काॅलेज की वो मीठी बातें

Posted by shruti dumpher
December 29, 2017

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मेरा नाम श्रवण है। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय का छात्र हूं। बारहवीं पास कर मैनें इस काॅलेज में दाखिला लिया । मै पहले दिन काॅलेज गया। पहला क्लास मंजू शर्मा मैम ने लिया। पहले उन्होने सभी बच्चों से उनका परिचय पूछा। सभी ने अपना-अपना नाम बताया। मैने भी बताया। उसके बाद मैम ने सभी बच्चों प्रश्न पूछने शुरु किये।

मेरा तो मानो जैसे तबीयत ही खराब हो गया। मै सबसे पीछे बैठा था और कोशिश कर रहा था कि मैम के नजरों मे न आऊं। लेकिन निराशा ही हाथ लगी। मैम ने मुझे खङा किया और संज्ञा की परिभाषा बताने के लिए कहा? मेरे तो हाथ पांव दोनो बुरी तरह कांप रहे थे। धङकने इतनी तेज चल रही थी कि मै बिना आला के ही उस आवाज को सुन सकता था। चुंकि मुझे जवाब पता था लेकिन आज से पहले मै इतने बच्चों के बीच पहली मरतबा खङा हुआ था। इस वजह से मै बोल ही नही पा रहा था। कुछ देर बाद बोला भी तो ऐसा बोला कि बेईज्जती तो पक्का होना ही था। मैम ने बहुत बुरी तरह मेरी इज्जत की धुनाई की। सभी बच्चे मुझ पर हंस रहे थे। मुझे बुरा लगा लेकिन मैने काॅलेज न जाने की सोचने के बजाय मैने ये सोचा कि मै अब मैम के नजरों मे अच्छा कैसे बनूं?

मैं रोज काॅलेज जाने लगा। मैम कुछ लिखवाने की बजाय रोज किताब से एक कहानी या नाटक पढाती और हमें घर से याद करने के लिए कहतीं। आगे के दो बच्चे श्वेता और सरस्वती बहुत साधारण और बुध्दिमान थे। किसी भी कहानी या किसी बात को बङी ही सहजता के साथ कंठस्थ कर लेते। रोज अगले दिन याद करने के लिए दिया हुआ कहानी या नाटक सुना देते। मै बेचारा याद तो कर लेता लेकिन उसके बाद यही सोचता कि आखिर मै मैम और इतने बच्चों के सामने कैसे सुनाउंगा?

तीसरे दिन वो हुआ जो मै नही चाहता था। मुझे मैम ने अपने पास बुलाया और बच्चों के सामने खङा कर कहानी सुनाने को कहा। मन मे सोच रहा था मैम आज इस बच्चे की जान लेकर ही छोङेंगी। जुबान से तेज मन मे वो कहानी चल रही थी, शायद इसलिए शुरू की एक लाइन बोलने के बाद तीसरा लाइन बोल रहा था। मैने मैम से कहा कि मै ये लिखकर दिखा सकता हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि “तुम पढकर ही नही आये हो।” उन्होंने कुछ प्रश्न पूछा जिसका जवाब मैने सही-सही दिया।

ऐसे ही चलता रहा। जो भी छात्र नही सुनाते मैम उसे क्लास से बाहर या उसका नाम लिखवा लेती थीं। मैम के पढाने से एक दिन पहले ही वो कहानी या नाटक पढ लिया करता था। इस कारण मैं आराम से बच जाता। कहानी सिर्फ श्वेता और सरस्वती ही सुनाया करती। मै भी शुरुआय में सिर्फ उनसे ही बात करता लेकिन बहुत कम।

धीरे-धीरे मैम को पता चल गया कि मै पढता हूं। उन्होंने मुझे आगे बैठने के लिए कहा लेकिन मैने इस बात को इग्नोर कर दिया। मै अकेला ऐसा लङका था जो उस हिन्दी के क्लास मे रोज आया करता था। सभी बच्चे भी मुझे शायद अच्छा समझने लगे थे। इसलिए तो उन्होंने मुझे to be continue..

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