Youth Ki Awaaz is undergoing scheduled maintenance. Some features may not work as desired.

पर्दा प्रथा

Posted by Divya Antil
December 8, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

हमारे समाज में कितनी रोचक प्रथाएँ प्रचलित हैं।ये प्रथाएँ हमारे समाज का महत्त्वपूर्ण अंग मानी जाती हैं और अक्सर औरत पर पुरूष का वर्चस्व बनाने के लिए होती हैं।पर्दा प्रथा भी इन्हीं में से एक है।यह प्रथा अफगान में शुरू की गई थी और बाद में बाकी देशों में खासकर भारत में और मुस्लिम देशों में इनका चलन आरंभ हुआ।कुरान और मनुस्मृति आदि किताबों में इन प्रथाओं के पालन करने के नियम लिखे गए हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि औरतों को घर की चारदीवारी के अंदर रहना चाहिए और बच्चों का पालन पोषण करना चाहिए।

इस प्रथा के पलानहार तर्क देते हैं कि ये प्रथा औरतों को गलत लोगों की नजरों से बचाने के लिए हैं।यदि हम ध्यान दें तो क्या वास्तव में ये औरतों को बुरों नजरों से बचाने के लिए है?यदि ऐसा है तो क्यों औरतों पर अत्याचार होते आए हैं? कुछ लोगों ने तो इन्हें औरतों के संस्कारों से ही जोड़ दिया है।ऐसे संस्कारों से जिसके ‘स’ तक भी इनका कोई वासता नहीं है।’शर्म तो औरत का गहना है’- जैसे विशेषण पूर्ण शब्दों से इस प्रथा को बचाने के लिए बहस की जाती है।हैरानी की बात तो यह है कि इसका पालन करने वाले समाज के वो ठेकेदार हैं जो एक स्त्री को एक ‘उपभोग की वस्तु’ मात्र मानते हैं।

यह प्रथा भले ही आजकल शहरी जीवन में देखने को नहीं मिलती परंतु ग्रामीण जीवन का यह जरूरी अंग है।हमारे देश की पंचायतों में महिला सरपंच को सभा में पर्दा करते देखा जा सकता है। ये प्रथाएँ काफी समय से हमारे समाज में बिना किसी सवाल से चली आ रही हैं। यदि कोई इन पर सवाल करता है तो उसे पागल करार कर दिया जाता है।यहां तक की औरतें खुद ही इन प्रथाओं की समर्थक बन विरोध करने वालों को गलत ठहराती हैं।

रूसो ने सही कहा है कि जब हम गुलामी में काफी समय तक रहते हैं तो हम उसे पसंद करने लगते हैं।

यही हाल इन औरतों के साथ हैं।हमें बदलाव की चल रही लहर की गति को बढ़ाना होगा।अन्यथा हमारा समाज तालाब में खड़े खराब पानी की तरह गंदा होता चला जाएगा।हमें औरतों को जागरूक करना होगा कि यह कुछ और नहीं बल्कि हमारे पुरूषवादी समाज का औरतों पर अत्याचार करने का एक हथियार है।औरत को सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों में भाग लेने से रोकने का एक जरिया है। हमें यह समझना होगा कि इस पुरूषवादी समाज ने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए इन प्रथाओं को जन्म दिया है और जड़ पकड़ चुकी इस प्रथा को उखाड़ कर फेंकना होगा।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.