कहानी -किनारों के इर्द गिर्द

Posted by Harish Sharma
December 29, 2017

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किनारों के इर्दगिर्द

राजेश कमरे से बाहर निकल कर घर के लॉन में पड़ी कुर्सी पर आकर बैठ गया । सुबह का वक्त था । अखबार वाला अखबार दे गया  । पिताजी ने घर के पोर्च में पड़ा अखबार उठाया ही था कि अखबार से एक इश्तेहार निकलकर बाहर गिर पड़ा ।  पिताजी ने उसे उठा लिया।

यह एक अंग्रेजी स्कूल का विज्ञापन था जिसमें कुछ अध्यापकों के रिक्त पदों के लिए आवेदन की मांग की गई थी । राजेश जब सोकर उठा था और पिताजी के साथ बैठ कर चाय की पहली चुस्की  ली ही थी कि पिताजी जी ने  वह इशतेहार राजेश की तरह बढ़ा दिया ,और बोले ।

“यह शहर के स्कूल में अध्यापकों की मांग की गयी है । बहू से पूछ लो अगर किसी पद के लिए योग्यता रखती हो ।”

“जी पिताजी “।

राजेश में बिना कोई प्रतिक्रिया किए इश्तेहार ले लिया और पढ़ने लगा । वेतन अच्छा दे रहे थे स्कूल वाले । एक सरकारी क्लर्क के बेसिक वेतन के बराबर लगभग पन्द्रह हजार और इस रकम के साथ में एक जोड़ का निशान लगा था । शायद कुछ और भत्ते वगैरह भी दे रहे हो ।

फिर ना जाने कुछ सोचते होते हुए उसने वे विज्ञापन पास पड़े मेज पर रख दिया । और शहर के अन्य समाचार चाय पीते हुए पढ़ने का अभिनय करने लगा ।

उसके दिमाग में कुछ बातें कौंधने सी लगी ।

“मां को मरे आज तीन साल हो गए हैं । इन तीनों सालों में क्या कुछ नहीं बदल गया । मेरा बेटा अभी पांच  साल का हुआ है । स्कूल जाता है । सुबह उठते ही सबसे पहले उसे स्कूल भेजने की तैयारी शुरू हो जाती है । यह प्राइवेट स्कूल वाले न जाने क्यों इतनी सुबह स्कूल वैन भेज देते हैं । लगभग वही समय उसके दफ्तर जाने का होता है । बेटे को नहला धुलकर  स्कूल के लिए तैयार करना उसका काम है ।  निशि किचन संभालती है । बेटे और उसके लिए ब्रेकफास्ट तैयार करना और उसके लंच को टिफन में पैक करना । यह सुबह की बड़ी व्यस्तता  होती है । कई बार बेटे की यूनिफार्म या स्कूल से भेजे गए दिशा निर्देशों के अनुसार स्पेशल ब्रेकफास्ट तैयार करना या किसी विशेष रंग की ड्रेस पहना कर बेटे को स्कूल भेजना भी इस व्यस्तता में शामिल हो जाता है । पिताजी भी सुबह जल्द नहा-धोकर पूजा पाठ कर लेते हैं ,और अपनी आयुर्वेदिक दवाइयों का सेवन करते हुए कई बार खाने के लिए दलिया या बेसन की रोटी की मांग  करते हैं ।

मतलब के सुबह का पूरा समय परिवार के खान पान के प्रति समर्पित हो जाता है । राजेश के दफ्तर चले जाने के बाद निशि जैसे थोड़ा चैन की सांस लेती है । अब पिताजी के खान पान की तैयारी करेगी । जब तक उनका पूजा-पाठ समाप्त होगा तब तक वो रसोई का काम निपटा ही लेगी । फिर साफ-सफाई और नहाना धोना । उसे रोज लगभग ग्यारह तो बज ही जाते हैं ,क्योंकि जिस दिन छुट्टी होती है मतलब स्कूल और दफ्तर में ,घर का काम वैसे ही चलता रहता हैं । बस इतना रहता है कि बेटे और राजेश के खाने का समय रोजाना के समय से लगभग एक घंटा लेट हो जाता है । यही हाल दोपहर  का है । इधर निशि अपना काम निपटा कर  जरा अपनी पीठ सीधी करने के लिए लेटने लगती है कि बेटे की वैन  का हार्न बजता है । बारह बजे वह घर आ जाता है फिर उसके कपड़े बदल उसे थोड़ा बहुत खाते पिलाते घड़ी पर जब उसकी नजर पड़ती है तो लगभग एक बज चुका होता है । दोपहर के लंच का समय ।

पिताजी रिटायर हो चुके हैं और उन्हें मधुमेह है । इसलिए भूख भी ज्यादा लगती है । सुबह की बनी सब्जी वे नहीं खाएंगे । दोपहर में याँ तो प्याज टमाटर की चटनी हो या रसेदार सब्जी । कई बार जब निशि तक हारकर पिता जी से पूछ लेती है ,वह लंच में क्या खाएंगे तो वे  अपनी आदत के अनुसार सीधा जवाब न दे कर कहेंगें ।

क्या खाया जा सकता है ।”

कई बार निशि खींझकर या अपने मन मुताबिक कुछ बना देगी तो या तो एक आध रोटी खा कर उठ जाएंगे या फिर कुछ और बनाने का फरमान जारी कर देंगे ।

इतना था कि निशि कभी उनके सामने प्रत्युत्तर नहीं देती या बहस नहीं करती वह चुपचाप सह जाती है । मां के मरने के एक साल बाद ही पिताजी ने दूसरी शादी करने के लिए अखबार में विज्ञापन देना शुरु कर दिया था । जब घर में इस बात की उन्होंने घोषणा की तो तूफान सा उठ खड़ा हुआ। साठ की उमर हो चुकी थी उनकी । कम से कम अपना नहीं तो अपने बच्चों और उनकी इज्जत का ख्याल तो कर ही लेते । और फिर जो नया अजनबी घर में लाएंगे वह जाने कैसा हो । पारिवारिक मामलों के इस अंतर्कलह में सारे परिवार की मानसिक शांति भंग हो गई थी ।

निशि ने  नौकरी करने की अपनी सारी इच्छा को त्याग दिया था । वह परिवार को टूटने से बचाना चाहती थी । अपने पति का साथ देकर उसे पारिवारिक संबल देना चाहती थी ।

राजेश ने बचपन से मां को घर के चौके चूल्हे में पिस्ते हुए देखा था । संयुक्त परिवार और दादी के साथ साथ पिता के खाने पीने के नखरो को  वह अपनी एक सारी जिंदगी झेलती रही । उसे कभी प्रशंसा के दो शब्द सुनने को न मिले । जाने दादी को दोनों के बीच मन मुटाव बनाये रखने में ही सुख मिलता था ।

जब पिताजी अपने भाइयों से अलग रहने लगे तब भी उनकी वह पुरुष वर्चस्व वाली इमेज बनी रही । अलमारी से कपड़े निकाल कर देना ,जूते पॉलिश करना या सब्जी भाजी खरीदना जैसे जो काम  पिताजी स्वयं भी कर सकते थे या कम से कम सहयोग दे सकते थे उन्होंने कभी कोई सहारा नहीं दिया । चाय पीकर खाना खाकर अपने बर्तन को भी खुद रसोई में रखना उनके लिए पुरुष वर्चस्व की बेइज्जती थी । मां दोपहर तक घर का काम करती फिर कुछ खाना खाती । शायद उसके इस अथक काम और अपने शरीर के दोहन ने उसे मानसिक और शारीरिक रुप से बीमार कर दिया था । वो  जल्दी ही गठिया की मरीज हो गई ।

उसके स्वभाव में कई परिवर्तन आ गए थे । अब वह जरा जरा सी बात पर भड़क जाती ,लड़ पड़ती और पिताजी के हाथों खूब पिटती । राजेश ने अपने बड़े होने तक यह सब देखा था पर एक दिन माँ की तरफ पिता के उठे हाथ को रोक कर झटक दिया । पिता जी ने उसे क्रोध से देखा पर उसकी आंखों को देखा तो शांत हो गए ।

अब उन्होंने रूठने या मौन धारण करने का नया हथियार प्रयोग किया । वे किसी बात का कोई सीधा जवाब नहीं देते थे । माँ के लिए इस स्तिथि को शन करना भी बहुत कठिन था ।

इस गढ़ कलह से तंग आकर और पिता के उलाहने सुन राजेश ने अपनी उच्च शिक्षा के दौरान ही एक प्राइवेट नौकरी कर ली । मां को गठिया हो गया था जिस कारण उसे दर्द निवारक दवा लेने की आदत पद गयी । और इन दवाओं ने ही शायद  उसे कैंसर का मरीज बना कर छोड़ा । जीवन के वह वर्ष जब कुछ सुख भोगने की अवस्था ने आरंभ होना था , वह संसार को अलविदा कह कर चल दी थी । मरते समय भी उसे एक ही बात का संशय था और वो राजेश  से कहती ”

बेटा तेरे पिताजी का स्वभाव ऐसा ही रहेगा ,बस तू इनका ख्याल रखना कभी नाराज मत होना । ”

यही बात राजेश निशी को विवाह के पांच सालों में समझाने में सफल रहा था । उसने केवल इतना किया कि निशि के साथ घर से कामकाज में सहयोग देना शुरु कर दिया । कपड़े प्रेस वो बाहर से करवा लेता । बेटे को नहलाने धुलाने और कपड़े पहनाने में उसकी मदद कर देता । यहां तक कि किचन में भी बड़ी खुशी से उसके साथ काम करता ।

उसके अवचेतन में अपनी मां के साथ हुए व्यवहार की टीस हमेशा बनी रहती जिस कारण वह पत्नी के साथ सहयोग करने में कोई हिचक महसूस ना करता ।

पिताजी की आंखें उसे यह सब करते हुए देखती तो है थोड़ा सकुचाता । उसके पिता की वह व्यंग और उपहास से भरी आंखें विचलित करती पर वह काम करता रहता ।

कई बार उसने अपने लिए पिता से कुछ विशेषण भी पाए ,” देखो जी असल में यह लड़का अपने बेटे की मां है लोगों के बच्चे सोकर  उठते हैं तो मां को पुकारते हैं पर हमारे घर में पापा-पापा चिल्लाते हैं ।”

कई बार जब कभी पिता के पास बैठता तो वो उसे समझाते कम भड़काते ज्यादा । कहीं ना कहीं उन्हें  अपने पुत्र के इस पत्नी भक्त रूप को सहन करना मुश्किल हो रहा था  । शायद उनके पुरुष वर्चस्व के अहम को चोट पहुंच रही थी ,पर राजेश को ना जाने क्यों मरी हुई मां की याद पत्नी को देखकर ही आती । कई बार उसे लगता कि पत्नी की शक्ल मां की शक्ल जैसी हो गई है । कई बार वह अपनी सारी व्यस्तता से परेशान होकर भड़क भी जाता था । पिता के व्यंग बाण उसे भड़काते तो वह निशि से केवल मौखिक झगड़ा कर बैठता पर थोड़ी देर बाद उसे महसूस होता कि वह यह कर क्या रहा था । उसे अपने कहे गए शब्दों के प्रति क्षोभ होता । रिश्तेदार पूछते ,”मां कभी सपने में आती है ?…क्या कहती है ? ”

पर वह हैरान था कि मां के मरने के बाद लगभग तीन साल तक उसे तीन बार भी नही दिखी  ।

कभी दिखी तो बस मौन बैठी हुई ।

उसने कभी उसे कुछ नहीं कहा । उसने कहीं पढ़ा था कि सपने हमें उन लोगों के ज्यादा आते हैं जिनके बारे में हम ज्यादा सोचते हैं  । हां उसे पिता पत्नी और बेटे के सपने आते थे कभी कभार  । जिनमें वह अक्सर उनसे झगड़ा करता ही दिखता । मां की नामुराद बीमारी की याद उसे अवश्य बार-बार परेशान करती रहती । शायद इसीलिए वह परिवार के प्रति ज्यादा डिफेंसिव हो गया था पिता के शब्दों में कहें तो ‘घर का नौकर ‘हो गया था ।

अखबार में आए विज्ञापन को लेकर वे पत्नी के पास जाये ना जाए ,क्या कहे न कहे ।  इन सब बातों के उत्तर का पूर्व आभास उसे पहले से ही हो रहा था । निशि पढ़ी-लिखी थी और उसके मन में यह टीस रहती के वह नौकरी शुदा नहीं है ….पर घर के कामों की व्यस्तता और ससुर के स्वभाव के प्रति उसका डर अब उसे घर तक ही सीमित रहने के लिए विवश कर चुका था ।

अभी दो दिन पहले छुट्टी वाले दिन राजेश उसे और बेटे को शहर के नए बने पार्क में ले गया । घर के रूटीन से कुछ देर के लिए निजात और बदलाव देने के लिए । राजेश के दफ्तर के कई साथी भी वहां उसे मिले । उनमें से कईयों की पत्नियां भी उनके साथ थी । अधिकतर नौकरीशुदा । खुश, चुस्त दुरुस्त,स्पोर्ट्स शूज पहने । तला भुना खा पीकर अपने बड़े हुए वजन और कूल्हों को  व्यवस्थित करने के लिए तेज-तेज पार्क में चक्कर लगा रही थी । राजेश ने अपने मित्रों के साथ अपनी पत्नी का परिचय करवाया और उनकी पत्नियों से उसे मिलवाया । निशि को उसने अपने साथ पार्क में चक्कर काटने के लिए कहा तो वह बोली ,

“आप चक्कर लगा लीजिए और अपने मित्रों से मिल लीजिए । मैं यहां हरी घास पर बेटे को लेकर बैठी हूं ।”

राजेश ने उसे ज्यादा विवश नहीं किया और अपने एक मित्र के साथ पार्क में चक्कर काटने लगा । उसकी निगाह और दिमाग पत्नी पर  ही केंद्रित रहा ।

” निशि यहां इन नौकरी शुदा पत्नियों के बीच  अपनी हाउसवाइफ की इमेज को लेकर जैसे घबरा सी गयी है । ….उसे ना जाने क्यों अपना अस्तित्व उनके सामने उसे कम लग रहा है । ”

मित्रों ने अपनी पत्नी का परिचय करवाते हुए उनके विभाग और कामकाज की बात की राजेश ने सकुचाते हुए अपनी पत्नी का परिचय दिया । जब इसने ‘ हाउसवाइफ ‘ कहते हुए अपनी पत्नी की ओर देखा था । निशि की आँखे बड़ी शिद्दत से इन नौकरी शुदा  औरतो और उनके उन्मुक्त विचरण के भाव भाव को देख रही थी ।

राजेश ने उस चाहत को अपने भीतर महसूस किया  था जो उसकी पत्नी के चेहरे पर बड़े आराम से पढ़ी जा सकती थी ।

जब वह दो चक्कर लगाकर निशि के पास आकर बैठा तो वह खुद ही कहने लगी ,”देखो इन स्त्रियों की आजादी ,अच्छा कमाती हैं और यहां रोज उन्मुक्त बेफिक्र विचरण करती है । ”

राजेश ने उसकी मनोदशा को समझते हुए उसके विचार का खंडन किया ,” ऐसी बात नहीं है निशी । हर व्यक्ति को दूसरे की थाली में लड्डू बड़ा लगता है । इनकी लाइफ भी कोई आसान नहीं हैं । ये घर भी संभालती हैं और नौकरी भी करती है  । कई दोनों में संतुलन बना पाती हैं और कुछ सब कुछ बिगड़ भी लेती हैं । इनके हँसते चेहरे पर मत जाओ ।   अगर मां आज जीवित होती तो शायद तुम्हें भी ये  आजादी महसूस होती पर फिर भी हम जैसे हैं ठीक है । संपूर्ण संसार में है कौन”?

निशि ने राजेश की बात का कोई उत्तर नहीं दिया । बस वह आस-पास हिरनी चाल चलती और रमणियों को देखती रही ।

इस से पहले कि उस पर और उदासी छा जाए राजेश ने उसे वहां से ले जाना बेहतर समझा और बाजार का चक्कर लगाकर उसकी उदासी के बावजूद उसे आइसक्रीम खिला कर खुश करना छह ।

आज सुबह जब पिताजी ने उसके हाथ में वो  प्राइवेट स्कूल वाला विज्ञापन दिया तो एक बार फिर वह उहापोह में उलझा बाहर लॉन में आकर बैठ गया था । ऊपर आकाश की तरफ देखने लगा । खुला आकाश जैसे कोई सुकून दे रहा था । उसका मन किया वह इसी तरह खुले आकाश को देखता रहे या जोर से चीखे । उसके अंदर का शोर ही था जो उसे लगातार परेशान कर रहा था । वह सारा शोर खुले आकाश को तरफ बिखेर देना चाहता था ।

तभी निशि लॉन में आई । छुट्टी का दिन था ।  इसलिए उसे थोड़ी बहुत फुर्सत मिल गई थी । वास्तव में विज्ञापन वाली बात उसने रसोई में खड़े खड़े सुन ली थी और चाहती थी राजेश कुछ कहे । राजेश ने स्वयं को बहुत रोका अपने दिमाग से विज्ञापन वाली बात निकालनी चाही । फिर उठकर लॉन से बेकार घास को खुरपी से खोदने लगा । उसकी पीठ निशि की तरफ थी और उसे लगा जैसे निशि की आंखें उसकी पीठ में गड़ी जा रही है । बड़ी शोर भरी चुप्पी उनके बीच पसरी थी ।

“वह कुछ कहना चाहती है यह भी हो सकता है कि इस दो कमरों के मकान में अपनी बात को खुलकर कहने के लिए हिम्मत जुटा रही हो । ” उसने घास खोदते हुए सोचा ।

पिताजी नहाने के लिए जा चुके थे । पानी के नल का शोर बाथरुम से आ रहा था ।

एकदम राजेश बोला ,”शहर के नंबर वन स्कूल का विज्ञापन आया है । सैलरी भी अच्छी है… पिता जी कह रहे थे …..कि अगर तुम अप्लाई करना चाहो तो देख लो….।”

” सैलरी अच्छी है पर काम भी बहुत है ….यहाँ घर के काम भी निपटाओ  और नौकरी भी करो …यह मुझसे ना हो पाएगा । आपको क्या लगता है ?”

निशि ने स्थिति स्पष्ट कर दी ।

“वह बात तो ठीक है…. पर कल तुम पार्क में नौकरी शुदा महिलाओं को देखकर कुढ़ रही थी इसलिए शायद मैंने सोचा कि तुम नौकरी के लिए इच्छुक हो ।” राजेश ने आराम से निशि की ओर बिना देखे कहा ।

“नहीं नहीं …बस मुझे जरुरत नहीं । यहां किसी कामवाली के हाथ का किया धरा किसी से सहन नहीं होगा ।….ना ही मैं अपने दिमाग पर अपना बोझ डालकर बीमार होना चाहती हूं ।” कहते हुए वह किचन में चली गई ।

“क्या वो भाग रही है या निर्णय नहीं ले पा रही कि क्या करना है …..कैसे करना है….. क्या वो अपने घर के माहौल में आज तक खुद कोई एक निर्णय ले पाया है । हमेशा ही उलझा रहा है । उसके घर के प्रश्न एक अनसुलझी पहेली जैसे रहे हैं । वो इसी माहौल में पला बढ़ा है इसलिए शायद जो वो खुद बनना चाहता था शायद नहीं बन पाया। बस जो स्थिति ने उसे बना दिया वह बन गया । ”

राजेश ने सोचते हुए  अपने शरीर को व्ही पड़ी एक आराम कुर्सी पर टिका दिया और खुले आकाश की तरफ मुंह ऊपर करके देखने लगा । घर में हर तरफ एक चुप पसरी थी । बाथरूम का नल भी अब आवाज नहीं कर रहा  था । शायद पिताजी नहा लिए हो ।

बेटा नींद से उठते  ही राजेश की कुर्सी के पीछे खड़ा होकर उसे ‘हप्प ‘कहकर हंसा देता है । राजेश अपने बेटे को गोद में उठाकर  प्यार करता है । निशि किचन की  खिड़की में उन दोनों को देखकर मुस्कुराती है । राजेश ने भी उसे देख लिया और जैसे उसके दिल को कोई सुकून सा मिल गया ।

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