आशीषों के नीड़ से by ऊषा गुप्ता

Posted by Book Release
December 15, 2017

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पीड़ा कविता की जननी है। आदि कवि वाल्मीकि, मादा क्रौञ्च के विलाप से इतने व्यथित हुये कि उनके मुख से अनायास ही छन्दमय वाक्य उद्धृत हो गये और तभी से पीड़ा के उद्वेग को ही कविता का कारण माना गया। पर संभवतः पीड़ा का ही नहीं किसी भी भाव का उद्वेग कविता के रूप में प्रस्फुटित हो जाता है।

मैं एक साधारण सी नारी-कभी नहीं सोचा था कि कभी किसी कविता की रचना कर पाऊँगी-किन्तु जब मेरी बेटी पहली बार माँ बनी तब हर्षातिरेक से भावनाओं का सैलाब ऐसा उमड़ा कि अनायास ही मन में कुछ हलचल सी समा गई।
और तब से लेकर अब तक, अपने परिवार के हर सदस्य के जन्मदिन पर, विवाह की वर्षगांठ पर या और किसी विशेष अवसर पर, मैंने उन्हें आशीर्वाद या शुभकामना के रूप में कविता का उपहार ही दिया है।
मैंने तो सोचा भी नहीं था कि मेरे इन आशीर्वचनों को मेरे बच्चे इतने दिनों तक संभालकर रखेंगे। मेरे बेटे ने उन सबको एकत्र करके एक पुस्तक का रूप देने का निर्णय लिया और उसके प्रयास का ही परिणाम है-‘आशीषों के नीड़ से’।
……………………………………………………………………………………………………………ऊषा गुप्ता

वर्तमान में मैंने देखा कि इस इलेक्ट्रॉनिक इंटरनेट के युग में शुभकामना कार्ड का चलन खत्म होता जा रहा है। लोग मात्र वाट्सएप या फेसबुक पर ही शुभकामना देकर इतिश्री कर लेते हैं। साथ ही साथ अब गद्य एवं पद्य दोनों तरह का साहित्य, समाज एवं बाजार से विलुप्त होता जा रहा है। ऐसे युग में माँ का सबको शुभावसर कार्ड देना एवं उसमें शुभकामना की चार पंक्तियाँ लिख कर देना, वास्तव में उनकी विलक्षण प्रतिभा और सकारात्मक सोच का प्रमाण है।
आशीषों के नीड़ से’, उनके द्वारा विगत 30 वर्षों के दौरान दियेे हुए इन्हीं शुभाशीषों का संकलन है।
……………………………………………………………………………………………………………अमित गुप्ता

‘तुम सृष्टि की सुन्दरतम रचना, ईश्वर का अनुपम उपहार हो तुम
हम पाकर तुम को धन्य हुये, सत्कर्मों का परिणाम हो तुम।’

‘अनुशासन ही मूलमंत्र है जीवन में सुख पाने का,
अनुशासन ही राह खोलता उन्नति और सुमेधा का।।’

आशाओं का व्योम बना है, पाखी मन उसमें उड़ता है
आसमान से तोडूँ तारे, साहस से वह दम भरता है
बना रहे यह ज़ज्बा यूं ही, मन आशीष तुम्हें देता है।

व्योम निहारा धरती निरखी, पर्वत देखे नदियाँ परखी,
जिधर-जिधर भी दृष्टि गई बस, मैंने छवि तुम्हारी देखी।

सृष्टि हँसने लगी, आँखों में खिला अनुराग,
एक से जब दो हुये तुम, प्रकृति ने सुनाया फाग।
यूँ ही रहो तुम सदा उल्लसित, छोड़ों सभी विराग,

ताज़े गुलाब सा महको तुम इस कामना की रात
है तुम्हें आशीष दोनों सदा रहो तुम साथ।

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