टिकट:एक राजनीतिक समस्या

Posted by Gaurav Kumar
December 16, 2017

Self-Published

भारतीय लोकतंत्र में टिकट का अपना महत्व है वो टिकट चाहे ट्रेन का हो या राजनीती का हो हर कोई अपना -अपना टिकट कन्फर्म कराने में लगा हुआ है बात गुजरात चुनाव कि है बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों पार्टीयों के नेता दिल्ली का चक्कर लगाना शुरु कर चुके है जैसा कि आम तौर पे देखा जाता है जब चुनाव नजदीक आते है तो स्थानीय नेता अपने टिकट को कन्फर्म कराने का कोई भी रास्ता अपना लेते है राजनीतिक पार्टीया जब टिकट वितरण करती है उसके बाद असंतोष के स्वर धीरे -धीरे पार्टी के भीतर उठने लगते है भीतरघात के डर से पार्टीया उनको मनाने का प्रयास भी करती है पर इसके बावजूद वे दूसरे पार्टीयों के तरफ रुख करने लगते है यह प्रक्रिया दोनों पार्टीयों में होती है ऐसा ही कुछ नज़ारा अभी गुजरात में देखने को मिला है तरह -तरह के हतकंडे अपना रहे है जैसे कि धरना देना और नेतृत्व को मनाने की पूरी क़वायद में लगे हुए है ऐसा ही कुछ देखने को मिला है हार्दिक पटेल के धड़े में यह तो एक आन्दोलन था जो कि अब कांग्रेस को उमीद्वार दे रहा और इसमें में भी फूट पड़ गयी है पाटीदार आन्दोलन भी कलह का सिकार हो गया है कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी दोनों को स्थिति साफ़ करनी चाहिये की कौन सा नेता जनता कि उम्मीद पर खरा उतरता है जिस प्रकार कि गतिविधि पाटीदार के नेताओ द्वारा कि गयी उसको देखकर यही लगता है कांग्रेस ज्यादा मज़बूत तो नही लेकिन कमजोर जरुर हुई है पाटीदार नेताओं को चुनाव उताकर अपने कार्यकरताओ की अनदेखी करना ये भी कांग्रेस को नुकसान पंहुचा सकता है कहने को तो हमारे देश का लोकतंत्र विश्व सबसे बड़ा लोकतंत्र है पर सोचने वाली बात यह कि आजादी ७० साल बाद भी ऐसी कोई नीति नही बना पाये जिससे पार्टीया अपने प्रत्याशी का चुनाव कर सके और विस्वनीयता बनाई जा सके और   वैसे भी पार्टी के आम कार्यकरताओ कि कोई भूमिका भी नही रहेती है प्रत्याशीयों के चुनाव करने में सबकुछ  केवल पार्टी के बड़े नेताओ पर निर्भर करता है है कि कौन चुनाव लडेगा और कौन नही पर जिस प्रकार से असंतोष कार्यकरताओ में बढ़ रहा है ये पार्टीयों को समझना होगा राजनेताओ को इस बारे में विचार करना होगा  और जनता के सामने सही विकल्प देने कि जरुरत है

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