चुनाव का खेल

Self-Published

मार्च 1996, विश्व कप का क्वार्टर फाइनल मैच, पाकिस्तान और भारत आमने सामने, इसी दिन घड़ी अपनी रफ्तार से धीमी चल रही थी, इंसानी जज्बात ओर धैर्य का पूर्ण रूप से परीक्षा के केंद्र में था, भारत के एक रन से, चेहरे पर जंहा मुस्कान आ रही थी वही एक विकेट गिर जाने से, गुस्सा ओर निराश चरम को पार कर रही थी, भारत की बैटिंग के आखिर ओवर में मारे गये धुंआ धार रन जंहा हर्ष ओर उल्लास का कारण थे वही पाकिस्तान की शुरुआत की तूफानी ब्लैबाजी, टीवी को बंद कर देने के लिये प्रेरित कर रहे थे, आखिर में जीत भारत की हुई, खुशी का ये आलम था कि सड़कों पर लोग नाच गा रहे थे, खुशिया मना रहे थे, जाम लगने से आव जाही पर बहुत बुरा असर पड़ा था, लेकिन इसके दूसरे दिन, बेरोजगार वापस टीवी को देख रहे थे, बीमार स्वास्थ्य सेवा की कतार में खड़े थे, मसलन ऐसा कुछ नही हुआ था कि एक निजी जीवन में किसी भी तरह का बदलाव आया हो या इसे महसूस किया जा सके.

यंहा सवाल हो सकता है कि एक क्रिकेट मैच से आखिर समाजिक बदलाव किस तरह लाया जा सकता है सही भी है, लेकिन आज जिस तरह से हमारे देश में चुनाव लड़ा जा रहा है, बयान बाजी हो रही है, चुनाव एक मुद्दों की लड़ाई से भटकर जीत हार का सबक बन रहा है, जंहा जीत इतनी मायने रखती है कि इस जीत से अगला मैच, मसलन अगले चुनाव में लड़ने का मनोबल मिलता है वही हार धराशाही कर देती है,जंहा अगले चुनाव में आप के जीतने की उम्मीद बहुत कम, या ना मात्र की रह जाती है, ऐसे में एक चुनाव ओर क्रिकेट के मैच में क्या अंतर रह जाता है, जंहा मैच में खिलाड़ी की जीत ओर हार दर्शक की मानसिकता पर भी बहुत गंभीर असर करती है वही हाल आज चुनाव का है, लेकिन क्रिकेट मैच ओर चुनाव में एक जमीनी हकीकत है, जंहा क्रिकेट में दर्शक बस दर्शक ही बन कर रहा जाता है, वही चुनाव में वह एक मतदाता होता है जिसका मत, एक मत भी चुनाव की हार जीत के लिये निर्णायक साबित होता है.

लेकिन, जिस तरह क्रिकेट एक बाजार बन गया है, जज्बातों को उभारा जाता है, हर रन पर कॉमेंटर, एक अलग रुख रखते है वही हाल चुनाव का है, खासकर चुनाव के नतीजों का, आज जब गुजरात चुनाव के नतीजे आ रहे है, मतगणना की जा रही है, कांग्रेस और भाजपा, चुनावी मैदान में दो प्रतिध्वंधि बन कर उभर रहे है, इसी तर्ज पर टेलीविज़न न्यूज़ चैनल का एंकर, क्रिकेट कमेन्टर की तरह शूट बूट में खुद को पेश कर रहा है, वही उसकी भाषा  ही किसी मैच के आखो देखा हाल की तरह ही बयान की जा रही है मसलन अब भाजपा बहुमत से बस इतनी सीटो की दूरी पर है, क्या कांग्रेस भाजपा को हरा पायेगी ? क्या ये गुजरात के चुनाव, 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत को सुनिश्चित कर रहे है ? क्या मोदी लहर, फिर भारी पड़ रही है?

लेकिन जिस तरह, क्रिकेट मैच की तैयारी, में कई दिन लग जाते है, खासकर, भारत और पाकिस्तान की मैच में यंहा खिलाड़ी गेंद फैकने ओर बैटिंग करने से ज्यादा, एक योद्धा, लड़ाकू, फौजी इत्यादि छवि में उभार दिया जाता है, यंहा मैच की जीत हार, मैदान में खेली गई क्रिकेट से कही ज्यादा, दोनों देश और इनके नागरिकों के व्यक्तिगत जीत हार का फैसला बन जाती है, अब इतने बड़े इवेंट में, जिसे बड़ा बनाया जाता है, वँहा लाभ कमाने वाला बाजार किस तरह दूर खड़ा मूक दर्शक बन कर तमाशा देख सकता है, लेकिन बाजार को चाहिये तड़का, मसलन दो खिलाड़ियों के बीच की एक आम बात चीत, आज कल सोशल मीडिया इसका एक प्लेटफार्म बना हुआ है, जंहा मामूली सवांद भी, कहा सुनी की संज्ञा में दिखाया जाता है इसी के माध्यम से, लाखो करोड़ो के विज्ञापन को आकर्षित कर सकती है.

अब इसी दृष्टि से चुनाव को देखै, तो बड़ी बड़ी रैलियां, रंग बिरंगे झंडे, लोगो का हजूम, नेता के कहने मात्र से लोगो के बीच गूंजती चिलकारिया, कोई भी बयान, शब्दो के माया जाल में उलझता हुआ दिखाई दे, उस पर टैग लगा कर, सोशल मीडिया पर चलाया जाने का चलन, मसलन आज चुनाव में इतना तड़का लगाया जा रहा है, की एग्जिट पोल, चुनाव के बाद लगातार हो रहा विश्लेषण, टीवी, सोसल मीडिया पर, जीत का जशन, बयान बाजी, एक दर्शक के रूप में बाजार, एक नागरिक को चुनाव में उसी तरह जोड़ रहा है जिस तरह क्रिकेट मैच में जोड़ा जाता है.

अब जब हम चुनाव को क्रिकेट मैच का रंग दे ही चुके है, हमारी मानसिकता में बदलाव से ज्यादा, जंहा जीत हार बहुत मायने रखती है, ऐसे में चुनावी मंच से साम्प्रदायिक सौहार्द को ताड़ ताड़ करते, कहे गये शब्द, अपने आप हमारी मंजूरी ले लेते है, लेकिन क्रिकेट मैच के दौरान एक कुपोषण का शिकार बच्चा, अशिक्षित, असुरक्षित ओर बेरोजगार नोजवान, किसी भी तरह के बदलाव की उम्मीद नही रखता उसी तर्ज पर आज चुनाव परिभाषित हो रहा है, इस चुनाव में, मोदी जी के विकास और गुजरात मॉडल की धज्जियां उड़ा दी गयी लेकिन चुनाव के आखरी चरण में सम्प्रदायिक गेंद ने, अपना प्रभाव विकास,शिक्षा, रोजगार , सुरक्षा से कही ज्यादा बड़ा कर दिया, लेकिन मतदाता का मत धर्म और मजहब में उलझ कर रह गया, उसी तरह जिस तरह क्रिकेट मैच में पिच के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप अक्सर घेरलू टीम पर लगते रहते है उसी तरह चुनाव में भी घेरलू पक्ष, अर्थात सत्ता में मौजूद,मतदाता की मानसिकता को प्रभावित करने के अलग अलग ढंग तलाश करते रहते है जंहा बाबरी मस्जिद की 25वी वर्षगाठ, इत्यादि बहुत से पहलू है.

गुजरात चुनाव नतीजों में बहुत से विश्लेषण होंगे, लेकिन यंहा भाजपा की जीत का अर्थ, राजनीतिक पार्टी के साथ साथ, आस्था का जुड़ना भी है जो भाजपा को देश हित की विचारधारा बना देता है, इसी दृष्टिकोण से कांग्रेस पिछड़ गई, खेर, में जंहा चुनावी मत देने गया था उस स्कूल के हालत खस्ता थी, ओर आज भी है जंहा बैठने के लिये जमीन और पानी के लिये टँकी, लेकिन जब आज हमने क्रिकेट मैच ओर चुनाव में जब कोई फर्क नही रखा, तो हमारे मुद्दे भी चुनाव की चर्चा में ओर इसके पश्चात कही भी अपनी गंभीरता नही रखते, शायद हम अपनी परेशानियों से आदि हो चुके है और किसी भी तरह की उम्मीद से नाउम्मीद, ऐसे में अगर चुनाव एक मनोरंजन का साधन बन जाता है तो इसमे हर्ज ही क्या है.

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