ईम्तिहान

Posted by Habib Manzer
December 10, 2017

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ना जाने इम्तिहाने कयो हमारी जान लेती है
लिखावत से हमारे फन को भी पहचान लेती है

समझदारी बिना इस ईल्म का है फायदा बोलो
मेरी खामोशी मे हालत मेरी पहचान लेती है

बूराई किस तरह बढ़ती रही अब मूल्क मे मेरे
अगर सच बोलना चाहो तो तेरी जान लेती है

शराफत ईल्म से हासिल सुकुन दिलमे तेरी चाहत
दिखावा हो मूहब्बत जब जहाँ पहचान लेती है

मूझे लिखने की चाहत है सनम तेरे मूहब्बत मे
मूहब्त देखकर दुनिया भी दिलको थाम लेती है

सज़ा देती है हमको लड्डुओ की शक्ल मे ऐसे
ज़हालत को विरासत भी हमारा मान लेती है।

हबीब मंज़र

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