इरफ़ान हबीब के विचार इतहास को बदलने पर और फासीवाद

Posted by Krishna Singh
December 30, 2017

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“जब एक विचारधारा जनता के एक हिस्से को जकड़ती है तो वह एक भौतिक शक्ति की तरह काम करती है।” सही कहा है इरफान हबीब ने, लेकिन यह कल्पना फासीवाद का आधार है, जो एक सामाजिक आन्दोलन है, एक प्रतिक्रियावादी और जन विरोधी आन्दोलन। यह मज़दूर वर्ग और किसानों को लूटने के लिए एक पूंजीवादी तिकड़म है, पूंजीवाद में गिरते मुनाफे की दर को कृत्रिम लेकिन बलपूर्वक बढ़ाए रखने के लिए, बाज़ार के नियमों से परे।

इस सामाजिक आन्दोलन का आधार अरबों-खरबों का निवेश, बड़े औद्योगिक घरानों और वित्तीय संसथानों के मीडिया, देशी-विदेशी थिंक टैंक, इवेंट मैनेजमेंट कंपनी, बुर्जुआ प्रजातंत्र के खम्भों में फासीवाद का प्रवेश, धर्म और देश का काल्पनिक सुनहरा इतिहास और संस्कृति का ख्वाब, अल्पसंख्यकों से काल्पनिक भय पैदा करना आदि है।
सही आंकलन है इतिहासकार इरफ़ान हबीब का, लेकिन इस फासीवाद का विरोध कैसे करें? याद रखें कि फासीवाद पूंजीवाद का ही एक रूप है, जैसे एकाधिकार पूंजीवाद, स्टेट कैपिटलिज्म, क्रोनी कैपिटलिस्म, डेमोक्रेटिक सोशालिस्म, कॉन्शस कैपिटलिस्म, आदि. पर फासीवाद गुणात्मक रूप से पूंजीवाद या इसके भिन्न रूपों से अलग है. यह पूंजीवाद का निकृष्टतम रूप है, जहाँ बुर्जुआ प्रजातंत्र का मुखौटा उतार दिया जाता है और बुर्जुआ तानाशाही सामने आता है मिहनतकाश जनता को लुटने और उसके हर प्रतिरोध को निर्ममता पूर्वक दमन करने के लिए.
इसके इस काम में राज्य की हर इकाई, सरकार, पुलिस, प्रशाषण, न्यायलय, चुनाव आयोग, ऑडिट संस्थान, आदि बड़े पूंजीपतियों के लिए सीधे सीधे काम करते है. सत्ता में आते ही भाजपा सरकार ने कानून बदल कर अम्बानी के ऊपर एफआईआर को निरस्त्र किया, दर्जनों श्रम कानून को ख़त्म किया ताकि बड़े पूंजीपति अपने हर काम को बेरोकटोक कर सकें, जमीन हड़पने के कानून बनाये, पर्यावरण कानून की धज्जियाँ उडा दी, नोट बंदी, जीएसटी लाया, अब बेल इन की बारी है. याद रहे, यह सब कराने की मंशा आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक का भी था और कौंग्रेस की सरकार इस ओर अग्रसर भी थी, 1992 के बाद के तथाकथित “सुधार” इसी दिशा की कार्यवाई थी!
तो इस खुनी, राक्षसी फासीवाद का सफलतापूर्वक विरोध कैसे करें? बुर्जुआ तरीके से, यानि चुनाव द्वारा, जुलुस निकाल कर, सर्व धर्म सम्मलेन कर, इसके खिलाफ व्यक्तव्य देकर, रैली में भाषण देकर, बड़े पुन्जीपतितों से गिड़गीड़ाकर?
जी नहीं, बल्कि बिलकुल नहीं! रास्ता एक ही है. जो वर्ग पीड़ित था पूंजीवाद से और अब अति पीड़ित है फासीवाद से, वही आगे आये, एकताबद्ध हो वर्गीय आधार पर, संघर्ष करे और क्रन्तिकारी संघर्ष और आन्दोलन के द्वारा इस दानव को हराकर समाजवाद की स्थापना करे.
यानि फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई का अंत इसकी अम्मा के हराने में होगा, निजी पूंजी के जगह समाजिक धन की स्थापना करनी होगी, उत्पादन के साथ साथ वितरण भी मेहनतकाश अवाम के हाथ में होगा, उस आधार को ही ध्वस्त करना होगा, जो एक इन्सान को यह अधिकार और हथियार देता है की वह दुसरे इंसान को मजदूर या नौकर रखे और उसके श्रम को खुद हस्तगत करे, बेशी मूल्य का उत्पादन ही ख़त्म हो, यानि एक वर्ग विहीन समाज की स्थापना हो!
हाँ, इस संघर्ष में मजदूर वर्ग के साथ समाज के अन्य पीड़ित हिसा भी साथ आयेगा, जो जाति, धर्म आदि के कारन सताए और शोषित किये जाते रहे हैं. इस “महा युद्ध” में वैसे सभी पार्टी का होना लाजिमी है, जो प्रगतिशील हैं और जो मजदूर वर्ग के मुक्ति के लिए वर्ग संघर्ष के लिए तैयार हैं!
और यह भी समझाना आवश्यक है की क्रांति के लिए एक क्रन्तिकारी विचारधारा आवश्यक है और इस क्रांति को नेत्रित्व देने के लिए एक क्रन्तिकारी पार्टी!
इंकलाब जिंदाबाद! मजदूर एकता जिंदाबाद!
http://thewirehindi.com/30001/history-of-india-can-not-be-changed-says-historian-irfan-habib/

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