुछ प्रार्थना-पूजा-नमाज़-अरदास करवाते हैं . कश्मीर घाटी में एक सौ बीस साल पुराने चर्च में मुस्लिमों और क्रिस्चियन कम्युनिटी ने मिलकर ईसाईयों के इस ख़ास त्यौहार को मनाया . भारत की तो बात ही निराली है .मिटटी में घुली और हवा में सुगन्धित मोहब्बत और सौहार्द की कई मिसालें हैं यहाँ . बावजूद हिंसक तत्वों के .

और साथ ही प्रगतिशील आधुनिक समाज में धर्म- आध्यात्मिकता के मायने भी बदल गये हैं . पर आज सबसे ज्यादा इसी धर्म कर्म के बीच इन्ही बच्चों को हिंसा , बेघरी ,दुर्घटनाओं , ट्रैफिकिंग और बाल श्रम का सामना करना पड़ता है . दिल्ली में एक सो कॉल्ड स्प्रिचुअल यूनिवर्सिटी में ‘शोषित’ तमाम मासूम बच्चियां इसकी सिर्फ एक बूँद मात्र हैं .कैलाश सत्यार्थी जी अपनी किताब “आज़ाद बचपन की ओर “ में बताते हैं न कि हर धर्म हर सम्प्रदाय ने हमारे बच्चों को निराश , हताश किया है .और उन्हें बचाने के लिए शायद हमारी प्राथमिकताएं नही हैं .

 

खैर हम क्रिसमस की बात कर रहे थे . हुआ यूँ कि अब त्यौहार तो बहाना है , केक और पेस्ट्रीज और चॉकलेट खाने का . तो जब मैं कल जा रही थी केक वगैरह लेने को , कुछ गुब्बारे बेचने वाले बच्चे मिल गये . ये बच्चे जब मुझे दिखे , तो मानों मैं ख़ुशी से फूली नही समायी . बताती हूँ क्यूँ .
इस समूची दुनिया में बच्चों की हँसी और उनकी चमकती आँखों सा सुन्दर प्रकृति के सिवाय मुझे कुछ या कोई नज़र नही आता . और बच्चे बच्चे होते हैं . किसी भी क्लास –क्रीड-रेस-तमाम दुनियावी लेबलों से परे . और उन्हें ज्ञान बांटना आसान है कि साफ़ रहा करो . ऐसे मत बोलो .वगैरह . हाँ वही जो हम अक्सर सोफ़िसटीकेटेड शहरी नाक़ भौं सिकोड़ते हैं इन्हें देखके ,पर उनकी ज़िन्दगी जीना जिनका प्लेग्राउंड सड़क गलियां चौबारे हैं,आसान नही है ..
इन बच्चों से पूछने पर कि क्या वो केक खायेंगे उन्होंने आशा भरे लहजे में सर हिलाया . अपने और उनके लिए पेस्ट्रीज लाकर मैं उन्हें खड़े होकर एक दूसरे से खिलखिलाते मस्ती करते और कुछ कही अनकही बातों में डूबा देख बेहद खुश होने लगी . दो और बच्चियां आ गयीं . मैंने कहा आप लोग शेयर करके खाओ सब .
जानती हूँ ,एक समय केक और फिर बाद में पेट भर सैंडविचेज़ की संतुष्टि देकर मैंने कोई अहसान नही किया क्यूँकि ये तृप्ति उनसे अधिक मेरे मन को प्राप्त हो रही थी .और ये भी जानती हूँ ,कल पता नही ये क्या खा पाएंगे या भूखे रह जायेंगे या भीख मांगने और चुराने पर मजबूर .और इससे कहीं ज्यादा जब तब हम सब अपने ‘मन’ के लिए स्टफ करते रहते हैं अपने पेट को . पर उसकी कीमत नही जानते . ये बच्चे जानते हैं .

पिछले नए साल की शाम को पापा और मैं उसी जगह दो बच्चों को गुबारे दिलाकर ऐसे ही आह्लादित हो गये थे . हालाँकि बाद में मैंने पलट के देखा था तब और और भी बच्चे थे जो अचानक कहीं से उम्मीद लेके आ गये थे पर तब हम वापस नही जा पाए उनके चेहरों पर भी हंसी बांटने को . पर वो दृश्य अप्रतिम था हम दोनों के लिये.

नाचते फुदकते बच्चे .

कितनी छोटी सी कीमत होती है न इन बच्चो की ख़ुशी की . और शायद अधिकांशतः सब बच्चों की . जिन्हें हमने डिस्टर्ब नही किया है अपनी कंडिशनिंग से .

और ऐसे में मुझे आध्यात्मिकता के लिए एक और परिभाषा मिली . इन्ही छोटी छोटी खुशियों में आध्यात्मिकता है , सुकून है ,चैन और आराम है .

और जब आप मुस्कराहट बांटते हो न तो आप खुदा के और करीब हो जाते हो . किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार ,किसी के मिल  सके तो ले  उधार .जीना इसी का नाम है . कोई धर्म कोई मज़हब और कोई भगवान हो . सब यहीं हैं इन्ही मासूम ,निर्दोष और पाक़ बच्चों में हैं . तो आओ , इस त्योहारी मौसम और नए साल की शाम पर प्यार बांटे . बिना हदों का ,बिना सरहदों का और खासकर इन मासूमों के साथ .

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