चुनावी चर्चा में मंदिर है, गाय है, भूख से मरते लोग नहीं

Posted by Vivek Upadhyay
December 5, 2017

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देश में फिर से एक बार चुनावी चर्चाएं शुरु हो गई हैं। हर तरह चुनावी माहौल चल रहा है, कोई कांग्रेस की तो कोई भाजपा के जीत के दावें कर रहा है। किसी को मोदी की पड़ी है तो किसी को राहुल की। हर कोई अपने अपने पसंद के नेता की शेखी बगार रहा है। कुछ छुटभइयें नेता भी हैं, जो दोनों की ही बढ़ाई और दोनों की अच्छाइयां लपैट रहे हैं। इन सब मुद्दों में राम मंदिर बनाने वाले, अल्पसंख्यक के मसलें, आरक्षण की चाह और गौभक्त भी पीछे नहीं हैं। हर कोई अपनी अपनी डफली अपना अपना राग अलाप रहा है। लेकिन इन सब में गौण हो गया है तो वह जो इस साल भी भूख से मर गया। वह पहले भी मौन था और अभी भी मौन है। वह जिंदा होते हुए भी मरा हुआ ही था इन नेताओं के लिए। इससे भी बड़ी बात यह है कि उसके साथी, उसके गांव वाले, उसके शहर वाले अब बस चाह रख रहे हैं तो इस बात की कि हमें कुछ लाभ मिले। न कि इस बात की कि इस साल हमारे गांव फिर से कोई भूख से न मरे। शहर की सड़क पर फिर से किसी की लावारिस लाश न मिले। इस बात की चिंता है तो बस भाषणों लिखने वालों को, जो नेताजी को चमकाने के लिए कुछ एक दो लाइनों में इन्हें भी जोड़ दिया करते हैं। क्योंकि उन्हें भी पता है भाषण तो भाषण हैं, अमल कुछ नहीं होना। हमारे नेताजी चमकने चाहिये। भाषण के बाद नेताजी के लिए बजने वाली तालियाें की गूंज ऐसी होती है कि भूख से मरने वालों की चीखें उसे कभी चीर नहीं पाती। इसी वजह से आजतक वह हमारे कानों तक नहीं पहुंची। हर साल हमारे देश में लगभग 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं और हर रोज लगभग 3000 बच्चे भूख से मर जाते हैं। यह जानकारी ग्लोबल हंगल इंडैक्स के आंकड़ों से मिली है।

देश के हालात जुबानी जंग और राजनीति की रोटी सेकते लागों में ही सिमट कर रह गई है। हर रोज सूबह उठकर शाम तक हमारा ध्यान मोबाइल में रहता है टीवी चैनल्स भी देखते हैं। बस मुद्दा पूरे देश में कांग्रेस के राहुल और भाजपा के मोदी की बाते होती हैं। इससे साफ मालूम होता है कि लागों को राजनीति में ज्यादा दखल देने की आदत है और शाम को थख हारकर भागदौड़ की जिंदगी और दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर हम फिर अगली सुबह का इंतजार करने लगते हैं। इस दरमीयान कई हजार जाने खाना नहीं मिलने से चली जाती हैं। कई लोग समय पर इलाज न मिलने से मौत के ग्रास बन जाते हैं। कई किसान तो कोई स्टुडेंट, गरीबी ना जाने दुनिया की अजिबो-गरीब समस्याओं को लेकर मौत को गले लगा लेते हैं। देश में हम क्या चाहते हैं? राम राज्य, राम मंदिर आरक्षण और अल्पसंख्यक का ओहधा। पर कोई यह नहीं चाहता की देश तरक्की कैसे करे, फिर से अनेकताओं में एकता का नारा लगाते हैं। हम लोग सच में एक होकर सर्व-समाज, ऊंच-नीच की घीन भावनाओं को छोड़कर सभी की खुशियों को लेकर श्रेष्ठ भारता का निर्माण नहीं कर सकते हैं? भले हम कितनी भी तरक्की करलें, दुनिया में कितना भी अपना मुकाम बनालें पर सवाल यही है कि हमारे देश में हर रोज हजारों लोगों की मौत बस इस वजह से हो रही है क्योंकि उनको सहारा नहीं है। सहारा देने के लिए कई लोग हैं पर हमारी मानसिकता स्वार्थी हो गई है। हम चाहते कुछ और हैं कहते कुछ और हैं। हर सुबह चाय की चुस्कियों के साथ देश के हितों को लेकर चर्चा भी करते हैं, पर हम बदल जाते हैं। इस बात को लेकर जब हमारे सामने किसी व्यक्ति की दुर्घटना हो जाती है वो तड़पता रहता है और हमारे सामने ही दम तौड़ देता है पर उस वक्त देश की चिंता को छोड़ हमारी सोच बहुत छोटी हो जाती है कौन मुसीबत मोल ले पुलिस के दरवाजे के चक्कर कौन लगाएगा। इस के घरवालों के सवालों को कौन झेलेगा पर उस व्यक्ति की जान जाने तक हम बस इन्ही बातों को सोचते रहते हैं और एक और व्यक्ति की मौत हो जाती है। अब राम राज्य अगर इसे माना जाने लगा तो फिर हम क्या कर रहे हैं। क्या सोच रहे हैं और किस ओर जा रहे हैं। इस बर एक बार गहनता के साथ मंथन जरूर कर लें ताकि राम राज्य चाहने से पहले राम की तरह सब कुछ त्याग कर लोगों की सेवा के लिए। आगे भी आना होगा।

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