गुजरात राज्य चुनाव में तीन नोजवान जो मोदी जी की आँख से आँख मिला रहे थे.

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गुजरात राज्य चुनाव, पिछले एक महीने से देश और विदेश में चर्चा का विषय बने हुये थे, इसके कई कारण हो सकते है लेकिन मूलभूत दो ही वजह थी एक हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी जी का ये ग्रह राज्य है और दूसरा कारण की यंहा गुजरात में 22 साल से भाजपा, सत्ता में मौजूद है जिसे करीबन 1995 से लेकर हर बार जनता ने पूर्ण बहुमत देकर स्वीकार किया है. लेकिन इस बार, गुजरात राज्य चुनाव, जो दो महीने पहले भाजपा के लिये, एक आराम दायक जीत की परिभाषा दे रहे थे, उसमें भाजपा को लोहे के चने चबाने तक कि नोबत आ गई, जंहा एक समय ऐसा भी लग रहा था कि इस बार भाजपा हार सकती है, भाजपा को दम निकालने वाली इस जीत के पीछे कांग्रेस से ज्यादा तीन नोजवान हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवानी की उपस्थिति, सबसे बड़ा कारण रही है.

इस चुनाव में जो सबसे बड़ा चेहरा चर्चा का विषय रहा वह था हार्दिक पटेल, 23 साल का एक नोजवान जो पढ़ाई में ज्यादा निपूर्ण नही था, ओर सबसे जरूरी तथ्य जो लोगो को हार्दिक पटेल से जोड़ रहा था वह हार्दिक का एक मध्यवर्गी किसान परिवार से होना, 2015 का पटेल आरक्षण आंदोलन जो अब इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा चुका है, उसी की पहचान बन कर हार्दिक का उभार आम जनता में हुआ था लेकिन इस चुनाव में, हार्दिक एक चुनाव प्रचारक की भूमिका में थे जंहा आरक्षण एक मुद्दा जरूर था लेकिन इसके साथ ओर भी कई मुद्दों से हार्दिक राज्य की भाजपा सरकार को घेर रहे थे.

राज्य भाजपा का सबसे बड़ा अगर कोई नेता था जिसके नाम पर वोट आ सकती थी वह श्री नरेंद्र भाई मोदी ही थे और इनका चुनावी रैलियों में भाषण देने की शैली, आम जनता को बहुत प्रभावित करती है, लेकिन इस चुनाव मोदी जी की ही शेली का जवाब हार्दिक दे रहे थे, हार्दिक की रैलियां गाँव ओर कस्बो में हो रही थी, जंहा किसान हार्दिक से जुड़ रहा था, जमीन को समझकर हार्दिक, राज्य सरकार द्वारा तय कीमत से कम कीमत पर खरीदी जा रही कपास, मुगफली, की फसल को मुद्दा बना रहे थे, वही किसान का कर्जा भी एक मुद्दा बन रहा था, शिक्षा, रोजगार, हर वह सुविधा जो एक जीवन का निखार कर सकती है और जिसे राज्य सरकार देने में निफल रही है, वह हर मुद्दा हार्दिक की रैली में दोहराया जा रहा था, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे जो हार्दिक की बात बहुत पसंद आई वह थी हिंदू मुस्लिम सदभाव, हार्दिक अपनी हर रैली में जनता को बता रहा था कि हिंदू मुसलमान अब मुद्दा नही है, इस मुद्दे से हमें डराया जाता है, ओर इसी डर की वजह से हमें हमारी मूलभूत सुविधाओं से वंचित कर दिया जाता है, हार्दिक के भाषण की शैली, वह भी गुजराती भाषा में, इसका जवाब राज्य भाजपा के पास कही नही था, चुनावी प्रचार के समय राज्य भाजपा के चेहरे पर उड़ी हुई रोनक का सबसे बड़ा कारण हार्दिक पटेल ही थे.

2015 में जब पटेल आरक्षण आंदोलन चल रहा था तब पिछड़ी जाति समुदाय को इस बात की चिंता थी कि कही पटेल आरक्षण के उनके आरक्षण में सेंद ना लगा दे, ऐसे में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व के रूप में अल्पेश ठाकुर का उभार हुआ, जंहा ये 2015 में पटेल आरक्षण का विरोध कर रहे थे,बाबा आबैंडकर के विचारों पर पहरा दे रहे थे, यही वजह थी कि साल 2017 तक आते आते, अल्पेश ठाकुर के पीछे पिछड़ी जन जातियों का समुदाय, ढाल बनकर खड़ा था जिनकी इतनी संख्या तो है कि इनका एक तरफा झुकाव, किसी भी चुनावी नतीजो पर बहुत गंभीर असर कर सकता है, अल्पेश ठाकुर, की चुनावी रैलियों में उबड़ता जन शैलाब, अल्पेश ठाकुर को निर्णायक तो बना ही रहा था लेकिन बेहद शांत दिखने वाले अल्पेश, एक जन नेता से ज्यादा एक रणनीतिकार के रूप में उभर रहे थे जंहा पोलिंग बूथ मैनेजमेंट से लेकर, हर चुनावी रणनीति का अल्पेश ही जामा पहना रहे थे जो कारगर भी सिद्ध हो रही थी.

उभरते हुये इन नोजवान नेताओ में सबसे आखिर में जो नाम आता है वह है जिग्नेश मेवानी का, ऊना में तथा कथित गोरक्षकों द्वारा, दलित समुदाय के नोजवानो को सरेआम पीटने के विरोध में जिस आंदोलन का जन्म हुआ, उसी का उभार थे जिग्नेश मेवानी, जो दलित समुदाय पर हो रहे अत्याचार से लेकर दलित समुदाय को किस तरह शिक्षित किया जाये, रोजगार के अवसर पैदा किये जाये, वही दलित समुदाय की महिलाओं का जीवन किस तरह सुधारा जा सके ,उस पर पहल कर रहे थे, गुजरात में जातिवाद ओर छुआछूत मौजूद होने के कारण, भारी संख्या में लोग जिग्नेश से जुड़े ओर राज्य सरकार की दलित नीतियों का विश्लेषण भी किया जाने लगा, जमीन आवंटित से लेकर हर मुद्दा जो दलीत समुदाय को प्रभावित कर रहा था, खास कर गुजरात राज्य भाजपा सरकार द्वारा, उसका प्रति रोध के रूप में, जिग्नेश मेवानी, दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व करने में कामयाब रहे.

अगर, हम गुजरात राज्य चुनाव के आखरी नतीजे देखे तो राज्य भाजपा, बहुमत से सात सीट ही ज्यादा ले पाई है वही कांग्रेस ओर इसके समर्थक निर्दलीय उम्मीदवार, दस सीटो से बहुमत से पीछै रह गये, भाजपा विरोधी रणनीतिक, पटेल, ठाकुर, दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व खोजने में तो जरूर कामयाब रहे लेकिन आदिवासी समुदाय को कोई नेता नही दे सके खासकर वह विस्तार जो राजस्थान और मध्य प्रदेश से सटा हुआ है कहि अगर हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकुर या जिग्नेश मेवानी की तर्ज पर आदिवासी समुदाय को भी एक नेता मिल जाता जो आदिवासी समुदाय की समस्याओं को उजागर कर सकता, तो यकीनन आज ढोल नगाड़े कांग्रेस के पक्ष में बजाये जाते, बस यही भूल, भाजपा की जीत का कारण बन गया.

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