नियमों को ताक पर रख कर दिल्ली में कमर्शियल वाहनों के एंट्री का खेल

Posted by Abhijeet Thakur in Hindi, News, Politics
December 12, 2017

स्टीकर माफिया ने न सिर्फ भ्रष्टाचार का एक स्मार्ट सिस्टम तैयार किया बल्की इसको बेहद सुरक्षित भी बना दिया है। साल 2014 में दिल्ली में ट्रकों और अन्य व्यावसायिक वाहनो के विंड शील्ड पर लगे कई तरह के रंग-बिरंगे और धार्मिक स्टीकरों का सबसे पहली बार पर्दाफाश हुआ था। कुछ खोजी पत्रकारों ने पता लगाया कि दिल्ली में एक बड़ा रैकेट, ट्रैफिक पुलिस और कुछ ट्रांसपोर्टरों के साथ मिल कर चलाया जा रहा है जिसमें दिल्ली में आने जाने और चलने वाले कमर्शियल वाहनों को हर महीने स्टीकर जारी किये जाते हैं। स्टीकर के बदले ट्रांसपोर्टर को एक तय रकम चुकानी होती है जिसके बाद तमाम नियम कानून ताख पर रख कर उनकी गाड़ियां देश की राजधानी की सड़कों पर धड़ल्ले से दौड़ती हैं।

कोई भी पुलिसकर्मी या ट्रैफिक स्टाफ उस गाड़ी को नहीं रोकता या रोकता भी है तो महज़ बातचीत से ही मामला रफा दफा हो जाता है। जब 2014 में ये बड़ा खुलासा हुआ था तब दिल्ली के ट्रैफिक पुलिस में हड़कम्प मच गया था और धड़ाधड़ ट्रकों से स्टीकर भी हटाए गए थे , साथ ही दर्जनों की संख्या में ट्रैफिक पुलिसकर्मियों के तबादले भी हुए। मामला शांत हुआ लेकिन धीरे धीरे और साल 2015 आने तक फिर से बदले रूप के साथ स्टीकर की वापसी हुई। अबकी बार इस नेक्सस का खुलासा करने वाले पत्रकारों में मैं भी था और सबसे पहले मेरी ही रिपोर्ट एक बड़े पोर्टल पर प्रकाशित हुई थी। बाद में लगभग सभी प्रमुख मीडिया ने इस बड़ी स्टोरी को बड़ी तत्परता के साथ उठाया और पुलिस महकमें की तरफ से भी छिटपुट कार्रवाई हुई। लेकिन भ्रष्टाचार की काली कमाई का खून जब रगों में दौड़ने लगे तो मेहनत से कमाई रोटी भला कहाँ रास आती है।

वर्ष 2016 में इस मुद्दे पर खामोशी रही और शायद किसी ने इसपर फॉलो अप भी नहीं किया। इस तरह कि बातें भी सामने आईं कि चंद पत्रकारों की एक लॉबी के साथ स्टीकर माफिया और कुछ भ्रष्ट ट्रैफिक पुलिस अधिकारियों की सेटिंग हो गई थी। हालांकि इस बड़े आरोप के पीछे कोई तथ्य या सुबूत मौजूद नहीं है लेकिन धुआं वहीं होता है जहां आग वाली तर्ज पर इस बात से पूर्णतः इनकार भी नहीं किया जा सकता। अब इस नेक्सस में चौथा स्तम्भ भ्रष्ट पत्रकारों की लॉबी भी शामिल हो चुका था और साल 2017 में जब स्टिकर माफिया लौटा तो निर्भीक हो कर धड़ल्ले से स्टीकर जारी होने लगे। गाड़ियां फिर से तमाम नियम कानून को ताख पर रख कर दिल्ली की सड़कों पर सरपट दौड़ने लगी, बे रोक टोक। वो भी उस समय जब पूरी राजधानी प्रदूषण के भयंकर संकट से जूझ रहा है ।

दरअसल अब ये पूरा सिस्टम दोबारा समझें । दिल्ली की सड़कों पर कमर्शियल वाहनों के चलने के लिये कई नियम कानून, मानकों और समय सीमा भी निर्धारित की गई है। उसी तरह दिल्ली में बाहर से प्रवेश करने वाले वाहनों पर भी तमाम तरह के नियम कानून लागू होते हैं। आम तौर पर ज़्यादातर ट्रक या अन्य छोटे मालवाहक वाहन ओवरलोडिंग, नो एंट्री टाइम में चलना, प्रदूषण के मानकों का पालन न करना और कई अन्य तरह के नियमों को तोड़ते हुए चलते हैं और दिल्ली में जगह-जगह तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को ये अधिकार है कि वो इनको रोककर चेक करें और कानून तोड़ने पर चालान या फिर वाहन ज़ब्त करने तक का भी प्रावधान है। यहीं एंट्री होती है माफिया की जो ट्रांसपोर्टर और ट्रैफिक पुलिस के बीच कड़ी का काम करता है।

माफिया ने मध्यस्थता कर एक ऐसा सिस्टम तैयार किया जिसके तहत एक तय मासिक रकम (रिश्वत) के बदले वो ट्रकों और अन्य छोटे मालवाहक वाहनों को एक स्टीकर जारी करेंगे। इस स्टीकर को सभी ड्राइवर अपने गाड़ी की विंडशील्ड पर चिपका देंगे। एरिया के ट्रैफिक इंस्पेक्टर या अन्य संबंधित अधिकारी जो इस नेक्सस में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं उनको अमुख माह के स्टीकर की जानकारी के साथ साथ उनके हिस्से की रकम (रिश्वत ) पहुँचा दी जाएगी। अब पूरे तय क्षेत्र (ट्रैफिक सर्किल/ जिले ) में स्टीकर वाले वाहनों को चेकिंग के दौड़ान रोका टोका नहीं जाएगा, चाहे कितने भी नियम कानून तोड़ कर चल रहे हों।

रोक कर चालान केवल उन्हीं वाहनों का होगा जो स्टीकर माफ़िया और उसके नेक्सस का हिस्सा नहीं हैं। हर महीने स्टीकर का डिज़ाइन बदल दिया जाता है और ये स्टीकर होलोग्राम वाले होते हैं जो अत्याधुनिक कंप्यूटराइज़्ड तरीके से बनाये जाते हैं। नकल की भी कोई गुंजाइश नहीं होती। कुल मिला कर इसको भ्रष्टाचार का अल्ट्रा मॉडर्न रूप मान सकते हैं जिसमें किसी को भी सबूत समेत पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है … बिल्कुल डॉन की तरह !

इस सिस्टम के ज़रिये भ्रष्टाचार भी बेहद सुरक्षित हो गया , अब ड्राइवर से डायरेक्ट डीलिंग नहीं करनी पड़ती और कैश रिश्वत की वसूली पूरे महीने के लिये एक मुश्त हो जाया करती है। बाद में सबका तय हिस्सा लिफाफे में बंद कर उस तक पहुंचा दिया जाता है।

साल 2017 के अंत में असल न्यूज़ नाम के वेब न्यूज़ चैनल ने एक बार फिर इस भ्रष्ट तंत्र की छानबीन कर इसका पर्दाफाश किया है तो ट्रैफिक पुलिस महकमे में गहमा गहमी का माहौल है कि कहीं फिर मुद्दा तूल न पकड़ ले। एक दो महीने के लिये भी सिस्टम बंद का मतलब है करोड़ों का नुकसान!

स्टीकर माफिया की वजह से न केवल भ्रष्टाचार को एक नियोजित सिस्टम के तहत बढ़ावा मिल रहा है, बल्की पहले ही प्रदूषण का ज़हरीला दंश झेल रही दिल्ली में प्रदूषण के स्तर को और बढ़ाने में भी इसका सीधा हाथ है।

ट्रांसपोर्टरों के लिये यह सिस्टम सुविधाजनक है, उनकी गाड़ियां सरपट भागती हैं, न कोई रोकता-टोकता न चालान और न ही रोज़-रोज़ रिश्वत देने की झंझट। महीने में एक बार गाड़ियों की संख्या के हिसाब से स्टीकर खरीदो, विंडशील्ड पर चिपकाओ, तय रकम माफिया तक पहुंचाओ और भूल जाओ।

आवश्यक है कि भ्रष्टाचार के इस बड़े खेल के खिलाफ मुहिम चलाई जाए और स्टीकर सिस्टम को जड़ से उखाड़ फेंका जाए। नहीं तो देश की राजधानी की कानून व्यवस्था और पर्यावरण को ये लगातार दीमक की तरह खोखला करते रहेंगे। आज ट्रांसपोर्ट सिस्टम में स्टीकर माफ़िया का काला कारोबार करोड़ों रुपये प्रतिमाह का हो चुका है और बेहद शर्मनाक बात है की इस सिस्टम में लगभग हर वो संबंधित लोग शामिल हैं जिनकी नज़र इनपर पड़ने से भ्रष्टाचार के इस नंगे खेल में विघ्न आ सकती है।

तीन साल के फील्ड रिपोर्टिंग के अनुभव, हाल में जारी एक वीडियो रिपोर्ट, दर्जनों ट्रक ड्राइवरों के ऑन रेकॉर्ड स्टेटमेंट और पूर्व में दर्जनों चैनल व अखबारों में प्रकाशित रिपोर्ट्स से मिली जानकारियों पर आधारित लेख ।

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