फासीवाद: केवल समाजवादी क्रांति ही हरा सकता है!

Posted by Krishna Singh
December 21, 2017

Self-Published

पूंजीवाद अपनी 500 वर्षों की जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चूका है. अति बीमार है और शारीरिक, मानसिक रूप से सड गल चूका है. क्षत विक्षत शरीर से खून नहीं, केवल मवाद ही बह रहा है और जहरीले पिल्लू खदबदा रहे हैं.
राजस्थान की घटना (मर कर जलाया गया एक मुस्लिम मजदूर को और विडिओ बनाकर शेयर किया गया) इस सड़ांध का एक नमूना है और इस जहरीले मवाद से उत्पन्न रेंगने वाले जंतु का तांडव. इसके समर्थन में पूंजीवाद ने एक फौज भी पैदा कर रखी है. तालिबान, आईएसआईएस अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा पैदा किया उदहरण है, भारत में आरएसएस और इसके भिन्न भिन्न संगठनों ने यह ठीका लिया है, पूंजी के सेवा में, दलाली के बदले में.
आखिर पूंजी के चाकरों को इस स्तर तक किसने और क्यूँ गिराया? पूंजीवाद में, अन्दुरुनी गलाकाटू प्रतियोगिता और अति उत्पादन के कारन, मुनाफे दर में लगातार गिरते रहने की एक प्रवृतु है. एकाधिकार पूंजीवाद (Monopoly Capitalism) के बावजूद यह प्रतियोगिता और अति उत्पादन प्रचंड रूप लेता है और मुनाफा शून्य की तरफ बढ़ता है. आर्थिक संकट और मंदी बारम्बार आते हैं और उत्पादन शक्तियों की भारी बरबादी होती है.
अभी तो पूरा विश्व इस संकट में है. जीडीपी के आंकलन में बदलाव लाने के बावजूद, पुरे विश्व में यह गिर रहा है. वास्तव में सही आंकड़े लाने से यह आधी ही रह जाती है.
मजदूर वर्ग का शोषण बढ़ता है, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बेरोजगारी बढ़ता है. मजदूर वर्ग का प्रतिरोध भी बढ़ता है. आन्दोलन तो दिखता है, एक क्रन्तिकारी विचारधारा का भी समावेश होता है इस आन्दोलन में, यानि पूंजीवादी सत्ता को उखाड़ फेकने और समाजवाद की स्थापना करने की चाहत, ताकि हर शोषण और प्रतारणा को हमेशा के लिए ख़त्म किया जा सके.
नतीजा फासीवाद. पूंजीवाद का सबसे घटिया और खुनी रूप. पूंजीवाद का प्रजातंत्र ही कहीं से मजदूर वर्ग और किसान के लिए नहीं था, पर एक मुखड़ा जरूर था, “कानून सबके लिए बराबर है”, जिसे अब फेक दिया गया है. इसका आगाज भाजपा ने सत्ता में आते ही किया, कानून बदल कर अम्बानी के ऊपर लगे एफआईआर को निरस्त्र कर दिया. समय के साथ साथ 45 श्रम कानून ध्वस्त किये गए जो मजदूरों के हित में थे, किसानों के जमीन हड़पने के कानून लागू किये गए, विदेशी पूंजी को भारत में अति मुनाफा कमाने का रास्ता साफ़ किया गया, पर्यावरण कानून को मजाक बना दिया गया, जीएसटी लाया गया. ध्यान रहे कौंग्रेस सरकार भी यह करना चाहती थी, क्यूंकि वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और विदेशी पूंजी का ऐसा ही आदेश था पर करने में समर्थ नहीं हो सकी थी.
इस फासीवादी सरकार ने 3 वर्षों में ही पूंजी के लिए बेहतर मुनाफा नहीं, बल्कि सीधे सीधे जनता को लुटने का रास्ता साफ़ कर दिया. आदिवासियों के जमीन, जनता का पैसा नोट बंदी और जीएसटी के द्वारा, अब बेल इन भी आ रहा है. पर या ताकत कहाँ से मिलता है? इस ताकत का सामाजिक आधार है. पैसे और प्रतिक्रांति विचारधारा द्वारा जनता के एक छोटे से हिस्से को अपने साथ लेना. जी हाँ, फासीवाद भी एक सामाजिक आन्दोलन है, जैसे की हमने ईरान के अति भ्रष्ट और निकाम्मे, अमेरिकी परस्त राजा शाह के खिलाफ एक जन आन्दोलन देखा, पर यह आन्दोलन गया अयोतोल्लाह खुमैनी के हांथों में और वहां आया एक भयानक मजदूर विरोधी, महिला विरोधी, प्रजातंत्र विरोधी शषकों, मुल्लों की सत्ता!
भारत में यह काम किया गया धर्म, देश के नाम पर. फासीवाद ने राज्य सत्ता और इसके हर विभाग को अपने अधीन कर लिया है. चुनाव आयोग का क्या ह्रस्व हुआ दिख रहा है. पुलिस, आर्मी, नयायालय, प्रशाषण, मिडिया, शिक्षा संसथान, आदि इसके अधीन आ चुके हैं. फासीवाद का हर घिनौना रूप सामने है. जनता बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, अपराध, हिंसा से त्रस्त है. बेचैनी है, विरोध भी हर जगह दिख रहा है.
अब सवाल है कि क्या करें? खासकर यदि इस मायावी, खुनी फासीवाद का विरोध करना है तो?
यह तो दिख रहा है, चुनाव से ही इस दानव और सड़े व्यवस्था को नहीं हरा सकते हैं. एक जुझारू, क्रन्तिकारी संगठन चाहिए, एक क्रन्तिकारी विचारधारा के साथ.
और वह होगा मजदूरों की पार्टी, मार्क्सवादी, लेनिनवादी विचारधारा के द्वारा. इसका काम ऐसा संगठन बनाना होगा जो वर्ग संघर्ष की तैयारी करे, सत्ता को खुद हस्तगत करने की तैयारी करे और एक समाजवादी समाज बनाये.
ऐसा समाज, जो पूंजी के सत्ता को हटाकर मिहनत कश आवाम की सत्ता बनाये, निजी पूंजी को हटाकर सामाजिक धन की स्थापना करे, जहाँ इन्सान दुसरे इन्सान को नौकर या मजदूर ना रख सके, यानि मजदूरी के लिए गुलामी ना करे. एक वर्ग विहीन समाज, जहाँ हर तरह के शोषण और प्रतारण की संभावना ही समाप्त हो जाये.
क्या यह संभव है? 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने इसे संभव किया. स्टालिन के बाद यह सह समाज अन्दुरुनी गद्दारी और बाहरी आक्रमण के कारन बर्बाद हो गया और फिर से पूंजीवाद स्थापित हो गया. हम फिर से सर्वहारा क्रांति की तैयारी करें, यह एक ऐतिहासिक जरुरत है और हमारा कार्यभार भी है.
हम अवश्य सफल होंगे. हाँ, साथियों सही राजनितिक पहल, राजनितिक लाइन ही फासीवाद को हरा सकता है और यहाँ केवल समाजवादी क्रांति नही इसे ध्वस्त कर सकती है, बहुमत का प्रजातंत्र को बहाल कर सकती है, भगत सिंह और साथियों के सपनों को साकार कर सकते हैं!
मजदूर एकता जिंदाबाद! इंकलाब जिंदाबाद!

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