गुजरात के जातिवादी चुनाव के लिए कौन जिम्मेदार?।

Posted by AMANGALAV
December 3, 2017

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नमस्कार, गुजरात वह राज्य जिसके मॉडल को देश के सामने एक विकसित राज्य का चेहरा रख नरेंद्र मोदी जी ने प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी पेश की तथा वह सफल भी हुए!

“गुजरात में चुनावी युद्ध चरम पर है, तथा अब यहाँ  चुनाव में  विकास के मुद्दे पर जातीय समीकरण हावी है, यह कोई नई बात भी नहीं है क्योंकि जनता अन्ततः विकास के कार्यो को भूल, क्षेत्र की आवश्यकता को भूल, उम्मीदवार की योग्यता व सामाजिक छवि को भूलकर वोट करती है, तो सिर्फ स्वयं के स्वार्थों व स्वयं के समुदाय, जाति के लोगों को  सत्ता में लाने के लिए तो फिर राजनीतिक दलों के द्वारा जातिगत धार्मिक राजनीति करना स्वाभाविक है!

 इस जातिवादी चुनाव की चिंगारी निकली हार्दिक पटेल के पाटीदार आंदोलन से, शुरुआत में इस आंदोलन को समर्थन भी मिला क्योंकि देश में जो वर्ग आरक्षण से खुश नहीं था वह इसे नई बहस की उम्मीद के रूप में देख रहे थे, परंतु पटेल द्वारा हिंसा फैलाना सभी को अनुचित लगा जो स्वाभाविक रूप से था भी परंतु इस आंदोलन ने तभी 2017 के विधानसभा चुनाव को जातिगत बना दिया, पाटीदार समाज जो कि भाजपा का बहुत बड़ा वोट बैंक था वहीं अब अपनी पार्टी के विरुद्ध खड़ा हो चुका था, 

जब पाटीदार समाज द्वारा आरक्षण की मांग की गई तो भला और समाज केसे पीछे हटते, वह भी इस दंगल में कूद पड़े और और फिर काम चालू हुआ एक दूसरे को नीचा दिखाने का, इन समाज के नेताओ के द्वारा एक दूसरी जातियों के लिए नफरत फैलाने का काम शुरू किया गया, खुद का हक़ छीनने वाला घोषित किया गया, सब जातियां ख़ुद के हक़ के लिए एक दूसरे के खिलाफ हो गई, और जो इन जातियों के नेता एक दूसरे के खिलाफ थे एक दूसरे की जातियों को गाली देकर अपनी जाति के नेता बने, वह अखिर में राजनीतिक फायदे के लिए एक एक हो गए, और इस सब का फायदा उठाने के लिए विपक्षी दल कांग्रेस इन्हें एक मंच पर अपने साथ ले आया, कांग्रेस जो कि देश की सबसे पुरानी पार्टी है, वह पुन पुरानी राजनीति के हथकंडे के सहारे सत्ता में आने का प्रयास कर रही है और वह वही गलती फिर से दोहरा रही है जो विगत चुनावों में दोहरायीगयीव, जिस दल को सत्तारूढ़ दल को उसकी योजनाओं, नीतियों, रोजगार, विकास के आकड़ों के आधार पर घेरना चाहिए था विरोध करना चाहिए था तथा अपना एक विजन रखना चाहिए था उस ने रूख अपनाया  जातीय जोड़ तोड़ का , जब चुनाव विकास के मुद्दे से उतर जातिगत मुद्दे पर आ गया तो फिर सत्ताधारी दल कहा पीछे रहने वाला था भाजपा ने मौके का फायदा उठा विपक्ष को धार्मिक आधार पर घेरना शुरू कर दिया!

देश के सबसे बड़े राजनीति दलों के द्वारा तीन  युवाओं के द्वारा जनता ऎसी  दकियानूसी अपेक्षा नहीं रखती, परंतु सारा दोष राजनीतिक शक्तियों पर मंडना ही काफी नहीं है इसके लिए हम भी बराबर के जिम्मेदार है क्योंकि समाज में व्यक्तियों का कुछ वर्ग ऎसा भी जिनके लिए विकास, रोजगार, शिक्षा, गरीबी, किसान, खेती जेसे मुद्दे  उतना महत्व नही रखते,  जितना महत्व रखती है  उनके लिए उनकी जाती स्वयं का स्वार्थ!

“सत्ताधारी दल भाजपा पुर्व में विकास के चेहरे के साथ मैदान में उतरी थी, परंतु हार्दिक पटेल, जिगनेश मेवानी, अल्पेश के जातीगत आधार पर चुनावी मैदान में उतरने व इन सभी को कांग्रेस का भरपूर समर्थन मिलने पर भाजपा ने भी  जातीय रूख अपनाया है।

 

और इन सबके चलते हम पुनः उसी स्थिति में पहुंच गए हैं, और हम अब भी राजनीति विकास को पाने में बहुत दूर है।

 

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