क्या ऐसी घटनाएं हमें राक्षस नहीं बना रही हैं ?

Posted by Prashant Tiwari
December 8, 2017

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मौत कोई दुर्लभ चीज़ नहीं है, उसे एक सार्वभौम सत्य की तरह मन जाता है। पहले ज़्यादातर लोगों की मौत होती थी लेकिन अब तो लगता है कि ज़्यादा लोगों की मौत होती नहीं बल्कि उन्हें मौत के घाट उतारा जाता है। उनकी मौत किसी प्राकृतिक कारण किसी रोग से नहीं बल्कि इंसानी वहशीपन से होती है जिसे इस बात का गर्व भी होता है कि मैंने फलां को मार दिया।

यह बात कल्पना में ही कितनी भयानक लगती है कि एक दिमाग और दिल वाला इंसान (मैं ऐसा मानकर चल रहा हूँ कि उसके पास शायद दिमाग और दिल हो) किसी दूसरे दिमाग और दिल वाले इंसान को, जो लगभग उसी की तरह दिखता है; मार सकता है। कोई इंसान किसी को ज़िंदा काटता है उसे जलाता है लेकिन ऐसा करती एक बार भी उसकी रूह नहीं कांपती ना ही हाथ रुकते हैं। उसकी आंख में तनिक भी सील नहीं। इतना करके भी उसका जी नहीं भरता तो सारी दुनिया को दिखाता है कि लो मैंने एक महान काम किया है। उसे इस बात का ज़रा भी दुःख, संकोच नहीं है।

बात यहीं खत्म नहीं होती, इस वहशियाना कृत्य को जायज़ ठहराने वाले और उसे सही मानने वाले लोग भी हमारे आसपास ही रहते हैं। इससे भयानक बात और क्या हो सकती है किसी समाज के लिए कि उसी समाज के एक सदस्य को ज़िंदा जला दिया जाए और सब तमाशा देखें और उसे सही ठहराएं।

खुश हो जाओ, नाच लो की तुम बच गए। मैं भी खुश ही हूँ कि की चलो मैं तो बचा गया मुझे नहीं मारा किसी ने लेकिन याद रहे कि जब हमारे साथ ऐसा होगा तब भी स्थिति यही रहेगी और लोग देखते रहेंगे और उसे सही ठहरा देंगे और उस वक्त हमारे पास कहने-सुनने को कुछ नहीं रह जाएगा।

अगर इस घटना पर किसी को शर्म नहीं आई उसकी रूह नहीं कांपी उसका कलेजा नहीं रोया तो वो समाज में रहे या न रहे कोई फर्क नहीं पड़ता, मरे या जिए। इस तरह से ही रहना है तो इसे इंसानी समाज कहा ही क्यों जाए। संवेदनशीलता मर गई तो तुम भी मर गए, क्योकि हाड़-मांस के टुकड़े चलफिर तो सकते हैं लेकिन महसूस नहीं कर सकते।

आखिर में एक बात और कि जो भी ऐसी घटनाओं को जायज़ ठहरा रहा है वो एक बार ये ज़रूर सोचे कि ऐसी घटना उससे बहुत दूर नहीं हैं। आसपास ही भटक रही है कभी भी आ सकती है। और अगर हम इस बात के लिए तैयार हैं कि अगर हमारे साथ भी ऐसा होता है तो किसी के द्वारा ऐसे सही ठहराने पर हमें बुरा नहीं लगेगा, तो फिर बात ही खत्म हो जाती है।

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