गुजरात का दलित समुदाय जंहा आज भी बदलाव की जरूरत है.

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देश का सबसे बड़ा प्रतीक अगर कुछ हो सकता है, तो हमारे लिये तिरंगा ही है, हवा के साथ-साथ, लहराता तिरंगा, अक्सर इस बात का प्रमाण भी है, की इसके लहराने मात्र से, एक भारतीय को ऊर्जा तो मिलती ही इसके साथ, अलग अलग भाषा, खान पान, पहनावा, हर समाज को, एक साथ जोड़कर रखना, इस नैतिकता को समझने की परख भी हमें तिरंगे से ही मिलती है, खासकर इसके रंग, केशर, सफेद और हरा, इन रंगों की अलग अलग भाषा है मसलन केशर क्रांति का प्रतीक है, सफेद शांती का ओर हरा, भारत देश के खेती प्रधान होने की हक़ीक़त को भी बयान करता है, वही आज जब, धर्म, आस्था, हमारे देश में सबसे मुखर पर है, तब भी केशर को जंहा हिंदू आस्था से जोड़कर देखा जा सकता है वही हरे रंग को मुस्लिम आस्था से, कहने का तातपर्य, यही है की हर मानसिकता को अपनी पहचान, हमारे तिरंगे में दिखाई देती है, लेकिन एक सवाल जो आज बहुत खटक रहा है, व्यक्तिगय रूप से मैं इसका जवाब भी नही ढूढ पा रहा हूँ, की तिरंगे को या इसमे मौजूद रंगों को, किस तरह परिभाषित करू की, हमारे समाज में चेचक के रोग की तरह फैली हुई जाती व्यवस्था को नकारा जा सके ओर एक आम भारतीय को तिरंगे के माध्यम से, इतना शिक्षित किया जा सके की वह जाती व्यवस्था को जड़ से उखाड़ने फैकने के लिये खुद को आस्वस्त कर ले, लेकिन मेरे हाथ निराश ही लगती थी की आज तक किसी ने भी तिरंगे को जाती व्यवस्था के खिलाफ किसी भी मुहिम का हिस्सा नही बनाया.

लेकिन, अगर हम तिरंगे को समझे तो ये मात्र, राष्ट्र ध्वज ना होकर, हमारे समाज और देश की पहचान है, इसी माध्यम से हमें ये समझना जरूरी है कि आजादी के 70 साल बाद भी, हमने जातिवाद को खत्म करने के लिये एक मात्र आरक्षण ही अपनाया है, जो आज वास्तव में कई तरह के विवाद को अपने से जोड़ रहा है, वही आरक्षण के सिवा, किसी भी तरह की सामाजिक, शेक्षणिक, राजनीतिक, मुहिम को नही चलाया गया जिस से, हमारे समाज में मौजूद जातपात ओर छुआ छूत, को मिटाया जा सके, मसलन आज भी गावँ में नीची जाति के व्यक्ति को खेती करने नही दी जाती, इसके दो कारण है या तो उसके पास जमीन नही है अगर है भी तो वह संसधान नही है जिस से खेती की जा सके, क्योकि इन पर गावँ के उच्च जाति के समाज का ही नियंत्रण है, अर्थात गाँव ओर छोटे कस्बो में, नीची जाति का मतलब छुआ छूत तो है ही लेकिन इसके कारण समाज का यह तबक्का सिर्फ और सिर्फ मजदूरी करने तक ही सीमित रह जाता, जिसके कारण इनका व्यक्तिगत जीवन अथाह गरीबी के साथ साथ एक नागरिक के नाते जरूरी सुविधाओ से भी वंचित रहता है.

अपनी निजी जिंदगी में, मुझे पंजाब और गुजरात, इन दोनों समाज को बहुत नजदीक से देखने का मौका मिला है, ओर इसी अनुभव से कह सकता है, इन दोनों जगह के साथ साथ, हमारे पूरे देश में जाति आधारित भेदभाव एक गंभीर समस्या है, जिसे दूर करने की किसी भी तरह की पहल, मैंने मेरी जिंदगी में नही देखी. पंजाब, में हम किसान है, खेती के लिये जमीन भी है, ओर घर का बड़ा आंगन भी, जंहा ट्रेक्टर ट्राली आराम से प्रवेश कर सकते है, अमूमन हर किसान का घर इतना बड़ा तो होता ही है, लेकिन, गाँव का दूसरा कोना, जंहा जाती आधारित समाज है वह बहुत दयनीय।स्थिति में है, यंहा पानी का स्रोत भी सरकारी टँकी है वही शौच के लिये खुले खेत या गावँ के पास से गुजर रहा पानी का स्रोत का किनारा. कहने का तातपर्य इतना है की जिंदगी गरीब है और सामाजिक अपेक्षा भी यंहा पूर्ण रूप से मौजूद है.

यंहा, नीची जाति की औरतों को किसान के घर, पशुयों का मल सर पर उठाकर फैकने का काम मिलता है, वही आदमियों को, खेत में खेती से जुड़ा मजदूरी का काम, लेकिन दोनों जगह छुआ छात, पूर्ण रूप से मौजूद है, यंहा।दोनों जगह, मजदूरी करने वाली औरत ओर।मर्द, अपने बर्तन घर।से।लेकर आते है और इन बर्तनों को ये खुद साफ करते है जिन्हे किसान के घर।के मुख्य बर्तनों से बहुत दूर ओर अलग रखा जाता है, वही पैसो की तंगदिली के कारण, समाज के इस पिछड़े हिस्से के बच्चा शिक्षा के लिये गावँ के सरकारी स्कूल।पर ही निर्भर है, जिसकी पढ़ाई का कही कोई मापदंड नही है, पंजाब के गावँ के अनुभव से मैं कह सकता हूँ की यंहा जात पात, छुआ छूत तो है ही लेकिन इस के कारण समाज के इस वर्ग को गरीब और अशिक्षित बना कर रखने की मुहिम आज भी जिंदा है.

जंहा पंजाब का मेरा अनुभव गावँ से जुड़ा हुआ है, वही गुजरात का अनुभव, शहर वह भी गुजरात की पहचान बन चुके शहर अहमदबाद से है, अहमदबाद का समाज शिक्षित ओर अमीर भी है लेकिन इस माप दंड से ये नही कहा जा सकता की यंहा जाती प्रथा के आधार पर छुआ छूत नही है, यंहा कोई भी।पॉश इमारत।की नींव।रखी जाती है तो कई जगह फ्लैट बुक करवाने वाले ये सवाल जरूर पूछते है की यंहा कोई नीची जाति के व्यक्ति ने।फ्लैट तो नही बुक करवाया क्योकि इस से फ्लैट की रीसेल वैल्यू कम हो जाती है, यंहा कई ऐसी सोसाइटी है जंहा जाती आधारित मकान मालिक है मसलन पटेल, शाह इत्यादि ओर इसी तरह समाज का निचला।वर्ग भी.

लेकिन, जंहा अहमदबाद शहर ने बहुत तरक्की की है, गगन चुम्भी इमारते है, वही इमारतों में साफ सफाई करने के साथ साथ यंहा के शोच को भी साफ।करने का कार्य, यही समाज का निचला वर्ग करता है, वही यंहा के गावँ में भी, मेरे ही गावँ की तरह, जाती आधारित बस्ती है, ओर समाज का निचला वर्ग, जिसे निम्न जाती के कारण, अलग थलग कर दिया गया है, वह गरीब और अशिक्षित भी है, शिक्षा का भी यही हाल है, मेरे शहर के घर के पास, सालो से एक सरकारी स्कूल है जंहा अक्सर चुनाव के दरम्यान हम वोट करने जाते है, इसी सरकारी स्कूल की हालत बहुत अच्छी नही है मूलभूत सुविधाओं की हालत भी खस्ता है, लेकिन यंहा पढ़ने कोंन आता है, वही जिस समाज को हमने जाती आधारित अछूत बना रखा है. जब शिक्षा का स्तर ही इतना निम्न है, तो रोजगार भी इसी तरह, मजदूरी से जुड़े होंगे, साफ सफाई के साथ साथ, सब्जी तरकारी बेचना, रिक्शा चलाना, ड्राइविंग करना, इत्यादि पेशो में समाज का ये हिस्सा अपनी मौजूदगी दिखाता है.

गुजरात के समाज के जिस गरीब बस्ती से होकर गुजरता हूँ वँहा निम्न जाति के लोग ही मिलते है, जंहा शहर में होने के बावजूद शोच के लिये सार्वजनिक शोच का उपयोग ही एक माध्यम है. लेकिन इन्ही बस्तियों में, गंदगी और बेरोजगारी, बहुत बड़ी समस्या है, अक्सर इन परिवारों को सर्द की ठंड में भी, खुले आसमान के नीचे सोते हुये देखता हूँ. यंहा धार्मिक रीति रिवाज है तो एक ही तरह लेकिन अलग अलग जगह पर मनाये जाते है, मसलन नवरात्रि का पंडाल जंहा माता जी के गरबे होते है वह भी अलग अलग बस्तियों में अलग अलग ही किये जाते है, व्यक्तिगत तोर पर मैंने धार्मिक आधार पर शहर में भेद भाव नही देखा लेकिन दूर दराज के इलाकों में ये मौजूद है, जिसका उदाहरण ऊना में गोरक्षकों द्वारा दलितों की गयी पिटाई, जंहा इन्हे गाड़ी से बांधकर।पीटा गया, गोरक्षकों का इल्जाम इतना था की ये परिवार मृत गाय की चमड़ी निकालता है. http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/gujarat-7-of-dalit-family-beaten-up-for-skinning-dead-cow-2910054/ वही हाल ही में, दलित समुदाय के नोजवानो पर इसलिये हमला किया गया क्योकि उन्होंने मुछे रखी थी. https://thewire.in/184255/dalit-teen-attacked-gujarat-allegedly-upper-caste-men-sporting-moustache/

आज दलित समुदाय, गुजरात में भयभीत भी है और चिंतित भी, यही कारण रहा होगा की एक दलित संगठन ने 125 फ़ीट लंबा और 83.3 फ़ीट चौड़ाई, वाला तिरंगा बनाया जिस के लिये, संगठन से जुड़े हर व्यक्ति ने अपनी मजदूरी से 10-10 रुपये चंदा भी दिया और साथ ही साथ इस तिरंगे को बनाने में मेहनत भी की, इनका इरादा इस तिरंगे को गुजरात राज्य के मुख्य मंत्री श्री विजय।रूपानी को भेंट करना था, लेकिन तिरंगे के साथ आये इस दलित समुदाय के प्रतिनिधि मंडल से जंहा मुख्य मंत्री नही मिले वही उनकी ओर से प्रस्तुत हुये अफसर ने ये कह कर इस तिरंगे को लेने से मना कर दिया कि इसको रखने के लिये सरकार के पास जगह नही है. https://counterview.org/2017/08/11/how-a-reluctant-gujarat-government-agreed-to-allow-dalit-rally-with-indias-largest-national-flag/amp/

यंहा सोचने की जरूरत है कि अगर इसी तरह जम्मू।कश्मीर, पंजाब या उत्तरपूर्वी राज्य के किसी मुख्य मंत्री ने इस तरह तिरंगे को लेने से मना कर दिया होता तो क्या हम देश द्रोह की बहस नही छेड़ देते, लेकिन ये  राज्य हिंदू बहु संख्यक है इसलिये राष्ट्र द्रोह का आरोप तो नही लगाया जायेगा लेकिन इस माध्यम से हम समझ सकते है कि आज हमारे देश में दलित और पिछड़े वर्ग की स्थिति बहुत अमनाविय ओर दयनीय है, जंहा इनका वजूद तिरंगे में किसी भी रंग के माध्यम से नही दिखाया जाता वही इनके हाथ का बना तिरंगा भी हमारी राजनीतिक व्यवस्था को कबूल नही है, अगर वास्तव में हमें हमारे समाज में कोई बदलाव लाना है तो हम सभी को, खुद को दलित घोषित करना होगा क्योंकि सही मायनों में दलित का मतलब ही है कि जंहा।कोई भेदभाव नही है ओर।नाही कोई छुआ छात है. अन्यथा, हमारे समाज से जाती वाद ओर छुआ छुत को हटाना बहुत मुश्किल है क्योंकि ये दीमक की तरह हमारे समाज की जड़ो में बैठ गया है.

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