उम्मीदे अभी जिंदा है ।

Posted by Mehboob Ali
December 29, 2017

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मेरा पालन पोषण बहूत ही उदार माहौल मे हूआ है । जिस गाँव मे मेरा जन्म हूआ और जहाँ मै पला बढा , उस गाँव मे मुस्लिमो के एक या दो ही घर थे । अब शायद वही परिवार अलग अलग हो कर दस के पास हो गये होंगे ।

इस बात का सबसे अच्छा फायदा ये मिला कि मैं आराम से सबके साथ अपनी पढाई कर सका और आज नौकरी भी कर रहा हू । इससे भी अच्छा प्रभाव ये पडा कि मेरे ऊपर धार्मिकता का कोई असर नही पडा । कभी भी मेरे को रती भर भी ये अहसास नही हुआ कि दिपावली नही मनानी है या होली नही खेलनी है या मंदिर नही जाना है । दिवाली आज भी मेरा प्रिय त्यौंहार है । होली पर दोस्तो के साथ खूब रंग खेलता हू । अक्सर दोस्तो के साथ मंदिरो मे भी जाता हू । तो ये भावना मेरे दोस्तो मे भी नही है , वो भी ईद पर खूब मस्ती करते है । मैं उनके लिये पार्टी का आयोजन करता हू । हमेशा ही मेरी दिवाली की रात किसी दोस्त के घर ही मस्ती मे निकलती है ।

जहाँ तक मैं मानता हू “साम्प्रदायिकता या धार्मिक दंगे” कम या जाता हर वक्त मौजूद रहे । राजनिति केवल सता हथियाने के लिये या धूर्वीकरण के लिये , समय समय पर धर्म का कार्ड खेलती रही है । आज “साम्प्रदायिकता”का जो रूप देख रहे है , उसमे आग मे घी का काम “सोशल मिडिया” ने सबसे ज्यादा किया है । किसी एक दो या दस बीस घटनाओ के लिये हम पूरे समूदाय को दोषी नही ठहरा सकते है । हाँ, आज धर्म की राजनिति को हवा देने के कारण समाज मे अविश्वास पैदा हूआ है । पर  भारत का इतिहास भरा पडा है जो ये साबित करता है कि इस पावन धरा पर पता नही कितने ही धूरधंर आये और उन्होने देश को तोडने का भरपूर प्रयास किया , पर वो इस देश के स्वभाव व फिजां को बदल नही पाये । हाँ ,कुछ समय के लिये माहौल को विचलित जरूर किया ।

जितने भी देश इस दूनिया मे , जो धार्मिक आधार पर बने है या धर्म को महत्व देते है । आज वो लगभग गृह यूद्ध के शिकार है और बर्बादी के कगार पर पहूंच चूके है । अन्य विकसित देश जो आज आगे है , वो कही न कही इतिहास से सीख ले चूके है । हालांकि धर्म भेद या रंगभेद या नस्लभेद इन देशों मे भी है , लेकिन वहाँ इन मूद्दो पर राजनिति को हावी नही होने दिया जाता है । और तूंरत कार्यवाही भी हो जाती है ।

पते कि बात ये ही है कि आम जनता राजनिति के बहकावे मे न आये । सच व गलत की पडताल करे । राजनिति के चक्कर मे कानून हाथ मे न ले क्योंकि ये निश्चित है कि धर्मांधता का शिकार हमेशा ही कोई न कोई निर्दोष ही होगा , चाहे वो किसी भी समूदाय का हो । हमारे लिये दम भरने वाले हमेशा ही सूरक्षित निकल जाते है ।

मैं डरा नही हू । बस चिंतित इस बात से ही हू कि मेरे देश व समाज का खूबसूरत माहौल बिगड न जाये ।

 

अंत मे यही कहूंगा ” एक बाग तभी सुंदर लगता है , जब उसमे अलग अलग रंग के फूल होते है । ”

धर्म की आड मे केवल सता हासिल की जा सकती है ,विकास नही , एक खूबसूरत व स्वच्छ समाज नही ।

 

मेरी उम्मीदे अब भी कायम है ।

 

नववर्ष की शुभकामनाऐ ।

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