प्लेटफॉर्म वाला प्यार

Posted by Chandrakant Shukla
December 27, 2017

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प्लेटफॉर्म वाला प्यार

 

अजीब  लगा ना आपको, कि ये कौन सा नया शब्द ढूंढ के लाया हूं मैं… प्लेटफॉर्म वाला प्यार ? इसके लिए मैं आपको ले चलता हूं उस दौर में जब हमारी जवानी बस फूटी ही थी… 18वें बरस में एंट्री मारी ही थी… कि एक जुननू सवार हो गया था कि अगर पत्रकार बनेंगे तभी ज़िन्दा रहेंगे.. वरना नहीं.. सो हम पहुंच गए नवाबों की नगरी लखनऊ । पिता जी को लगा था कि लौंडा कहीं लखनऊ में रहा तो लोफर ना बन जाओ… इसलिए फरमान था कि रोज़ आओ, रोज़ जाओ.. मतलब डेली पैसेन्जर बनो, एमएसटी बनवाओ, ट्रेन पकड़ो.. अब शायद आप टाइटल के थोड़ा सा करीब पहुंच गए होंगे.. तो हुजूर शुरू हो गया सुबह भागने का सिलसिला.. जबलपुर कहां पहुंची, एलसी कितनी लेट है.. फलां-फलां.. यही सब सवाल होते थे स्टेशन पर आपस में, उन्नाव का प्लेटफॉर्म नंबर तीन, जहां लखनऊ जाने वाली गाड़ियों की रफ्तार धीमी पड़ती थी, ट्रेनें यहीं से पकड़ी जाती थी, कई अंकल और कई नए लड़के मिले.. कुछ कानपुर के लोगों से भी मुलाकात हुई… ऐसे में एक चेहरा था जो पुराने उन्नाव से आता था… आंखों में कभी टेस्टेड वाला चश्मा, तो कभी काला चश्मा.. हाईट में हमसे लंबी ही थीं वो मोहतरमा… पहले पहल तो सिर्फ आंखों से ताक लेते थे…. करीब एक महीना तो ऐसे ही गुजर गया, आज की बात करूं तो मुझे उनका चेहरा तो याद है मगर नाम भूल चुका हूं… मैं जहां से मास कॉम कर रहा था… उससे बस दस कदम पहले उनका कॉलेज था… रॉयल होटल क्रॉसिंग पर उतरने के बाद वो आगे-आगे पैदल चलती थी और उनके पीछे हम और हमारे एक कर्रे दोस्त, जो साथ में मास कॉम कर रहे थे… दोस्त थे इसलिए बार-बार छेड़ते- बोलो बे, जाओ आज बोल दो.. बात करो । एक बात और, हमारे और उनके उन्नाव से आने और लखनऊ से जाने की ट्रेन एक ही थी… मतलब आना जाना साथ में होता था । एक दिन उन्नाव के ही प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर बनी बेंच पर वो लाइट पीले रंग का सूट पहनकर बैठीं थी, हम भी बगल में गए.. एकदम से बोले- और कैसी हैं आप ? कल नहीं आई थी… उधर से भी जवाब हां, थोड़ी तबीयत खराब थी, आप बताओ कैसे हो… फिर क्या.. अंधा क्या मांगे दो आंखे… बस कल आप आई नहीं, तो थोड़ी सी बेचैनी हुई थी.. अब ठीक हूं । फिर वो ठहाका लगा कर हंसी, बोलीं.. अच्छा । क्या करते हो, कहां करते हो.. वाला इंट्रो वाला राउंड तकरीबन अजगैन तक चला । फिर तो रोज़ बातें होने लगीं.. ऑटो का किराया कभी वो देतीं, कभी हम, कभी मयंक… ईद आई तो हमने बधाई दी, उन्होंने घर आने की दावत दी.. लेकिन हम पहुंच नहीं पाए.. खैर अगले दिन वो इतनी सेंवई लेकर आईं … और याद करूं तो स्वाद तुरंत ताजा हो जाता है.. फिर तो फोन पे भी बातें होने लगीं… व्हाट्सएप पर भी.. करीब 2 साल हम साथ में आते जाते… प्यार हुआ था शायद उनसे, हां इश्क नहीं था… आज ये बात करीब 5 से 6 साल पुरानी हो गई है… उनका पुराना नंबर मैंने खो दिया, नया नंबर है नहीं.. फेसबुक पर तलाश कर नहीं सकता क्योंकि नाम नहीं याद है, घर उनका उन्नाव में है.. इलाका कौन सा बताया था ये भी नहीं याद… मुझे जहां तक लगता है कि उनका निकाह हो चुका होगा… रिश्ता उनसे क्या था, क्या नहीं.. लेकिन दिल खिंचता ज़रूर था उनकी तरफ.. जब कभी प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर जाता हूं.. तो याद ज़रूर आ जाती है उनकी… यूं तो रोज़ के सफर में आपको कई नए लोग मिलते हैं.. लेकिन बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो आपके दिल में बस जाते हैं… कुछ तो ऐसे होते हैं जिनका नाम भी आपको पता नहीं होता लेकिन हाय हैलो होता रहता है… दुआ है, वो मोहतरमा जहां भी हों… खुशहाल हों । और हां, उनकी आंखें इतनी खूबसूरत थीं कि आपकी निगाहें कुछ और देखने की ख़ता कर ही नहीं सकती…. कभी कभी जब आप अपनी जिन्दगी में बीते कुछ ऐसे लम्हों के बारे में सोचते हैं तो यकीन मानिए अच्छा लगता है… ( हालांकि ऐसे पोस्ट लिखकर आपके वर्तमान मामले के ब्रेकअप होने का खतरा भी होता है )

चन्द्रकान्त शुक्ला, उन्नाव वाले
पेशे से पत्रकार, दिल से शायर

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