कोनें में बसा देश

Posted by Manish Baswala
December 21, 2017

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यह देश का वह हिस्सा है ,जिसके बारे में हम जानना भी नही चाहते ,हमे भारत के हर राज्य की राजधानी का नाम आसानी से याद हो जाएगा पर ,देश के इस हिस्से की राजधानी याद करने में हमे हमेशा से तकलीफ रही है। जी हां में बात कर रहा हूँ ‘उत्तरी-पूर्वी ‘ भारत की । यह देश का वह हिस्सा जिसे हमने सदा से ही उपेक्षा की दृष्टि से देखा है …और उनसे उम्मीद की है  प्रेम की और लगाव की । कई लेखकों ने अपनी -अपनी किताबों में इस हिस्से की भयानक तस्वीर बयां की है, आप पढ़ सकते है अनिल यादव का “वह भी कोई देश है महराज” उनका यह यात्रा वृत्तांत वाकई काबिले तारीफ है पर अपनी इस पुस्तक को उन्होंने पूर्वोत्तर के नकारात्मक पहलूओं को ज़्यादा तवज़्ज़ु दिया है,पर कहते है ना कि सौंदर्य तो दृष्टि में होता है ।इसलिए उनकी दृष्टि इस हिस्से के सौंदर्य पूरित स्वरूप को देख ही नहीं पायी I हां ……सच होगी वह तस्वीर पर आपको तब तक डरने की कोई जरूरत नही है ,जब तक आप सही है ।अगर आप गलत है तो तो आपके घर में भी जूते मारने वालों को कमी नही है ।ठीक ऐसा ही है यहां,यहां के लोग किसी बाहरी (अन्य राज्य) पर आसानी से विश्वास नही करते,जब ये किसी पर विश्वास कर लेते है तो उनके लिए अपनी जान भी दे देते है और विश्वासघात होने पर जान लेने से भी नही चूकते ये लोग । तो सुधार की शुरुआत हमसे होनी चाहिए,क्योकि चरम संस्कृति की दुहाई भी तो हम लोग ही देते है उनको। यहां के लोग आपकी सहायता के लिए तत्पर है बस एक बार मौका तो दीजिए उनको। मुझे याद है ‘पूर्वोत्तर -भारत’यात्रा के दौरान मेरा पहला पड़ाव मेघालय की राजधानी शिलांग था , शिलांग एयर पोर्ट पर उतरने के बाद मेने उन लोगो को देखा पहली बार साक्षात शारीरिक संरचना में वो हमसे थोड़ा पिछड़े है (जैसा कि उत्तर पश्चिम के कुछ लोगों की यह सरासर  गलत धारणा है ) मेहमाननवाज़ी में वो हमसे बहुत आगे है । कितने प्रेम और सत्कार के साथ उन्होंने मुझे एयरपोर्ट तक छोड़ा वो मुझे आज भी याद है । आपकी समस्याएं कब उनकी चिंता बन जाएगी आपको भी पता नही चलेगा ।  यहां अगर आपको अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान नही है तो आपको थोड़ी समस्याओं का सामना कर ओढ सकता है । बाकि आप सुरक्षित है ,हिंदी भाषा उन लोगों को नहीं आती पर हां….. आपके द्वारा हिंदी में संवाद करने पर वो हिंदी बोलने का पूरा-पूरा प्रयास करेंगे ,ओर एक हम है कि कभी उनकी भाषा समझना तो दूर, सुनने का भी प्रयास नहीं करते । ऐसे ही मुझे अपना मेडिकल प्रमाण पत्र बनाने के लिए शिलांग के बड़े हॉस्पिटलमें जाना पड़ा ।समस्या वही की मुझे ना तो पूरी अंग्रेज़ी आती है ,ना मेघालय की स्थानीय भाषा ऐसे में में अपनी बात को पूर्णतया सामने नहीं रख पा रहा था ।और उस दिन अवकाश भी था तो में उस अस्पताल के ‘आपातकालीन कक्ष ‘ में चल गया । वहां भी  मैं अपनी बात को स्पष्ट रूप से नहीं रख पा रहा था,पता नही  क्या उनको सूझी एक नर्स ने मेरे मुँह में थर्मामीटर डाल दिया एक ने मेरे सीने पर ecg के तार जोड़ दिए । में उनकी बात को नही समझ पारहा था ,पर उन सभी डॉक्टर और नर्स के चेहरे की सिकन देखकर मुझे इतना तो अनुभव हो गया कि वो बहुत डर गए है । शायद उनको लगा था कि मेरी तबियत बहुत खराब है । मेने उसी वक्त उन सब को छोड़कर चला आया और वो मुझे एक गहन आश्चर्य की तरह देखते रहे….मुझे हसीं आरही थी कैसे लोग है ये । आज में याद करता हूँ उस घटना को तो सामने आता है गोरखपुर का वह अस्पताल जहा इलाज के अभाव में बच्चे अर गए,उड़ीसा के वो परिवार जो एम्बुलेंस के अभाव में लाश को कंधे ढो रहे थे ।

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