उच्च शिक्षण संसथान या डिग्री की दुकान

Posted by NooruDdin Khan
December 13, 2017

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देश में बेशक सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों की कमी है परंतु निजी क्षेत्र के उच्च शिक्षण संस्थानों की कोई कमी नहीं है। हम कह सकते हैं की निजी क्षेत्र में उच्च शिक्षण संस्थानों की बाढ़ आ गयी है। न जाने इन शिक्षण संस्थानों में से कितनो के मालिकों का उद्देश्य लोगों तक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराकर स्वावलंबी बनाना है और कितनो के मालिको का उद्देश्य सिर्फ धन अर्जित करना और खुद का रसूख कायम करना है। कहने के लिए तो देश में उच्च शिक्षण संस्थानों की कमी नहीं है लेकिन सच्चाई तो ये है की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने वाले शिक्षण संसथान न के बराबर हैं। जो संसथान सिर्फ और सिर्फ धन अर्जित करने और रसूख कायम करने के लिए खोले गए हों उसके बारे में आप कैसे कल्पना कर सकते हैं की वो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए कार्य करेंगे। आज इन तथाकथित उच्च शिक्षण संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करने वाले डिग्रीधारकों की कोई कमी नहीं है। इन डिग्रीधारकों के पास ज़रूरी व्यवहारिक ज्ञान न होने के कारण परेशान होना पड़ता है जिसकी वजह से देश और समाज का भी बहुत बड़ा नुकसान होता है। इसीलिए ऐसे संस्थानों को हम उच्च शिक्षण संसथान नहीं बल्कि डिग्री की दुकान कहना ही मुनासिब समझते हैं। यही कारण है की आज की तारिख में आप की डिग्री से अधिक महत्वपूर्ण ये होता है की आपने डिग्री कहाँ से प्राप्त की है। ये शिक्षण संसथान इंफ्रास्ट्रक्चर से लगायत अध्यापकों की योग्यता तक हर जगह नियमो की धज्जियां उड़ाते हैं और सरकारी एजेंसिया मूक दर्शक बनी रहती हैं, इसलिए इन सरकारी एजेंसियों के कार्यप्रणाली पर भी गहरा संदेह होता है। ऐसे भी शिक्षण संसथान हैं जिनका प्रमुख उद्देश्य डिग्री बाटना होता है शिक्षा से उनका कोई खास वास्ता नहीं होता है। अब ऐसे संस्थानों को डिग्री की दुकान न कहा जाए तो क्या कहा जाए। इन्ही शिक्षण संस्थानों की वजह से उपयोगी शिक्षा भी गुणवत्ता न होने की वजह से अनुपयोगी हो जाती है। इन उच्च शिक्षण संस्थानों के संसाधनों और अध्यापकों के योग्यता में इतने बड़े स्तर पर भिन्नता जितना की आज पायी जाती है किसी भी तरह छात्रों और समाज के हित में नहीं है। इन शिक्षण संस्थानों के संसाधनों के भिन्नता को समाप्त तो नहीं किया जा सकता है परन्तु इस भिन्नता को कम ज़रूर किया जा सकता है। आज ज़रूरत इस बात की है की इस भिन्नता को कम से कम करने की कोशिश की जाये। जिनके पास जितने संसाधन हों उन्हें उसी हिसाब कोर्स की अनुमति प्रदान की जाये ,नहीं तो गुणवत्ताहीन शिक्षा लेने के बाद अक्सर छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
हमें सिर्फ डिग्रीधारक नहीं बल्कि ज्ञानधारक चाहिए।

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