क्यों गुजरात में विपक्ष कांग्रेस की हार को जीत के रूप में देख रही है ?

Posted by Saurabh Baghel
December 20, 2017

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गुजरात चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा ने लगातार छठवीं बार पूर्ण बहुमत से जीत हासिल की है। लेकिन फिर भी ममता बनर्जी ,अखिलेश यादव और राहुल गांधी समेत तमाम  विपक्ष के नेता भाजपा की जीत को जीत ना मानकर उसे नैतिक हार करार देने में लगे हुए है।
 दरअसल गुजरात में प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई के बाद भी, कांग्रेस  जहां  पिछले चुनाव की तुलना में डेढ़ दर्जन ज्यादा सीटें हासिल कर 77 के आंकड़े  तक पहुंच गई । वहीं भाजपा अपने पिछले ढाई दशक के इतिहास में पहली बार  सबसे कम सीट हासिल कर 99 पर ही सिमट गयी।
मोदी लहर में जहां भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में  राज्य कि 26 में से 26 सीट लोकसभा सीट जीती थी । वहीं मात्र 3 साल बाद हुए  विधानसभा चुनावों में उसके 5  वर्तमान मंत्रियों की हार एवं खुद अपने (मोदी के)गृहनगर बड़नगर की ऊझा विधानसभा से भाजपा उम्मीदवार की हार ने मोदी की लोकप्रियता पर सवाल खड़े कर दिए है।
प्रधानमंत्री मोदी ने  2014 में जिस गुजरात मॉडल एवं विकास को मुद्दा बनाकर केंद्र की सत्ता हासिल की थी। उसी  गुजरात में  गुजरात मॉडल को मुद्दा ना बनाकर , मणिशंकर के नीच, गद्दार, मीरजाफर ,जयचंद ,समेत जबरन  पाकिस्तान को  गुजरात लाना और गुजरात अस्मिता जैसे भावनात्मक मुद्दे पर चुनाव लड़ने से उनके “गुजरात मॉडल” पर ही  सवालियॉ निशान खड़े कर दिए है।
गुजरात चुनाव से 3 महीने पहले तक  प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी को कभी अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं माना था वह उन्हें  पप्पू और शहजादे कि छवि  तक ही सीमित रखे थे।  लेकिन इसके विपरीत गुजरात में राहुल गांधी अपनी रैलियों में अच्छी खासी भीड़ जुटाने मे कामयाब रहे और खुद प्रधानमंत्री की सभा में कुर्सी खाली होने की खबरों सामने आयी।
बहरहाल भले ही गुजरात में एक बार फिर भाजपा सरकार बनाने में कामयाब रही है लेकिन जिस प्रकार 22 साल सत्ता में रहकर भी प्रधानमंत्री को चुनाव से पहले 10 दौरे  करके विकास योजना शुरू करनी पड़ी और 37 चुनावी रैलियां करने के बावजूद भी, 3 महीने पहले मैदान में उतरे राहुल गांधी से कड़ा संघर्ष करना पड़ा। उसे विपक्ष मोदी लहर में सेंध और 2019 में स्वयं के एक विकल्प के रूप में देख रहा है।

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