चुनाव में जनता के मुद्दे कहाँ गए?

Posted by Salman Mohd Shad
December 18, 2017

Self-Published

संभवतः गुजरात मे बीजेपी की जीत हुई जैसे कि हफ्ते भर से न्यूज़ रूम में चुनाव विश्लेषक के साथ एंकर दहाड़ लगा कर बहुमत की घोषणा कर रहे थे।

गुजरात बीजेपी का निर्भेद गढ़ रहा है लेकिन इस बार जिस तरह गुजरात के अंदर परिवर्तन का माहौल बन रहा था उससे उम्मीद लगाई जा सकती थी कि इस बार चुनाव के नतीजे कुछ अलग हो सकते हैं।

चुनाव के पहले कांग्रेस ने सत्ता परिवर्तन माहौल को अपनी ओर करने का भरसक प्रयास किया । पाटीदार आंदोलन के नेताओं को अपनी तरफ किया, किसान दलितों के शोषण का मुद्दा बनाया, नोटबन्दी और जीएसटी को जोरशोर से उठाया यहां तक कि प्रत्यक्ष रूप से मुसलमानों से भी दूरी बना कर रखी। लेकिन ये सारी कोशिशें सिफर साबित हुईं।

गुजरात का हर बड़ा-छोटा व्यापारी नोटबन्दी और जीएसटी से टूट चुका था उसका गुस्सा सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के रूप में देखने को मिल रहा था, आखिर रोज़गार में बट्टा लगा था गुस्सा निकले भी क्यों ना ? पाटीदार आरक्षण और किसानों की समस्या को लेकर अलग आंदोलनरत थे, नरेंद्र मोदी और बीजेपी सरकार को पानी पी पीकर गालियां पड़ रही थी। अचानक से ये गुस्सा, विरोध प्रदर्शन, हक की लड़ाई सब नार्मल हो गया क्योंकि अचानक से किसी ने  खबर दी कि पाकिस्तान गुजरात मे चुनाव लड़ रहा है, औरंगज़ेब का शासनकाल वापस आ जाएगा, मंदिर नही बनने दिया जाएगा।

हर सभा और रैलियों में बीजेपी को वोट न देने की शपथ लेने वाली भीड़ का मूड शायद अचानक से तभी बदल गया जब मोदी जी वोट देने के बाद रोडशो करने लगे । बीजेपी के खिलाफ हुई रैलियों में हज़ारों की तादाद में इकट्ठा होने वाली भीड़ अपने तमाम बुनियादी मुद्दों को भूलकर शायद अपने सार्वभौमिक नेता को देखकर किसी स्वर्गिकलोकन मे पहुँच गयी और जब आंखे खुली तो बीप की आवाज़ से कमल का बटन दब चुका था।

कहते हैं कि चुनाव का परिणाम किसी भी पार्टी के लिए हो लेकिन जीत तो जनता की होती है। लेकिन जिस तरह से चुनाव प्रचार में आरोप-प्रत्यारोप हुए और झूठ का पुलिंदा बांधकर जनता को भ्रमित किया गया इससे लोकतंत्र को ज़रूर नुकसान हुआ है।
शायद आज जनता नहीं जीती लोकतंत्र नही जीता।

मोहम्मद सलमान
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में मास मीडिया के अंतिम वर्ष का छात्र । उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक, बौधिक राजधानी संगम नगरी इलाहाबाद से संबंध।
Mo- 8505862170

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